होली अब उल्लास का पर्व न होकर हुड़दंग बन कर रह गई है। अतः इस हुड़दंग से बचने के लिए हम कुछ ट्रैकिंग के साथी पिछले कुछ वर्षों से हिमालय की घाटियों को रुख कर जाते हैं। ये ट्रैक कुछ अलग तरह की ऊर्जा का संचार करते हैं। ऐन बसंत के बीच होने वाले इस ट्रैक को शब्दों में समाहित करना आसान नहीं है। विगत वर्ष जोशीमठ के ऊपर औली में जाना हुआ। इस इलाके की खूबसूरती अपने में अद्भुत है। लेकिन जोशीमठ से बागेश्वर तक के लगभग तीन सौ किमी. के सफर में जिस तरह होली के हुड़दंगियों ने मजा किरकिरा किया, उससे सोचा कि आगे से लंबी यात्रा से बचा जाएगा।
इस बार की होली में एकदम नजदीक की जगह, पिंडारी ग्लेशियर मार्ग में धाकुड़ी को तरजीह दी। धाकुड़ी एक शांत जगह है। पहले भी कई बार वहाँ जाना हुआ है। बागेश्वर से भराड़ी-सौंग तक पक्की सड़क है, लगभग 36 किमी की। ‘हिमालियन माउण्टेनियर्स क्लब’ के दो अलग-अलग ग्रुप बने। एक धाकुड़ी रवाना हुआ और दूसरा चिल्ठा माई (सूपी) के लिए। धाकुड़ी के लिए मैं और साथी भुवन चौबे व यासीन थे तो चिल्ठा माई के लिए आलोक साह, अतुल साह, काकू व नरेन्द्र साह ‘टांट्री’। भुवन चौबे व आलोक साह कुशल पर्वतारोही भी हैं। हमने चतुर्दशी के दिन, दोपहर को जब होलियाँ बाबा बागनाथ मंदिर में आती हैं, उसी वक्त बागेश्वर से भागने की सोची, ताकि मैदान साफ मिले। दो बजे के करीब सौंग पहुँच कर गाड़ी वहीं खड़क सिंह के वहाँ रख कर पैदल आगे बढ़े। आधा किमी की तीखी चढ़ाई के बाद एक पानी के धारे के पास सुस्ताने बैठे। भुवनदा इस रास्ते में सैकड़ों बार पर्यटकों को घुमाने के लिए पिंडारी, कफनी, सुंदरढुंगा, मैकतोली ग्लेशियर के ट्रैक सहित बल्जूरी, थारकोट, भानूटी की चोटियों पर आरोहण के लिए जा चुके हैं। करीब 12 किमी दूर धाकुड़ी पहुँचने में रात होना तय था, जिससे भुवनदा कुनमुना रहे थे। उनकी जिद थी कि रात लोहारखेत के टीआरसी में ही रुका जाए, जबकि मैं धाकुड़ी जाने के लिए आतुर था। लोहारखेत में पीडब्लूडी के बंगले के पास हम चढ़ाई चढ़ रहे थे कि नीचे से कच्ची सड़क पर एक जीप आती दिखी। वह जीप वाला यासीन का परिचित निकला तो उस जीप में ही बैठ गये। यहाँ से टीआरसी करीब किलोमीटर भर ही था। मगर खतरनाक कच्चा रास्ता. ….खड़ी चढ़ाई….फर्स्ट गेयर में जीप….डर लगने लगा।
खलीधार के पास सड़क दो राहों में बँटी थी। मुड़ने के लिए जगह कम होने पर जीप बैक होने लगी। सामने ही टीआरसी का गेस्ट हाउस था, सो मैं उतर गया। मेरे साथी बोले कि अभी कहाँ उतर रहे हो……बैठो अंदर……आगे तक जाना है। मैं बैठ गया। पूछा कि कहाँ तक जाना है तो बताया कि धाकुड़ी के रास्ते पर झंडी धार से आगे कहीं तक जीप जाएगी, वहीं तक चले चलते हैं। मैं फिर डरते-डरते जीप में बैठ गया। नये रास्ते पर जीप चलने लगी। मुझसे रहा नहीं गया तो जीप के चालक मोहन से पूछा कि कहाँ को जाओगे ? उत्तर मिला कर्मी गाँव। मैं खुश हो उठा। पूछा, ‘‘घर क्या कर्मी में ही है ?’’ ‘‘नहीं, …बागेश्वर में… कठायतबाड़ा में।’’ ‘‘इस रास्ते में पहले भी गए हो ?’’ ‘‘हाँ, आठ-दस बार..।’’
