[पिछ्ले भाग में आपने जाना कि किस प्रकार होली के हुड़दंग से बचने के लिये हिमालय की वादियों में जाने की योजना बनायी गयी और यात्रा की शुरुआत की गयी। आज पढ़ें उससे आगे की कहानी श्री केशव भट्ट की जुबानी जिसमें आप देखेंगे कि विकास किस प्रकार कागजों (या दीवारों) तक सिमट कर रह गया है। विकास के खोखले आंकड़ों को पोल खोलता चित्र सहित यात्रा-वर्णन। सभी फोटो : श्री केशव भट्ट]
खर्किया में प्रकाश सिंह की दुकान में कई लोगों को देख हम भी वहीं को चल दिए चाय पीने के बहाने। दुकान की दीवार में पिंडर घाटी में सुंदरढुंगा नदी पर रिडिंग के पास बन रही 500 किलोवाट लघुजल विद्युत परियोजना का विवरण बड़े ही सुंदर ढंग से लिखा था। इस परियोजना से 11 गाँवों को जगमग करने का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना की लागत रु. 4,68,02,308 है। इसमें उरेडा/भारत सरकार का योगदान रु.4,21,76,658 तथा लाभार्थी संस्था का अंशदान रु. 46,25,650 है। इस योजना के निर्माण के लिए ए.एच.ई.सी.आई.आई.टी. रुड़की, उरेडा एवं लाभार्थी संस्था के मध्य त्रिपक्षीय अनुबंध 29 सितंबर 2006 को हुआ। इसके तहत 18 माह में इस परियोजना का निर्माण पूरा कर बाछम, लैटोली, जातोली, नान खाती, खाती, उमुला, भगदाणों, जैकुनी, सरनी, भटंग तथा धूर गाँवों को बिजली दी जानी है। बहरहाल, पीढ़ियों से अंधेरे में रह रहे पिंडर घाटी के ग्रामीणों के लिए इन 18 महीनों में भी बिजली अभी सपना ही है। कुछ विद्युत के पोल भगदाणु गाँव के इर्द-गिर्द खड़े जरूर कर दिए गए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि बाछम गाँव के करीब 60 लोगों को एक साल तक परियोजना में काम कराने के बाद ओन अभी तक भी मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है। रतन सिंह ठेकेदार ने स्थानीय निवासी
हुकुम सिंह को विद्युत पोल ढुलाई का ठेका दिया था। मजदूरों को पैसा देने के लिए उसे बीच-बीच में कम पैसा दिया गया तो उसने भी 18 हजार रुपये का नुकसान उठा ढुलाई का काम बीच में ही छोड़ दिया। अब गोगिना गाँव के ग्रामीण मजदूरी में लगे हैं। काली भाट से रिडिंग तक के लिए लगभग दो किलोमीटर की नहर बननी है। तीस माह गुजरने के बाद भी नहर का काम पूरा नहीं हुआ है। एक व्यक्ति ने बताया कि लगभग 200 परिवारों को अपने में समाहित किए बाछम गाँव में नौ तोक हैं। इस परियोजना से हम आस लगाए बैठे हैं कि कब बिजली आएगी और कब यहाँ के पहाड़ी इलाके रोशनी में नहाएँगे! साब…..ये लोग तो ग्रामीणों को ठगने आ रहे हैं। अब इस रोड को ही ले लो………इतनी जल्दी-जल्दी बन रही है। इस लघु परियोजना का ठेका भी ऐसे ही आदमी को दे दिया जाता तो आज तक बिजली आ भी जाती। हमें कागज पर लिखते देख कुछ ग्रामीण खिसकने लगे। शायद गाँव के छुटभय्ये नेताओं का डर उनके दिलो-दिमाग में आया होगा। सोचते होंगे कि इनका क्या……ये लोग न जाने क्या-क्या लिख देंगे। ….. कहीं नाम-वाम लिख दिया तो गाँव में दुश्मनी अलग।
