प्रस्तुति : अरविंद मुद्गल
राज्य बनने के बाद के इन वर्षों में प्रदेश के शिक्षा विभाग में छठे वेतनमान से अधिकारियों, शिक्षकों और कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति के अलावा कोई और सुधार तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता। विद्यालयों की दशा और छात्रों के लिये परिस्थितियाँ जस की तस हैं। दुर्गम क्षेत्रों में अध्यापकों की प्राथमिकता से तैनाती जैसे शासनादेश से फाइलों का वजन तो अवश्य बढ़ा, लेकिन धरातल पर इसे अमली जामा पहनाने में शासन लगभग नाकाम रहा है। कहीं विषय हैं तो अध्यापक नहीं और कहीं अध्यापक हैं तो छात्र नहीं।
आइये, मण्डल मुख्यालय पौड़ी से सटे कोट ब्लॉक पर एक सरसरी निगाह डालें। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्राथमिक विद्यालय तो विभाग की प्राथमिकता में ही नहीं हैं। कोट विकास खण्ड के प्राथमिक विद्यालय दत्ताखेत के 25 बच्चों के लिये पिछले पाँच वर्षों से कोई शिक्षक ही नहीं है। ’शिक्षक विहीन विद्यालय!’ जबकि इसके निकट ही विद्यालय जवाड़ा में 6 छात्रों के लिये प्रधानाध्यापक समेत 3 शिक्षक हैं। प्राथमिक विद्यालय अठूल में पिछले पाँच वर्षों में शिक्षा विभाग का कोई छोटा या बड़ा अधिकारी सुध लेने नहीं पहुँचा। कोट ब्लॉक में ही उच्च शिक्षा की बात करें तो सुगम क्षेत्र के रा.इ. कालेज खोलाचौरी में विज्ञान के विषयों के लिये एक भी प्रवक्ता नहीं है। 2006 में विद्यालय इंटर में उच्चीकृत हुआ, 2006-07 का सत्र चला और उसके बाद से अब तक विज्ञान की कक्षाएँ बन्द हैं। विद्यालय के लिये दुमंज़िला भवन भी निर्माणाधीन है। नया भवन तो दिया लेकिन उसे आबाद करने के लिये शिक्षक नहीं।
यही दुर्दशा दुर्गम क्षेत्र के रा.इ.कालेज मसाण गाँव की है, जहाँ विज्ञान का झंडा एकमात्र जीव विज्ञान का अध्यापक लहरा रहा है। परिणामस्वरूप यहाँ भी छात्रों ने प्रवेश नहीं लिया। शिक्षकों की कमी से कोट ब्लॉक के नाहसैंण और ग्राम दोन्दल के राजकीय इन्टर कालेज भी प्रभावित हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर पौड़ी जिले में 6 विज्ञान के प्रवक्ताओं के पास पढ़ाने के लिये एक भी छात्र नहीं है। (ये वो आँकड़े हैं जो अभी तक विभाग के संज्ञान में है। अति दुर्गम क्षेत्र में अज्ञातवास झेल रहे विद्यालयों का पूरा डाटाबेस तो विभाग के पास भी तैयार नहीं है)।
मण्डल मुख्यालय के निकट कोट ब्लॉक वो आईना है जिसमें दिखायी देती शिक्षा विभाग की सूरत लगभग सभी क्षेत्रों में एक सी है। अब जब ये सूरतेहाल मण्डल मुख्यालय से मात्र 15 से 30 किमी. दूर का है तो दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों की दुर्दशा की सहज ही कल्पना की जा सकती है। एक ब्लाक की इस छोटी सी तस्वीर से यह तो स्पष्ट है कि या तो शासन की नीतियाँ कारगर नहीं और यदि हैं तो सही तौर पर लागू ही नहीं होतीं। ऐसे में विद्यालयों में सघन निरीक्षण कर रहे अधिकारियों का भी निरीक्षण करने की आवश्यकता है। इस क्षेत्र को आज भी एक सीधी-सपाट नीति और कार्यप्रणाली का इन्तज़ार है, जो बच्चों को इतना काबिल बना दे कि वे किसी मुकाबले के लिये कम से कम कतार में तो खड़े हो सकें। बहरहाल जब तक शिक्षा प्रणाली को चाक-चौबंद नहीं कर लिया जाता और इसे सुचारु रूप से कार्यान्वित करने की इच्छाशक्ति पैदा नहीं होती, तब तक अपने बच्चों के भविष्य के लिये चिन्तित अभिभावकों के पास पलायन करने के अलावा और कोई चारा नहीं।