आधुनिकता में भटकी ‘उतरैणी’
{15 जनवरी 1978 के अंक में ‘गीराबल्लभ’ नाम से छपा यह लेख गिरदा द्वारा लिखा नैनीताल समाचार में प्रकाशित पहला गद्य है। इसमें उस साल के उतरैणी मेले में वन आन्दोलनकारियों के पहुँचने का भी जिक्र है। -सम्पादक}
काले कव्वा काले, खजूरै माल खाले, ले कव्वा बड़े, मैं कै दिये सुनूं घोडेी (1)
दुहरी-तिहरी घुघुतिया माला (2) पहिरे पहाड़ी बाल कंठों से छलकने वाले ये स्वर शब्द हर पहाड़ी ने सुने होंगे, मकर संक्रान्ति की ठण्डी कितु उत्साही प्रातः में जो अतृप्त लोक महत्वाकांक्षा को मुखर करते हैं। इन शब्दों को गाने वाले बाल कंठों के नन्हे से दिमाग में सोना तो सोना मिट्टी के घोड़े का भी कोई स्पष्ट बिम्ब नहीं रहा होगा- चूँकि उन्होंने तो घास खाते, बोझा ढोते, हिनहिनाते, आदमी के माफिक, कामगार घोड़े देखे हैं, इसलिये मृत (स्वर्ण अश्व मूर्ति) का खयाल कहाँ से उपजे ? लेकिन फिर भी…….
खैर, असल बात तो यह है कि पक्षियों में सर्वाधिक उपेक्षित पक्षी कौए से, चौपायों में गधे के समकक्षी घोड़े को (ध्यान रहे पहाड़ में गधे का काम घोड़े की प्रजाति खच्चर से ही लिया जाता है) भारतीय धरती के सर्वाधिक उपेक्षित क्षेत्र पहाड़ के बालकंठ न्यौतते हुए न माँगे तो क्या करें ? और किससे कहें ? (कहने की बात ही नहीं ठहरी) उपेक्षित उपेक्षित ही से तो जुड़ने की उम्मीद, बात कहने की हिम्मत रखता है और उसी को डरा-धमका भी सकता है -
ले कव्वा मेचुलो ,म्यौर कै नि मानलै , त्यार गालाड़ थेचुंले (3)
हाँ तो प्यारे !
गाल थेचने की बात को फिर हम जोड़ते हैं, वहीं जहाँ से हमने शुरू किया था- मतलब मकर संक्रान्ति अर्थात् पहाड़ियों के मुताबिक ‘उतरैणी’ और ‘उतरैणी’ का मेला बागेश्वर में।
हम नहीं जानते यह मेला कब से लगना प्रारंभ हुआ, सुना अवश्य है कि जौलजीबी, थल, गोचर आदि की भाँति इस मेले का भी व्यापारिक तथा सांस्कृतिक महत्व गजब का था। अब तो नाइलौनी खोमचों, कॉफी, पनामा सिगरेट आदि के स्टालों और ट्रांजिस्टरी संगीत, भ्रष्ट सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा यहाँ कुछ भी नहीं रहा। किसी कोने में 4-5 पोस्ते, फीणे (4), फरूवा, पाली, ठेकी, ढौकई (5), हुड़के (6) तथा थुलुमे, चुटुके, पंखी (7) वाले दिखाई अवश्य देते हैं किन्तु उखड़े-उखड़े अस्तित्व हीन से और बचकाने रंगमंच (जो कि प्रदर्शनी मैदान में बनाया जाता है) से आतंकित और चौंधियाये (हुड़भ्यासीण) कुछ लोक कंठ बागेश्वर के इस कोने में दबे-दबे से मुखर होते भी सुनाई पड़ते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे उन्हें अपना गला घोंटे जाने का स्पष्ट आभास मिल रहा हो- मेले की सरकारी सुव्यस्था और सौंन्दर्यबोधी वातावरण के ऊपर कोई मुक्त लोक कंठ नंगे लोक सौंन्दर्य को प्रस्तुत करने के लिये हुलसता भी है तो मंच के चारों ओर खड़ी लाल टोपियाँ और दर्शक दीर्घा में प्रथम पंक्ति पर विराजमान संभ्रान्त सूटधारी भारतीय बंधु उसे जतला देते हैं कि उसकी औकात उस मंच के लायक नहीं है। (वास्तव में उस मुक्त लोक कंठ के लिये वह मंच योग्य भी नहीं है।)