वापस लौट पड़े धाकुड़ी की ओर। खर्किया में पत्थरों के मकान के किनारे बी.एस.एन.एल. का एक बड़ा सा डिश दिखा तो जिज्ञासावश वहीं को चले गए। 7-8 साल की दो मासूम बच्चियाँ प्रकट हो गई। डिश के बारे में पूछा तो दरवाजे की कुंडी खोलते हुए उन्होंने बताया कि यहाँ से फोन करते हैं। अंदर एक चारपाई में सैटेलाईट फोन रखा था। हम कुछ पूछते, इससे पहले बच्चियों ने खुद ही बता दिया कि 3 रुपये की एक कॉल है। अपना नंबर वे बच्चियाँ नहीं बता पाईं पाए तो मैंने बागेश्वर में हेमंत को कॉल की। उसने बताया कि यहाँ का नंबर 08991325165 है। इस क्षेत्र की कुशल-क्षेम के लिए ये नम्बर नोट करना हमने जरूरी समझा। यहाँ के अन्य डब्ल्यू.एल.एल. फोन तो विपदा के वक्त ठप्प ही हो जाते हैं। बच्चों से विदा ले हम भगदाणु की चढ़ाई को नापने लगे। दूर उमूला….बाछम के कई गाँवों में होली के अवसर पर बज रहे ढोलों की आवाज से शैलेश मटियानी की याद आ पड़ी। उन्होंने इन ढोलों की आवाज को जो शब्द दिए थे, वे मन में गूँजने लगे- ‘धिन ध्याना कुटी…किन किय्याना कुटी……।’
रास्ते में वन विभाग की नर्सरी के पास से एक मेमने की कातर आवाज से हम सभी चौंके। आसपास भेड़ों के झुंड का कहीं नामोनिशान नहीं था। मगर मेमना खुद ही दौड़ा चला आया हमारे पास। हम आगे-आगे वह पीछे-पीछे। धाकुड़ी पहुँचने पर भेड़ मालिकों का पता किया तो पता लगा कि वे सामने के जंगल में हैं। मेमने को वहीं पहुँचाया तो भेड़ मालिकों ने बताया कि ये अभी छोटा है…..आज आ गया जंगल को…..थक कर सो गया होगा……बाद में जाते ढूंढने। बाघ….तेंदुए से क्या ये बच जाता….? पूछने पर वे बोले…… साब…… तेंदुआ तो बड़ी भेड़ भी ले जाते रहता है अकसर।…..क्या करें….उसने भी अपना शिकार करना ही हुआ। मैदान में नॉर्वे से आए ग्रुप की क्लास चल रही थी शायद, ‘फ्लोरा-फोना’ (हिमालय में बिखरे पुष्प, जड़ी-बूटी) की। ये लोग आज सूपी चिल्ठा जाकर वापस आए थे। दूसरे दिन कर्म्याल चिल्ठा में जाने का इनका प्रोग्राम था।
शाम के वक्त आसमान में बादलों की वजह से सूर्यास्त का नजारा नहीं दिखा। हयात ने रात के खाने पर बुलाया। नॉर्वे के ग्रुप का लीडर शिन्द्रे भी कमरे की अंगीठी में जलाने के लिए कुछ लकड़ियों की फरियाद ले वहाँ आया था। उसे भी