जीप सर्पाकार कच्ची सड़क में दौड़ रही थी। कुछ वर्षों पहले तक इन रास्तों पर पैदल चलते हुए हम सोच भी नहीं सकते थे कि इन्हीं रास्तों से कभी हम गाड़ी में बैठ कर निकलेंगे। बुराँश……बाँज के घने जंगलों के बीच से जीप धीरे-धीरे दौड़ रही थी। मोहन से ही पता लगा कि यह सड़क पिंडर घाटी के कर्मी, विनायक, धूर होते हुए बाछम तक जाएगी। इसी में से एक सड़क धूर से बदियाकोट को जाएगी। सड़क धूर से आगे तक बन गई है, मगर जीप अभी कर्मी गाँव के धार, विनायक तक जा रही है। कुछ दिन पहले बर्फ गिरने से आगे का रास्ता फिसलन भरा है। सड़क का काम तेजी से हो रहा है। ठेकेदार काफी सही आदमी हैं…….पिथौरागढ़ के कोई अधिकारी जी। इतनी तेजी से बनती सड़क पहले नहीं देखी थी। मेरा ध्यान मोहन की बातों के साथ ही सड़क के दाएँ-बाएँ फैले संसार को देखने में भी था। नीचे एक काफी बड़ा गाँव फैला हुआ था। पता चला कि चौड़ास्थल है।
जीप को कुछ देर बंद कर इंजन ठंडा करने के बहाने हम गाँव देखने निकले। सीढ़ीदार खेतों में लहलहाती फसलें……बाखलियाँ……घास के लूटे……चारों ओर फैली हरियाली। रास्ते में बच्चों की होली खेलती टोलियाँ अपने में मगन थी। सड़क को अभी सड़क कहना मुनासिब नहीं होगा। कई जगहों पर कीचड़-दलदल से लथपथ थी। इससे कई जगह जीप फिसल भी जा रही थी। चौड़ास्थल गाँव का मंदिर……नीचे स्कूल सा दिखा। यह वही इंटरमीडिएट स्कूल था जो नकल के लिये विख्यात रहा और जहाँ से इन्द्रा हृदयेश ने अपने लड़के का बेड़ा पार लगवाया। सौंग से खड़ी चढ़ाई में एक्जाम के दिनों में फ्लाईंग स्क्वाड का बगैर दिखलाई दिये पहुँचना संभव नहीं होता। हाँ, अब सड़क आ जाने से कई होनहारों के चेहरे जरूर मुरझाने लगे हैं। चौड़ास्थल गाँव की धार पार करने के बाद दूर फैले गाँवों का नजारा दिख रहा था। बीएसएनएल के दो टॉवर मुँह चिढ़ा रहे थे। बने हुए सालों हो गए हैं लेकिन अभी काम करना शुरू नहीं किया है इन्होंने। अलबत्ता आईडिया का नेटवर्क कुछ जगहों में मिल जाता है। पेठी गाँव के किनारे से होकर सड़क बनी है। सड़क के किनारे धारे के नीचे गागर रखे बुढिया माँ गौर से जीप को देख रही थी। उसे शायद यकींन नहीं हो रहा होगा कि उसके जीते-जी विकास के कुछ छींटे यहाँ पड़ ही गए। सदियों से पैदल ही इन पहाड़ों को नापना हुआ। हर गाड़-गधेरा, जंगल सभी की जुबान में रच-बस सा गया ठहरा। अब सड़क आने पर फलाना बैंड, फलाना डाऊन याद करना पड़ेगा।
आगे सड़क में चट्टान गिरी थी। जेसीबी उसे हटाने में लगी थी। हम बाहर निकले। यहाँ पहाड़ों की ढलान 45 से 60 डिग्री तक थी। उतीस सहित पेड़ों की अन्य प्रजातियाँ ढलान की ओर झुकी दिखीं। भुवनदा ने बताया कि इस क्षेत्र की जमीन ‘टिल्ट’ है जिस कारण ये हो रहा है। ‘टिल्ट’ मतलब- जमीन का धीरे-धीरे खिसकना। आगे बढ़ने पर दूर-दूर तक पहाड़ का फैलाव……आसमाँ को चूमते शिखरों की श्रृंखलाएँ। इन शिखरों की जड़ में फैले पत्थरों के मकान हमारे घरों के ऐपण की याद दिला रहे थे। इतनी दूर ये कब व कैसे बसे होंगे? सोच ही रहा था कि ढोलक की धम-धम से तन्द्रा टूटी। पाँच से सोलह-सत्रह साल के नटखट बच्चों की टोली दिखी। होली है…….की सकुचाई हुई उनकी आवाज सुनाई दी। रंग व हुड़दंग का डर भी लगा। मगर होल्यारों की ये टोली शर्माई सी थी। दो बच्चों ने लड़की का जो स्वांग रचा था, उससे तो एक पल के लिए हम सभी हैरत में आ गए। हूबहू लड़की!
