विकृत होते सांस्कृतिक परिवेश के बीच जब कुमाऊँ की होली परम्परा पर नजर दौड़ाते हैं, तो सुखद आश्चर्य होता है। सुखद इसलिए कि एक विशुद्ध परम्परा की गायकी ने यहाँ के लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर लिया और आश्चर्य इसलिए कि शास्त्रीयता की जटिल परम्पराओं की निपट अनभिज्ञता के बीच जिन शास्त्रीय राग-रागिनियों में निबद्ध रचनाओं को यहाँ का आम आदमी होली गायकी के साथ संजोये है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
कुमाऊँ के लोक जीवन में होली गायकी का प्रवेश 10वीं सदी में चन्द्रवंशीय शासनकाल से प्रारम्भ होना समझा जाता है। तभी देश के तमाम क्षेत्रों की विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं के लोगों ने यहाँ बसना शुरू किया था। प्रतीत होता है कि चन्द शासनकाल में यहाँ आकर प्रभुत्व पा गए लोगों के अलावा यहाँ के मूल निवासियों को होली की इस परम्परा में या तो जाने से रोक दिया गया या उन्होंने ही इसे स्वीकार नहीं किया। मगर अब वे भी इस सांस्कृतिक महोत्सव का अभिन्न हिस्सा हैं। होली गायकी के दो रूप यहाँ प्रचलित हैं- बैठ होली और खड़ी होली। खड़ी होली, जो ढोल-मजीरों के साथ गोल घेरे में, पग संचलन और भाव प्रदर्शन के साथ गाई जाती है, का प्रचलन ग्रामीण अंचलों में है। रात्रि में यही होली बैठकर गाई जाती है। शिवरात्रि और बसन्त पंचमी से होलिकाष्टमी तक भक्ति, शिव-राम कृपा आदि की नायकी होलियाँ गाई जाती हैं। होलिकाष्टमी को मंदिरों में, आँवला एकादशी को गाँव के निर्धारित स्थान या घर में चीर बंधन होता है और रंग पड़ता है। आँवला एकादशी से पूर्णमासी तक रात-दिन पूरे गाँव होली और केवल होली में जुटे रहते है। भक्ति के गीत (जिन्हें निर्वाण की होली कहा जाता है) धीरे-धीरे श्रृंगार की ओर बढ़ते हैं और अन्तिम दिन धूम की होली में परिवर्तित हो जाते हैं।
इस ग्रामीण परम्परा के बाद शास्त्रीय रागों में निबद्ध होली गायकी अपना विशिष्ट स्थान रखती है। चम्पावत में चन्द शासकों की पुरानी राजधानी होने के कारण वहाँ इस होली की गायकी को खास माना जाता है। लेकिन राजधानी अल्मोड़ा स्थापित हो जाने के बाद इसका विस्तार जहाँ अन्य क्षेत्रों में हुआ, वहीं राजदरबार में बाहर से आने वाले शास्त्रीय गायकों ने होली गायकी के स्वरूप में परिवर्तन कर दिया। यही होली कालान्तर में बैठ होली के रूप में प्रचलित हो गई। राजशाही खत्म हुई। शास्त्रीय गायकों को प्रश्रय नहीं मिल पाया, लेकिन परम्परा कायम रही। किन्तु इस परम्परा ने शास्त्र से अधिक लोक का निर्वाह किया। विभिन्न शास्त्रीय रागों में गाई जाने वाली इन होलियों को इस तरह सरल करने का प्रयास किया गया कि शास्त्रीय गायकी का प्रारम्भिक ज्ञान न होते हुए भी परम्परागत रूप से आम लोग इस गायकी में भाग लेने लगे।
यों पौष मास के प्रथम रविवार से होली गायकी का रियाज शुरू हो जाता है। लेकिन बसन्त पंचमी को प्रथम होली की बैठक ‘आयो नवल बसन्त, सखी ऋतु राज कहायो, पुष्पकली सब फूलन लागी फूलहि फूल सुहायो’ तथा शिवरात्रि को ‘जय-जय शिवशंकर योगी नृत्य करत प्रभु डमरू बजावत बावन धूनी रमोरी’ आदि काफी राग, ताल चांचर में निबद्ध होलियाँ गाई जाती हैं और समय के अनुसार विभिन्न रागों में यह गायकी बढ़ती रहती है।
रंग के बाद होली गायकी में दिन में पीलू राग मुख्य रूप से प्रचलन में है- ‘मद की भरी चली जात, गुजरिया, सौदा करना है तो कर ले मुसाफिर चार दिना की लागि रे बजरिया’ तथा ‘योगी तेरो यौवन छलकत जाय, मदमस्त यौवन, नैन रसीले घायल कर-कर जाय।’ एवं भीमपलासी राग में ‘मोहे न सताओ प्यारी बृजबांवरी, कहो तो मैं नृत्य करूँ, बाँसुरी की तान भरूँ……..’ के बाद सायंकाल राग श्यामकल्याण में सुन्दर रचनाएँ शुरू होती हैं। यथा ‘मुरली नागिन सो, केहि विधि फाग रचायो मोहन मन लीनो, बृजबांवरो मोसे बांवरी कहत है, अब हम जानी, बांवरो भयो नन्दलाल……….’ तथा ‘होरी में तब खेलूं, जब आए चतुर बृजनार’। इसके बाद काफी राग की रचनाएँ शुरू होती हैं। जैसे- ‘मोतियन की लर तोड़ी, गोरी बहियाँ मरोरी। जैसे सौदागर पाले घोड़ा बांधत रेशम डोरी……..’ या ‘क्या जिन्दगी का ठिकाना फिरत मन क्यों रे भुलाना, कहाँ गए भीम, कहाँ दुर्योधन, कहाँ पारथ बलवाना, कहाँ गए भीष्म, द्रोण, करण से, जिन रन भारत ठाना……..’ या ‘ये कैसी होरी खेलाई मोहन मोहे चोरी लगाई, खेलत गेदा गिरि जमुना में तें मोहि चोरी लगाई…………….’