हयात ने खाने पर आमंत्रित किया तो वह खुशी-खुशी चौकी में बैठ गया। उसने अपनी पीड़ा सुनाई, ‘‘दो दिन से परेशान हूँ खाने को लेकर। ये ग्रुप वाले सारा खाना टिंड पैक वाला खा रहे है। आज चूल्हे की रोटी-सब्जी का स्वाद मिला बहुत दिनों बाद।’’ शिन्द्रे पिथौरागढ़ जिले के कुमौड़ में ही रह कर अब विदेशों से आने वाले गु्रपों को घुमाने-फिराने के काम में लगा है। हिन्दी काफी अच्छी बोल लेता है। हयात की मेहनत काफी रहती है खाना बनाने में। सभी जरूरी सामान बाजार से लाना हुआ और बाजार हुआ सौंग, भराड़ी व बागेश्वर। पर्यटकों की सभी जरूरतें पूरी जो करनी हुई। बड़ी ही तेजी से वह रोटियाँ बनाते जा रहा था। अपना समझ कर उसने अपनी परेशानी बतानी शुरू कर दी, ‘‘क्या करें साब …? बंगला देख ही रहे हो। खत्म ही हो गया अब तो। इसकी हालत देख कोई रुकना ही नहीं चाहता इसमें।…मजबूरी में ही कोई आता है या फिर आप जैसे कोई परिचित ही आते हैं। कुछ कर दो साब…..बहुत ही बुरा लगता है। कोई बड़े साब लोग ही आ जाते इधर घूमने को तो शायद इस खंडहर होते बंगले का बेड़ा पार हो जाता। अभी पिछले माह एक अंग्रेजन आई थी……नीचे रुकी वहाँ टीआरसी में। उसका दादा सर ट्रेल के जमाने में यहां पिंडारी तक गया था। उसकी फोटो भी लाई थी वह साथ में। इस बंगले का भी काफी खूबसूरत फोटो था उसके पास उसके दादाजी का खींचा हुआ। उसके साथ फॉरेस्ट के एक बड़े अफसर भी आए थे। सब वहीं नीचे रुके। बंगले की हालत देख कर वे डर रहे थे। आगे पिंडारी तक भी गई वह अंग्रेजन। अब साब ये बंगला ठीक होता तो क्या वे नहीं रुकते यहाँ ? मुझे भी सेवा करने का मौका मिल जाता। मैं तो कह-कह के थक गया हूँ हर किसी से कहते-कहते। बैठने के लिए कुर्सियाँ तक नहीं हैं यहाँ। दो सूट हैं। एक तो वीआईपी था दस साल पहले तक। चार कंबल हैं। कभी कोई आ ही गया मजबूरी में रहने को तो नीचे निगम से बिस्तर-कंबल माँगना पड़ता है। टॉयलेट की हालत तो आपने देख ही ली होगी। अंदर-बाहर सभी जगह से खुल जाता है उसका सड़ा दरवाजा। साब कुछ करा दो इस बंगले का! शायद आपकी बात कोई तो सुनेगा।’’
हयात की बातें सुन इस व्यवस्था पर फिर रोना आया। अंग्रेजों के जमाने में पिंडारी ग्लेशियर मार्ग पर बने इन डाक बंगलों की हालत वास्तव में दयनीय हो चुकी है। किसी जमाने में यात्रा मार्ग की शान रहे पीडब्लूडी के ये बंगले अब भुतहा से हो गए हैं। कमरे को चलते हुए हमारे साथी ने फिकरा मारा कि लोनिवि के मंत्री व अधिकारी को यहाँ एक रात बंद कर दें तो कुछ ना कुछ रिजल्ट जरूर मिलेगा….!