अब जीप ढलान पर थी। नई बन रही सड़क कई जगहों पर भयानक थी, मगर मोहनदा को टोकने में भी डर लगता था कि ध्यान गड़बड़ाने से कहीं वह संतुलन न खो दे। वैसे भी लगता था कि वह किसी अलग ही नशे में खोया हुआ सा है। बातों-बातों में पता लगा कि कामदेव ने उस पर अपना सारा तरकश खाली कर दिया है। मदहोश सा गाड़ी चलाता हुआ अपनी प्रेमिका से मिलने जा रहा था। कुछ दिन पहले गिरी बर्फ से पहाड़ की चोटियों में सफेदी दिख रही थी। गाँवों में गिरी बर्फ पिघल चुकी थी, मगर उसकी नमी की वजह से सड़क के कई मोड़ों पर दलदल बना हुआ था। बार-बार फिसल रही जीप को मोहनदा काफी सधे ढंग से चला रहा था। नीचे कर्मी गाँव दिखने लगा। काफी समृद्ध व फैला हुवा गाँव है। सड़क के किनारे गाँव के कुछ बच्चों के साथ एक युवती दिखी। इन्हें भी आगे तलाई कर्मी तक जाना था। सभी जीप में आ गए। बच्चों के साथ आई युवती कविता ने बताया कि कर्मी गाँव अब दो जगहों पर सड़क से जुड़ गया है। एक सरन से दूसरा चौड़ास्थल-सौंग से। सरन वाली सड़क अभी गाँव से किलोमीटर भर दूर अटकी पड़ी है। नीचे एक खंडहरनुमा दीवार, जिसकी छत बन नहीं सकी थी, को दिखा भुवनदा बोले कि ये कर्मी का खाद्यान्न गोदाम है। कागजों में ये अच्छी-खासी बिल्डिंग़ है। यहाँ राशन का कोटा तो कभी-कभी पहुँच ही नहीं पाता, लेकिन कागजों का पेट जरूर भर जाता है। कर्मी के शीर्ष की पहाड़ी से चाँद भी दिखने लगा। हिचकोले खाती जीप एक बार फिर रुक पड़ी। इस बार होल्यार उम्रदराज बुजुर्ग से दिखे। मैं जीप से बाहर आ गाँव को निहारने लगा। आठ-दस बुजुर्गों ने मोहनदा को प्यार से घेर लिया। अरे! मोहना एगीछै तू…..ये को छन ? टूरिस्ट तो नहीं लगते। कई सवालों के बाद उन्होंने मोहनदा को छोड़ा, ये हिदायत देते हुए कि विनायक के बाद गाड़ी फिसल रही है, आगे मत जाना। ये लोग भी आज यहीं रह लेते तो अच्छा था। जीप चलने के बाद भी पीछे से आवाज आ रही थी, जल्दी आना। आज शिकार बन रहा है। आगे खेतों में जड़ी-बूटी उगी थी। कविता ने कई जड़ी-बूटियों के बाबत बताया। कविता के पिताजी भी आगे मोहनदा के बगल में बैठ गए थे नीचे से। होली की मस्ती में थे।
विनायक की धार पर जीप रुकी। हमने मोहन को विदा कर अपनी आगे की राह पकड़ी। मोहनदा खुश था। उसे उसकी मंजिल मिल गई थी। विनायक धार के लिए नीचे कर्मी से सर्पाकार सीढ़ी का रास्ता बना दिख रहा था। भुवनदा को अपना पुराना एक ट्रेक याद आ गया, जब वे होली में ही भराड़ी के पास रीठाबगड़ से पैदल एक दिन में इसी रास्ते होकर बदियाकोट गए थे और इसी विनायक धार पर जम कर सुस्ताए थे। साँझ हो चली थी। विनायक से पिंडर पार बदियाकोट दिख