प्रस्तुति : बसंत पांडे
‘नदी बचाओ अभियान’ के दो वर्ष पूरे होने पर एक समीक्षात्मक बैठक 22 दिसम्बर 09 को कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में सम्पन्न हुई। वक्ताओं ने कहा कि जिस प्रकार चिपको आन्दोलन ने पेड़ों के प्रति चेतना पैदा की, उसी प्रकार नदी बचाओ अभियान ने पानी व नदी के प्रति जागृति पैदा की है। वर्तमान में जहाँ स्थानीय से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक केवल पर्यावरण को मुद्दा माना जा रहा है, इस अभियान ने जनजीवन के आधारभूत सवालों को उठाया, जिससे जनता सतर्क भी हुई और कई स्थानों पर सक्रिय भी हुई। उत्तराखण्ड में जल विद्युत परियोजनाओं से जनता के छिनते हकों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अभियान ने विशेष भूमिका अदा की। इस जन दबाव के कारण ही सरकार को विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के 10 किमी. क्षेत्र को अब प्रभावित क्षेत्र मानना पड़ा है, जबकि पहले सुरंग के मुहाने व निकास पर स्थित गाँवों को ही प्रभावित क्षेत्र माना गया था। गैरहिमानी नदियों में खनन व जंगल-कटान सम्बंधी मुद्दों पर भी प्रशासन के स्तर पर दबाव बना है। इन दो वर्षो के दौरान महिलायें विशेष रूप से सक्रिय रही हैं। कुछ युवा साथी इस अभियान के साथ जुड़ रहे हैं। अभियान द्वारा अलग-अलग जिलों में किये गये चार युवा शिविरों ने प्राकृतिक सम्पदा के अधिकार और प्रबंधन की दिशा में सक्रियता पैदा की है।
मगर अभियान में जो सांगठनिक लचीलापन व खुलापन दिया गया था, उसका कुछ संस्थाओं द्वारा दुरुपयोग भी किया गया। फंडिंग एजेन्सियों से लेकर किये गये धन के भोंडे प्रदर्शन से इस अभियान के बारे में गलत संदेश भी गया। अभियान का मूल लक्ष्य लोकशक्ति को खड़ा करना था, लेकिन जनता के मुद्दे को पीछे करके केवल पर्यावरण के पक्ष को मुख्य बनाते हुए फंडिंग हासिल की जा रही है। प्रारम्भ में अभियान में जो सामंजस्य बना था, वह साथियों की आपसी खींचतान के कारण इस वर्ष कम हुआ। यद्यपि पूरे उत्तराखण्ड की विभिन्न घाटियों में अनेक कार्यक्रम हुए, पर उससे अभियान का स्वरूप उभरने के स्थान पर आयोजक संस्थायें ही प्रचार में आईं। इन विसंगतियों को देखते हुए निर्णय किया गया कि इसे स्वयंसेवक याने कार्यकर्ताओं का सामूहिक अभिक्रम माना जाये। अब तक शामिल व सक्रिय साथी व भविष्य में जुड़ने वाले नये साथी, सभी इस अभियान में स्वयंसेवक (वोलन्टियर) के रूप में शामिल रहेंगे। आम समाज से भी जिनकी इस कार्य के प्रति प्रतिबद्धता होगी, स्वयंसेवक के रूप में जुड़ सकेंगे ताकि यह एक जन-अभियान का स्वरूप ले सके। संस्थायें अपना सहयोग दे सकेंगी, परन्तु अपने संस्थागत कार्यक्रमों या प्रकाशनों में अभियान के बैनर (नाम) को उपयोग मंे नहीं लायेंगी; ताकि स्पष्टता बनी रहे व अभियान में एक समरसता बनी रहे।
कुछ भावी कार्यक्रम इस प्रकार तय किये गये –
- विद्युत परियोजनाओ तथा सूख रहे जल स्रोतों के मद्देनजर अभियान अपने दृष्टिकोण का एक पोजिशन पेपर तैयार करेगा।
- पंचेश्वर बाँध के विरोध के लिये सरयू तथा डूब क्षेत्र के गाँवों के ग्रामवासियों के प्रतिरोधों को अभियान बल देगा।
- अभियान के साथियों द्वारा मंदाकिनी घाटी में लम्बे समय से चलाये जा रहे आन्दोलन को अभियान पूरा सहयोग देगा।
- अभियान द्वारा उत्तराखंड को वास्तविक ऊर्जा प्रदेश बनाने के लिये सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं की सूची बनाई जा चुकी है। उन परियोजनाओं को फिर से चालू करने के लिये सरकार व संस्थाओं के स्तर पर प्रयास करेगा। सफलतापूर्वक बनाई गई सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं का दस्तावेजीकरण भी किया जायेगा।
- पदयात्राओं को आन्दोलनों का सबसे अधिक सशक्त और प्रभावी माध्यम मानते हुए सरयू, अलकनन्दा, कोसी व गोमती पर पदयात्रा करने का निर्णय किया गया।






















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