शाम को हमने जंगल से कुछ सूखी लकड़ियाँ बीन रखी थीं। कमरे में आ हम फायर प्लेस में आग जला कमरे को गर्म करने की कोशिश में लग गए। अगले दिन का रूट तय करने में वक्त भी काफी गुजर गया तो सोने की तैयारी करने लगे। अचानक बाहर हो-हल्ला सुनाई दिया। पता लगा कि भराड़ी वाले 15-16 युवाओं की टोली का मुखिया गरज रहा था। ये साहब अल्मोड़ा में पीडब्लूडी में जेई के पद पर हैं। आज वे खाती गाँव से वापस लौट रहे थे। भगदाणु से एक बकरी को आज रात का भोजन बनाने की सोच बकरी को मुक्ति दे वे उसके शरीर को साथ लाए थे। शिकार पकने के लिए उन्होंने स्थानीय दुकान में दे दिया। पीडब्लूडी के दोनो कमरों को पैक जान वे गरजने लगे थे। हमारा दरवाजा भड़ाक से खुला। तीन हिलते हुए, नशे में धुत युवा ब्रिगेड में से एक ने हमें आदेश सुनाया कि यह कमरा उनका बुक किया हुआ है……कल से वे यहाँ हैं। हमने बताया कि कल रात से तो हम रुके हैं यहाँ। वे जरा सकपकाए। फिर अधिकारी जैसा रौब झाड़ते हुए उनमें से एक बोला, जो कुछ भी हो, तुम इस कमरे को खाली करो। यहाँ हम रहेंगे। हमने उसे अपना परिचय दिया तो उसने मोबाइल मिलाना शुरू कर दिया चौकीदार की इन्क्वायरी करते हुए कि चौकीदार कौन है यहाँ का, हयात ? हमने बताया कि यहाँ तो कहीं मोबाइल मिलता नहीं और हयात भाई अपने कमरे में होंगे। तीनों भुनभुनाते हुए बाहर निकल गए। खुले दरवाजों में कुंडी चढ़ा हम सुन्न से हो गए। होली के हुडदंगियों ने यहां भी अराजकता फैलानी शुरू कर दी है। बाहर फिर आवाजें तेज हो रही थीं। हमारे रूखे व्यवहार का गुस्सा वह बाहर निकाल रहा था। बगल के कमरे में नॉर्वे के ग्रुप के कुछ सदस्य भी थे। वहाँ वे लोग कुछ बोल नहीं पा रहे थे। शायद अंग्रेजियत का डर होगा। हो-हल्ला काफी देर तक रहा। फिर हमें नींद आ गई।
सुबह आसमान बादलों से पटा था। लग रहा था कि आज बर्फबारी या बारिश होने वाली है। हयात से हम लोगों ने भारी नाश्ता बनाने को कहा, क्योंकि दिन में कहीं कुछ मिलने की उम्मीद नहीं थी। आज छलड़ी भी थी। कल रात के हुड़दंगियों के बारे में पूछा तो पता लगा कि नीचे निगम में व्यवस्था की गई रात में सबकी। अभी सोये हैं सभी। आज फिर इन्होंने धाकुड़ी की शांति खत्म करनी है। डर हुआ नहीं यहाँ इन्हें किसी का। बिना कपड़ों के नागा बाबा बन जाने वाले ठहरे यहाँ ये लोग। ये लोग अपने घरों में इस तरह का तांडव क्यों नहीं करते ? घर वाले भी तो देखते कि उनके ये ईडियट सपूत भविष्य के प्रति कितने गंभीर हैं। आने वाले वक्त में जब सड़क बन जाएगी तो इस तरह के न जाने कितने नागाओं से यहाँ के बाशिंदे रूबरू होंगे।