काफी के बाद जंगला काफी में- ‘राधे नन्द कुंवर समझाय रही, होरी खेलो फागुन ऋतु आई रही’ आदि होलियों का प्रचलन है। क्रम से बढ़ते हुए खमाज राग की ओर होली गायक बढ़ते हैं-‘अपने ही रंग में रंगा दे मौला, तू तो साहेब मोरा गरीब नवाज…….’ या ‘कैसे धरूँ जिया धीर, बाली उमर मोरी पिया घर नाहीं’ आदि गीतों के बाद राग देश की ओर होली गायक बढ़ते हैं- ‘चलो री सखी तट जमुना की ओर, अगर चंदन को पलना बनो है, रेशम लागी डोर………’ उसके बाद राग बागेश्वरी में- ‘अचरा पकड़ रस लीन्हो, नन्द को छयलवा अबके होरिन में…….’ आदि गीतों में रस विभोर होने के साथ ही मध्यरात्रि के रागों का क्रम चलता है। विहाग राग में ‘नजर भर देखन दे महबूब, राजा दशरथ के चार कुंवर भए, एक से एक अनूप’ या ‘मारत मोरे नैनन में पिचकारी, या रसिया से मैं हारी……….’ जैसे गीतों के साथ राग जयजयवन्ती में ‘बीतत रैन गिनत हम तारे, जाय कहो सखि पिय से हमारे’ जैसी भावपूर्ण गायकी में होली गायक और श्रोता मस्त हो जाया करते हैं।
राग बहार में ‘छाड़ो डगर मोरी बहियाँ गहो ना, रीत की अनरीत करो ना कान्हा………’ या ‘अब कैसे जोबना बचाओगी गोरी, फागुन मस्त महीना की होरी’ राग झिंझोटी में ‘आहो मोहन श्रृंगार करूं मैं तोरा, मोतियन मांग भरूं’। आदि गीतों के साथ राग सहाना की ओर बढ़ते हैं। परज में ‘पनियां भरन कैसे जाऊँ घिर आये बदरा, घर मेरा दूर गागर सिर भारी, मैं नाजुक पनिहारी’, राग जोगिया में ‘सैंया गए परदेश, कैसे कटे विरह की रतिया….’’ के बाद राग भैरवी की ओर गायक बढ़ते हैं और ‘लाल मत डारो गुलाल, ऐसो चटक रंग डारो’ और ‘रस के भरे तोरे नैन, साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ’ आदि गीतों के इस क्रम में चाँचर ताल की इन होलियों के साथ 16 मात्रा की धमार भी गाई जाती है। बीच-बीच में तीन ताल, एक ताल, झपताल, रूपक आदि तालों में निबद्ध रचनाएँ भी गाई जाती हैं।
उधर खड़ी होली में शास्त्र से भिन्न लोक परम्परायें हैं। आँवला एकादशी को रंग के साथ चीर बंधन ‘बाँधो कन्हैया ध्वजा चीर, गोपियाँ ग्वाला लाया चीर’ से होली शुरू होती है। पुराने समय में चीर बंधन उन्हीं गाँवों में होता था, जिन्हें राज दरबार द्वारा इसका अधिकार दिया गया होता था। संभवतः दरबार से जुड़े विशेष लोगों को ही ध्वज दिया जाता होगा और चीर बंधन का प्रचलन रहा होगा। चीर बंधन के बाद गणेश स्तुति- ‘सिद्धि को दाता विघ्न विनाशक, होरि खेले गिरिजापति नन्दन’, देवी की स्तुति ‘दरशन दे महामाइ अम्बा धन तेरो, अक्षत, चंदन, रूए की बाती दे हो भैंट चढ़ाइ, अम्बा धन तेरो’ आदि भक्तिपूर्ण होलियों के साथ गायन शुरू होता है और एकादशी से पूर्णमासी व छरड़ी तक भक्ति की होलियाँ रहस्य, श्रृंगार व धूम यानी राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ आदि की ओर बढ़ती हंै।
‘एक ओर हर खेले होरी, एक ओर नन्दलाल वे। कोई जो सोवे रंगमहल में, कोई शमशान बासा वे’ तथा ‘सवा घड़ा रस औटूं पैसा भर गुड़ होई, पैसा भर गुड़ बेचूं लाख टका को होई’ और ‘रंग चूवत है गुलाल तेरे नैनन में, बारा बरस वृन्दावन रहियो सोला कोस उजास, तेरे नैनन में’ एवं ‘तुमको पियारी नींद देवर हमको पियारो जोबन रे’, ‘मत जाहो पिया होरी आई रही, जिनके पिया परदेश बसत हैं, उनकी नारी सोच भरी’ जैसी रसभरी रचनाओं के साथ होली गायक रात और दिन मस्त रहते हैं। यह सप्ताह केवल होली गायकी आदि को ही समर्पित रहता है। छरड़ी के अन्त में ‘होरी खेली-खाली मथुरा को चली, आज कन्हैया रंग भरे’ गायन के साथ सभी को आशीर्वाद देने की परिपाटी का निर्वाह किया जाता है।