पर अभी भी ‘मालूशाही’ आदि लोक महाकाव्यों में पुराने बागेश्वर की असली सांस्कृतिक झलक सुनने को मिलती है-
तै बखत का बीच में,
बागेश्वर का मौका लै ,
यां म्यालो लागी रौ छै…
कती हुई रईं दनपुरियों का झ्वाड़ा
कती हुई रईं कुमाऊँ का बैरा
कती हुई रई कुमाऊं का भगनौला (8)
(लोक गायक उदय राम)
ये लोक गायक तो यहाँ तक कहते हैं कि बागनाथ (बागेश्वर में जिनका मंदिर है) स्वयं लोक नायिका राजुला पर फिदा हो गये थे। मगर इस बात से तो नहीं, हाँ सन् 1921 में कुली बेगार खाता, जो कि बागेश्वर में बहाया गया, और इसी समय ‘गौर्दा’ ने पहाड़ी अधरों को ‘मुल्क कुमाऊँ का सुण ल्हिया यार, झन दिया कुली बेगार’ जैसा गीत दिया; से अवश्य प्रभावित हुए। चूँकि किसी आंदोलनी विचार की जड़ें जन-जन तक धँसाने के लिये आवश्यक है कि ऐसे जन उत्सवों से सांस्कृतिक थात रही हो (शायद इसीलिये प्रत्येक सरकार इन सांस्कृतिक मेलों को भ्रष्ट करने में लगी रहती है सुव्यवस्थित करने का बहाना लेकर)
जहाँ तक ‘उतरैंणी’ के सांस्कृतिक थात की बात है- सो वह ‘मालूशाही’ के उपरोक्त अंश से स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि लोक महाकाव्यों में स्थान पाना कोई मजाक बात नहीं।
सुनते हैं इस वर्ष भी कुछ सिरफिरे नौजवान ‘उतरैणी’ में सांस्कृतिक चेतना लेकर पहुँचने वाले हैं और ठीक पाँच दशक-सात वर्षों बाद उसी ‘गौर्दा’ का गीत वहाँ गाया जाने वाला है- पर इस बार ‘कुली बेगार’ नहीं, बल्कि ‘पेड़ और पहाड़’ की बातें होने वाली हैं। अभी तो सुनने में आया है ‘वृक्षों का विलाप’ होगा। मान्स जात सुणीया…..(देखें नै.स. वन अंक 15 दिसम्बर 1977) देखते हैं वहाँ पहुँचते-पहुँचते क्या हो ?
(अ) काले काले/ बड़ पुवा खा ले (गंगोत्री क्षेत्र)
(ब)काले कव्वा काले, घुघुते माला खाले
ले कव्वा बड़े, मकैं दियै सुनूँ घड़े (साह परिवार)
(स) जो लेख में दिया गया है वह अल्मोड़े की पट्टी ‘तल्ला-स्यूनरा’ का संस्करण है।
(द) कारे कव्वा कारे ! खजूर (घुघुत) की माला खारे !! ले कव्वा बड़ा ! मुझे देना सोने का घोड़ा !!
(3) अबे कव्वे ! मेरा कहा नहीं मानेगा तो मैं तेरे गाल थेचूँगा।
(4) स्थानीय नागर मोथा, पराल, बाँस, निंगाल से बने लोक बिछावन (चटाईयां)।
(7) ऊनी ओढ़न-बिछावन (कम्बल, कालीन तथा पश्मीने की तरह)
‘‘तिस बीच-…..‘उतरैणी’ मौके से बागेश्वर में मेला लगा है……और मेले में- कहीं हो रहे हैं दनपुरिया झोड़े,/ कहीं चल रहे हैं कुमाउनी ‘बैर’, / कहीं ‘भगनौल’ जारी है।’
(‘झोड़़े’, ‘बैर’ तथा ‘भगनौल’ पर्वतीय क्षेत्र के फुटकर लोक गीतों की विभिन्न विधायें हैं। ‘मालूशाही’ इस अंचल का प्रसिद्ध लोक प्रेम काव्य है, जैसे- लैला-मजनूं, शींरी फरहाद आदि)।
यों अब हमारे लोक गायकों में भी सिनेमाई तर्ज वालों की पल्टन तैयार हो चुकी है जो वास्तविक लोक गायकों की अपेक्षा बहुत-बहुत बड़ी है और आधुनिकता से लैस है।