….तो इस तरह महाराज
पूरा हुआ ऋतु चक्र
और बीत गया एक साल फिर से
इस बीच पाने के साथ-साथ
बहुत कुछ खोया भी हमने
हड्डियों से मजबूती
और आँखों से रोशनी
कुछ और हो गई कम
रिश्तों से फिसल गया थोड़ा और विश्वास
और शब्दों से तक
दूर हो गई शर्म
मेरे पास भी है
एक बहुत बड़ा दुःख
जिसे रख लिया मैंने छिपा कर
कुछ सजीले शब्दों की ओट
इस कठिन काल में
जब हमारी भाषा
नहीं टकरा पा रही
समय के साथ
मैं लेकर आया हूँ
कुछ सार्वभौम प्रार्थनायें
मसलन
समय रहते बचा लीजिये
इस धीरे-धीरे
गर्म होती पृथ्वी को
इस ममतामयी वसुंधरा को
दुबारा बनाना नहीं होगा संभव
क्या करेंगे
यदि सचमुच कुछ हो गया
महान हिमालय को
कैसे न कैसे कीजिये जुगत
इन सदानीरा पवित्र नदियों को बचाने की
उजड़ते आदिवासियों, बहुरंगी भाषाओं
और सजीली वनस्पतियों के बिना नहीं फलेगा
सभ्यता का बहुवचन
देखिये महाराज
इतना भारी हाथी और शानदार बाघ
तक
कर दिये हमने
खतरे की जद में
कुछ भी कर के बचा लीजिये
थोड़े बहुत को तो
बहुत लम्बी है फेरहिस्त
और खतरे हैं बहुत
दाल में नमक और चुटकी भर उम्मीद
तो बचा ही लीजिए।
- राजेन्द्र कैड़ा