रहा था। सड़क नीचे को सर्पाकार जा रही थी। आज नाईट मार्च होना था। सड़क में किनारे की ओर बर्फ बिछी थी। अंधेरा भी तेजी से हो रहा था। हम तेजी से चलने लगे। कर्म्याल चिल्ठा की पहाड़ी का अनुमान लगा हमने जंगल से उस दिशा को जाना तय किया। कर्म्याल चिल्ठा के नीचे ही धाकुड़ी है। सड़क से ऊपर को चढ़ाई चढ़ने लगे तो जंगल घना होता चला गया। रास्ता स्पष्ट दिखा नहीं। दिन में तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं। रात में ये संभव नहीं हो पाता। जंगल की मृग मरीचिका में भटकने की जिद छोड़ वापस सड़क का रुख किया। लगभग दो-ढाई किलोमीटर के बाद धूर गाँव दिखा। कोई मिल जाता तो उससे जंगल का रास्ता पूछ लेते, वरना फिर सड़क के साथ-साथ भगदाणु तक जाते और फिर वहाँ से अपने पारंपरिक रास्ते में आ जाते। ये सोच कर भुवनदा ने आवाज दी- ‘कोई है……’
नीचे मकानों में से एक आवाज आई तो उनसे पूछा कि धाकुड़ी का रास्ता जंगल होकर कौन सा है ? उन्होंने बताया और सशंकित होते हुए पूछा कि धाकुड़ी जाना क्या जरूरी है ? रात हो चली है….रुक जाते। हमने उन सज्जन का दूर से ही धन्यवाद अदा कर जंगल का नया बना खड़ंजा वाला रास्ता पकड़ा। आगे घास का मैदान देख थोड़ी देर सुस्ताने की सोच वहीं बैठ गए। थैलों में से कुछ चबैना निकाल आपस में बाँटा। चाँद आज अपनी पूरी रोशनी में था। आगे जंगल घना होता चला जा रहा था। जंगली जानवरों का भय भी बना था दिमाग के किसी कोने में। पहले कभी इस तरह का भय नहीं हुआ था रात में जाने में। तेंदुवे, भालू सहित सभी जानवरों का आशियाना ‘दोपाया’ इंसान उजाड़ता जा रहा है। मजबूरन इन्हें इंसानी बस्ती में भोजन की खोज में आना पड़ रहा है। इंसान और इनकी अस्तित्व की लड़ाई में आजकल मारामारी मची हुई है। इंसान के हावी होने से ये अब हर पल खौफजदा हो आक्रमण कर बैठते हैं। इस डर से कि हम भी ‘दोपाया’ हैं, हम बातें करते हुए चल रहे थे, ताकि आवाज से जानवर दूर ही रहें। नया बन रहा खड़ंजा भी किलोमीटर भर की दूरी के बाद साथ छोड़ गया। अब अपने माउंटेनियरिंग ज्ञान से ही आगे बढ़ना था। टार्च निकाल लिए गए। आस-पास फैल गए। कुछ देर बाद रास्ता खोजने के बाद पगडंडी के कुछ अवशेष से दिखे तो सब इकट्ठा हो साथ-साथ चलने लगे। रात में चुपचाप चलने में क्या बात करें…! भुवनदा को ही जिम्मेदारी सौंपी कि ‘बड़े हो, तुम्हारी ही ड्यूटी लगी’। भुवनदा ने अपने पिटारे से नई ताजी फिल्मी स्टोरी निकाली। बकौल भुवनदा वे आज तक कोई पिक्चर पूरी नहीं देख पाए हैं। और यही हाल मेरा भी है। भुवनदा ने मोर्चा संभाला, ‘थ्री इडियट्स’ देखी है ? मैंने एड खूब देखी, लेकिन पिक्चर