नाश्ता निपटा कर हमने हयात से विदा ली। आज सूपी चिल्ठा मंदिर के दर्शन के बाद सूपी गाँव होते हुए सौंग तक यात्रा करनी थी। धाकुड़ी पास तक एक किलोमीटर की चढ़ाई है। शीर्ष में बर्फ से रास्ता पटा पड़ा था। ऊपर से मालवाहक-खच्चरों का दल सामान लेकर आ रहा था। आसमान में सूरज व बादलों के बीच लुका-छिपी चल रही थी। धाकुड़ी पास पर पहुँच हम सूपी चिल्ठा जाने के लिए बाएँ मुड़ गए। यहाँ पर्यटन विभाग के लगे बोर्ड में सूपी चिल्ठा की दूरी दो किलोमीटर लिखी थी। रास्ते में बर्फ अब नहीं थी। हाँ, ढलानों में काफी बर्फ दिख रही थी। दोनों ओर 45 से 60 डिग्री की ढलानों के शीर्ष पर हम चल रहे थे। रास्ता हमारे लिए नया था, सो अच्छा लग रहा था। पेड़ों के झुरमुटों के बीच एकाएक बड़ा सा मैदान आया। कुछ देर अपनी साँस की धौंकनी को थामने के लिए बैठ गए। आगे सीमेंट का गोलाकार जैसा कुछ दिखा। अनुमान लगाया कि शायद चाल-खाल की ही तरह कुछ बनाने की कोशिश की गई है। कुछ आगे बढ़ने पर र्बाइं ओर को नीचे ढलान में एक मैदान में दर्जनों खंदकें सी खुदी हुई नजर आईं। बगल में एक बड़ा व एक छोटा तालाब भी था। समझ में नहीं आया आखिर माजरा क्या है तो नीचे उतर पड़े देखने को। आदमकद के इन खंदकों को देख आर्मी के लड़ाई के मैदान में बनने वाले खंदकों का ध्यान आया। ![]()
इस क्षेत्र में कुछ इस तरह की आशंका वाली बात भी नही थी। बाद में पता लगा कि ये चाल-खाल जनता के पैसों की बर्बादी का एक नायाब नमूना भर हैं। इतनी ऊँचाई पर इनका औचित्य समझ से परे लगा। ग्रामीणों की भेड़-बकरियाँ जाती हैं यहाँ, लेकिन उनकी प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक स्रोत हैं ही। ये खंदक एक तरह से युद्ध के बाद बरबाद मैदान का सा एहसास करा रहे थे।
धीरे-धीरे हम ऊँचाई की ओर बढ़ रहे थे। कहीं-कहीं पर रास्ता संकरा व फिसलन भरा था। खाती गाँव की ढलान की ओर भोज पत्रों के पेड़ देख एहसास हुआ कि हम लोग साढ़े तीन-चार हजार मीटर की ऊँचाई पर हैं। रास्ते में तेंदुए व जंगली मुर्गियों के पगचिन्ह भी बर्फ में जगह-जगह दिखने लगे। अचानक तेज आवाज करते हुए एक मोनाल ने उड़ान भरी। इसके साथ ही कई मुर्गियाँ भी डर कर इधर-उधर भागीं।
आगे चढ़ाई पर बर्फ से पटा पड़ा रास्ता और चिल्ठा मंदिर के दर्शन हुए। बर्फ तीन फीट तक थी। गेटर पहन लिए। (गेटर वाटर प्रूफ कपड़े का बना एक आवरण है, जिसे जूते के ऊपर पहनते हैं। यह घुटने के नीचे तक पाँव को कवर करता है)। थोड़ी मशक्कत के बाद हम सभी चिल्ठा के प्रांगण में थे। यह एक खूबसूरत जगह है। धाकुड़ी के शीर्ष में कर्म्याल चिल्ठा में भी बर्फ पटी पड़ी थी। वहाँ नॉर्वे का ग्रुप बर्फ में अठखेलियाँ करता पेंग्विनों की तरह दिख रहा था। दूर सामने लोहारखेत का पारंपरिक रास्ता और चौड़ास्थल-कर्मी को जाती सर्पाकार सड़क दिख रही थी। इतनी ऊँचाई पर मंदिरों का निर्माण कब, कैसे हुआ होगा ? कोई था नहीं, जिससे पूछते। अचानक बर्फ गिरने लगी। हम तेजी से आगे अन्य मंदिरों को बढे़ ताकि कहीं आश्रय मिल जाए। एक जगह मंदिर से नीचे को सीढ़ी गई थी। वहाँ एक कमरा था, लेकिन उसमें