अगर बच्चे![]()
दौड़ते हुए स्कूल आते
दमकते चेहरों, ऊर्जावान पैरों
और
प्रश्नों से भरे मस्तिष्क के साथ
अनगिनत मस्तिष्कों से उछलते असंख्य
प्रश्न
और
छलकते प्रश्नों को समेटते शिक्षक
आगे-आगे
पीछे-पीछे
साथ-साथ
कितना अच्छा होता
अगर पढ़ाते समय
शिक्षक की आँखों में चमक होती
और जाती
बच्चों की आँखों तक
और फिर उनके मन तक
स्कूल की घंटी ऐसे बजती
जैसे रात की समाप्ति पर
चिड़ियों ने चहचहा कर
प्रभात की घोषणा की हो
और उसके बाद
सब सुन्दर से सुन्दरतम हो जाता…
शिक्षक पढ़ाता ऐसे
जैसे माँ चलना सिखाती है
और बच्चे पढ़ते
निर्भीक होकर
जैसे पिता की अँगुली थामे
गिरने का नहीं रहता कोई भय….
बच्चे ऐसे सुनते
जैसे कुछ छूट न जाए
बिना थके बिना रुके
अपने शिक्षक के साथ
जैसे घूमने निकले हों
और थोड़े-से समय में
यहाँ भी वहाँ भी
सब देख लेना हो
तेज और तेज
दौड़ते-दौड़ते बच्चे आगे निकल जाते
शिक्षक पीछे रह जाता
मुस्करा कर देखता
दौड़ते बच्चों को
उनकी प्रशंसा करता।….
वह देखता जाता
और धीरे-धीरे, बच्चे उड़ने लगते
वह फिर मुस्कराता
जैसे बुद्ध मुस्कराए होंगे
बोधिवृक्ष के नीचे……..
तभी फिर से घंटी बजती
और शिक्षक यों जागता
जैसे मोक्ष के बाद नया जीवन पाया हो
और नया मोक्ष पाना हो
नये जीवन के बाद
कितना अच्छा होता
अगर
जी़वन में कई मोक्ष होते
या जीवन स्वयं
मोक्ष बन जाता
कितना अच्छा होता
अगर स्कूल
बच्चों की
सबसे प्रिय जगह होता……
स्वाति मेलकानी