संस्कृति के नाम पर उत्तराखंड में बरसाती गाड़-गधेरों की तरह गीतों के वीडियो कैसेट निकल रहे हैं। यह लोगों की दिखास की ललक है। यह छपास के समानान्तर तृष्णा है। अगर आपके पास पैसा हो तो धन दे कर हीरो-हीरोइन बनिये, कैसेट निकालिये और टी.वी. या कम्प्यूटर में छाने की इच्छा पूरी कीजिए। अब चाहे गाने कैसे ही हों, उनके भाव कैसे ही हों, थिरकना या लचकना जो भी हो, कीजिए। कैसेट बनाने वाली कंम्पनियों की बहार है। ये कैसेट उपभोक्तावाद के नकारात्मक प्रभाव के स्पष्ट उदाहरण हैं। यद्यपि कुछ कैसटों में सामाजिक सरोकार की बातें हैं या पहाड़ के वास्तविक हालात दर्शाये गये हैं, परन्तु अधिकतर कैसेट फूहड़ हैं। ऐसे में सुरक्षा रावत का ’टिकुलिया मामा’ एक सराहनीय प्रयास है। समाप्त होते लोक गीतों को बचाने की कोशिश में यह तेजी से बदलते पहाड़ के संदर्भों को ताजा करता है और उसे नये परिधान में सजाता है।
सुप्रसिद्ध गायक स्वर्गीय दिगम्बर प्रसाद सेमवाल को समर्पित इस कैसेट में आठ गीत हैं, यथा टिकुलिया मामा, हे रामिये, पुराणू मेरू दौरेजी, दयारा झूमीलो आपू दे सजाई मा, लोण भरी दोण मेरी सुनीता, पुराणू मेरू। सारे गीतों का फिल्मांकन सहज हुआ है। तकनीकी दृष्टि से भी कैसेट प्रभावी है। लांग शॉट्स व क्लोज अप को भी बेहतरीन रूप से प्रस्तुत किया गया है। ’दयारा झूमैलो’ में दयारा बुग्याल के अप्रितम सौंन्दर्य को वहाँ की मक्खन-मट्ठे की होली की पृष्ठभूमि में छायांकन किया है। ’फूलेंडें डाली फूलै ले जाली दायरा रासो’ का गीत नृत्य के साथ अभिभूत कर देता है। नृत्य में झूमीलो के साथ दयारा का नैसर्गिक सौन्दर्य जैसे समाहित हो गया हो। पदसंचालन तो अद्वितीय है और बंगाड़, जौनसार व कमलसेरा की समृद्ध नृत्य परम्परा के अनुकूल है। ’लोणभरी दोण’ नृत्य में ’छपाक’ ध्वनि प्रयोग व ’रासो’ का दीर्घ उच्चारण इस नृत्य को मनोहारी बना देता है । गायक गायिका रजनीकांत सेमवाल, सोनिया आनन्द, प्रमिला जोशी, प्रीति रणाकोटी के स्वर मधुर तो हैं ही, गीतों के भावों को प्रभावशाली बनाती हैं।
साज-सज्जा बंगाड़, गढ़वाल व हिमांचली प्रभाव लिये गीतों को लोकगीतों के स्वाभाविक संसार में ले जाती है। कोई भी गीत अपनी संस्कृति की गरिमा के साथ कहीं कमजोर नहीं पड़ा है। यह कैसेट देखने लायक ही नहीं, समझने लायक है और विभिन्न कैसेट निर्माताओं के लिए प्रेरणा है कि मूल गीतों से छेड़छाड़ किये बिना उन्हें आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिखा कर उन्हें सहज रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। नृत्य में बंगाण क्षेत्र के कदमों की थिरकन व स्वरों का सामूहिक प्रदर्शन एकबारगी मन को प्रफुल्लित कर देता है। ‘कलादर्पण’ जैसी सांस्कृतिक संस्था के जनक सुरक्षा रावत से एक ताजगी देने वाले कैसेट की आशा की जा सकती थी, वह इस कैसेट से पूरी हुई। रामा कैसेट की यह प्रस्तुति अभिनन्दनीय है। यह कैसेट जनता को जौनसार, बंगाण, रवाई क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति का सुमधुर परिचय देगा।
‘टिकुलिया मामा’ के इस कैसेट का संगीत निर्देशन अमित बिश्नोई ने किया है और निर्देशन सुरक्षा रावत ने। निर्माता
हैं रमेश आजमी।






















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