भी ताला लगा था। बर्फ गिरनी अब बंद हो गई। चंद पलों के लिए ही प्रकृति ने अपना ये रूप दिखाया। नीचे रास्ता बर्फ से ढँका था। ये रास्ता सूपी तक ही सीढ़ी वाला काफी थकान भरा है। इससे जाने का मन किसी का भी नहीं हो रहा था। दूर नीचे तलाई सूपी के किनारे खड़ा बीएसएनएल के टॉवर को लक्ष्य कर मंदिर से सीधे 70-80 डिग्री के ढलान में उतरने की सोची। ये रास्ता खतरनाक और आगे बंद होने पर वापस आने की ठान हम तीनों नीचे को खतरनाक ढलान में सधे कदमों से उतरने लगे। भुवनदा ने इशारे से दूर घुरड़ को चरते हुए दिखाया। कैमरे निकालने पर हमारी आवाज सुन वह चौंका और दहशत में कुलाँचे भरता हुआ दूर जा निकला। इतनी ऊँचाई पर आदमजाद को देख शायद उसे लगा होगा कि वह अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है। जंगल काफी फिसलन भरा था। जरा सी असावधानी हमें सैकड़ों फीट नीचे गहरी खाई में धकेल सकती थी। टॉवर को लक्ष्य करते हुए हम दाहिने को जा रहे थे कि एक गहरी चट्टान ने रास्ता रोक लिया। लगभग आधा किलोमीटर नीचे बाएँ को उतरने के बाद फिर दाहिने को रुख किया, लेकिन चट्टान फिर मुँह चिढ़ा रही थी।
नीचे को उतरते रहे और दाहिने को उतरने की कोशिश जारी रखी, लेकिन सफल नही हो पाए। लगभग दो घंटे के बाद हम गाँव वालों के जंगल के बने रास्ते पर आ गए तो फिर हमने उस ओर जाने का विचार ही त्याग दिया और सूपी गाँव का रास्ता पकड़ लिया। सूपी गांव के नजदीक पहुँचते ही ऊपर सीढ़ी वाले रास्ते से आलोक साह भी अपने ग्रुप के साथ दिखे। नरेन्द्र साह जी सीढ़ी वाले इस रास्ते को अद्भुत ढंग से कोस रहे थे…..कौन होंगे इतिहास के वे जाँबाज लोग जिन्होंने इतने भीमकाय पत्थरों को इतनी ऊँचाई तक पहुँचा, सीढ़ियाँ बनाने का चमत्कार कर दिया ? ‘‘सीढ़ियाँ बनाने के सदियों बाद भी वे लोग आज भी याद तो किए ही जा रहे हैं न इस बहाने ?’’ अतुल साह जी की इस बात पर सभी अपनी थकान भूल मुस्करा दिए। सूपी में पूर्व प्रधान शोभन सिंह टाकुली मिले तो उन्होंने रास्ते में मंदिर के प्रांगण में ही चाय मँगा ली। आलोक साह जी द्वारा मँगवाई गई जीप नीचे सूपी तलाई में इंतजार में खड़ी दिख रही थी। सौंग तक सभी का साथ ही चलना हुआ। यह सड़क भी निर्माणाधीन है अभी। सौंग तक यह सड़क कई जगह अभी डराती ही है। आगे भी न जाने कब तक डराती ही रहेगी।
गाँवो-जंगलों, नदी-नालों की ये छोटी-बड़ी पैदल यात्रा हमारी हर वर्ष किसी न किसी क्षेत्र में होती है। हिमालय की गोद में बसे गाँव दूर से दिखने में काफी सुंदर दिखते जरूर हैं, लेकिन यहाँ की रोजमर्रा की समस्याएँ दिन-ब-दिन बढ़ती चली जा रही हैं। विकास के थोथे रूप यहाँ देखने को मिलते हैं। विकास के इन्हीं खंडहरों पर नेता चुनाव के वक्त दूल्हा बने इन क्षेत्रों में उगाही के लिए पहुँच ही जाते हैं।
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