इस अंक के साथ ‘नैनीताल समाचार’ अपने 34 वर्ष पूरे कर 35वें वर्ष में प्रविष्ट हो रहा है। हमारा यह जनमबार अंक ‘आपदा का एक वर्ष’ के रूप में प्रस्तुत है।
इस एक साल में दो बड़ी आपदाओं से हमारा सामना हुआ। पहली आपदा जो ‘समाचार’ के लिये एकदम निजी तरह की थी, वह थी गिरदा का जाना। निजी वह भी नहीं थी, क्योंकि गिरदा सिर्फ ‘समाचार’ का ही नहीं था, समाज में पूरी तरह रचा-बसा था। यह बात उसके मरने के बाद बार-बार कई तरह से साबित हुई। अभी 22 अगस्त को उसकी पहली बरसी नैनीताल में ही नहीं, अल्मोड़ा, रानीखेत, द्वाराहाट, बागेश्वर, पिथौरागढ़, देहरादून, पौड़ी, गोपेश्वर, उत्तरकाशी, अगस्त्यमुनि, चमियाला, लखनऊ, दिल्ली, मुम्बई, इलाहाबाद, जयपुर……न जाने कितने स्थानों पर मनाई गई और ये आयोजन उसके दोस्त-प्रशंसकों ने अपनी श्रद्धा और अपने साधनों से ही किये। हम एकाध स्थानों के ही विस्तृत समाचार इस अंक में प्रकाशित कर पा रहे हैं। मगर ‘नैनीताल समाचार’ से गिरदा शुरूआत से ही अनन्य रूप से जुड़ा रहा था, अतः यह पूरा साल हमें उसे याद करने और उसकी अनुपस्थिति में अपने आप को कैसे सहेजें, यह सोचने में ही लग गया। उसकी बरसी पर जनसामान्य के कंठ से एकदम स्वाभाविक रूप से फूटे उसके गीतों ने हमें यह आत्मविश्वास दिलाया कि हाँ हम इस आपदा से निकल रहे हैं और उसके बगैर भी आगे बढ़ते रहेंगे…..
दूसरी आपदा उत्तराखंड में अतिवृष्टि के रूप में आयी। आपदायें उत्तराखंड के लिये अपरिचित नहीं हैं। 15 अगस्त 1977 को ‘नैनीताल समाचार’ का जन्म ही तवाघाट भूस्खलन के साथ हुआ था, जिसकी सुन्दरलाल बहुगुणा द्वारा लिखी रिपोर्ट हमने 15 सितंबर के अंक में छापी थी। रिपोर्ट का शीर्षक ही था ‘‘विकास का वर्तमान स्वरूप बदलना होगा: प्रकृति से छेड़छाड़ के विरुद्ध हिमालय ने युद्ध छेड़ दिया है।’’ तब से 34 साल हो गये हैं, न हमने प्रकृति से छेड़छाड़ बन्द की है और न विकास का तरीका बदला है। इसके दुष्परिणाम हम लगातार भुगत रहे हैं।
गत वर्ष आने वाली आपदा एक स्तर पर तो समझी जा सकती है। नैनीताल को आधार मानें तो औसत 2,800 मिमी के बरक्स वर्ष 2010 में यहाँ 4,253 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई, जो 113 सालों में सर्वाधिक थी। कमोबेश ऐसा ही सारे उत्तराखंड में रहा। इतनी अधिक वर्षा होगी या पृथ्वी जोर से काँपेगी तो जान-माल का नुकसान तो होगा ही। मूल सवाल यह है कि हम इस अतिवृष्टि और भूकम्प के साथ कैसे रहना सीखें और आपदा आ ही जाये तो कैसे जल्द से जल्द पीडि़तों के आँसू पोंछ कर उन्हें दुबारा अपने पाँवों पर खड़ा कर दें। एक विशिष्ट भूगोल में रहने और उससे जुड़ी इन स्वाभाविक समस्याओं से निपटने के लिये ही हमने एक अलग पहाड़ी राज्य माँगा था, मगर जो मिला वह एक निहायत भ्रष्ट और कुशासित प्रदेश था, जहाँ जमीन पर तो नजर जाती नहीं और बातें परलोक की की जाती हैं।
आपदायें कही तो प्राकृतिक जाती हैं मगर होती ज्यादातर मानवनिर्मित हैं। बीसवीं शताब्दी तक आते-आते मनुष्य में यह अहंकार आ गया कि विज्ञान और तकनीकी द्वारा उसने प्रकृति को पूरी तरह दबोच लिया है और इसी विश्वास पर उसने अपने विकास का रास्ता तय किया। मगर फिर विज्ञान और तकनीकी स्वयं ही बाजार के आधीन हो गये और उपभोक्तावाद बढ़ने के साथ प्रकृति पर अत्याचार बढ़ा और साथ-साथ आपदायें भी। सरकारों के लिये आपदायें उत्सव की तरह होती हैं, जहाँ प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री आकाश से मुस्कराते हुए तबाही का नजारा देखते हैं और फिर लूटखसोट के लिये सन्नद्ध हो जाते हैं। आपदायें हमारी राजनीति का आधार बन गई हैं। हम आपदाओं का सृजन करने वाले विकास के मॉडल को इसलिये बदलना नहीं चाहते, ताकि राजनीति के कफनफरोश मजे से कमाते-खाते रहें। लोकतंत्र का आधार मानी जाने वाली हमारी राजनीति ऊपरी स्तर पर कॉरपोरेट घरानों और निचले स्तर पर ठेकेदारों की रखैल हो गई है। भूकम्प के साथ इत्मीनान से रहना सीख चुके जापान ने भी जब फुकुशिमा दुर्घटना के बाद अपना परमाणु कार्यक्रम समेटना शुरू किया, हमारी केन्द्र सरकार ने फ्रांस की अरेवा कम्पनी द्वारा बनाये जा रहे जैंतापुर परमाणु कारखाने को चेरिनोबिल दुर्घटना की ठीक पच्चीसवीं सालगिरह पर अत्यन्त बेशर्मी से हरी झंडी दी। लगातार भूकम्प और भूस्खलनों की तबाहियाँ झेलते रहने पर भी हमारी प्रदेश सरकार सैकड़ों जल विद्युत परियोजनाओं पर काम जारी रखे है और प्रतिरोध के स्वर उठने पर कठोर दमन करती है।
एक ओर लूटखसोट का यह तंत्र और दूसरी ओर आपदापीडि़तों के आँसू पोंछने की अनिच्छा और उनका हिस्सा खा जाने की अमानवीयता! इसी मुद्दे पर केन्द्रित है यह अंक…