नहीं देख पाया हूँ अभी तक। भुवनदा अपनी लय में शुरू हो गए कि यार…बड़ी जबरदस्त है। रात में जंगल की चढ़ाई और भुवनदा की ‘थ्री इडियट्स’ की कहानी चाँदनी रात में भली लग रही थी। दो घंटे अनवरत चलने के बाद पेड़ों के झुरमुट से धाकुड़ी का पीडब्लूडी का डाक बंगला दिखा। लगभग साढ़े नौ बज रहे थे। मैदान में पहुँचते ही डाक बंगले का रखवाला हयात सिंह हमें देखते ही चिहुँका…….अरे ! साब….इतनी रात को वो भी जंगल के रास्ते ? हद कर दी आप लोगों ने। बाहर मैदान में नॉर्वे से आए 16 सदस्यों के ग्रुप के टैंट लगे थे। डाक बंगले का एक कमरा उन्हें दिया गया था। एक खाली कमरा हमारे लिए खोल उसने खाने को पूछा। हमने उसकी परेशानी को समझ कर मना किया, लेकिन वह माना नहीं और कॉफी ले ही आया। अपने साथ लाए इमरजेंसी फूड का निवाला ले हम सो गए।
अलस्सुबह नींद खुल गई। सामने मैकतोली, नंदा कोट की चोटियाँ सूर्योदय की आभा में लालिमा बिखेर रहीं थीं। हयात चाय ले आया था। उसने हमारे आज के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो उसे बताया कि आज नीचे, जहाँ तक सड़क का कटान हो रहा है, वहाँ तक जाने की सोची है। नाश्ता ले चुकने के बाद हम खाती गाँव के रास्ते में भगदाणु व खर्किया की ओर चल पड़े। रास्ते में वन विभाग का हर्बल गार्डन दिखा। चारों ओर से पत्थरों की ऊँची दीवार बनी हुई थी। छोटे से गेट पर ताला लटका हुआ था। भुवनदा ने बताया कि 2008-09 में बने इस गार्डन का उद्देश्य जड़ी-बूटी के साथ ही पर्यटन को बढ़ावा देना था। पर्यटक रास्ते में आते-जाते कुछ पल यहाँ विश्राम कर हर्बल गार्डन को देख-समझ सकता है। दीवार फाँद कर हम गार्डन में पहुँचे। वन विभाग का एक बोर्ड में चेतावनी थी- गार्डन के अंदर के प्रजातियों को तोड़ना, उखाड़ना व सूँघना मना है! ये चेतावनी किसके लिए थी, पता नहीं लग सका। क्योंकि गेट पर तो हमेशा ही ताला लटका रहता है। गार्डन में एक कोने में ईको टूरिज्म के नाम पर एक शेल्टर भी बना रखा है। इस तरह के शेल्टर रास्ते में कई जगह बनाए गए हैं। चारों ओर से खुले हुए इन शेल्टरों में हल्की बारिश में भी बचना मुश्किल होता है, तब इन्हें बनाने का क्या औचित्य होगा ? पैंसा खाने की नई जुगत ? गार्डन में थाम, रिंगाल, तेज पत्ता, थुनेर-टेक्सास बकाटा, अतीस, जटामासी, कुटकी, सालम मिश्री…….सब एक ही जगह देख वन विभाग की खाना-पूर्ति का एक नायाब नमूना मिला। गार्डन में ऊँचाई व निचले इलाकों में उगने वाली प्रजातियों को एक साथ देख-भालू, साईबेरियन बाघ, बंदर, हाथी…….की तरह इन्हें भी चिड़ियाघर की तरह हर्बल गार्डन में वन विभाग का अद्भुत कारनामा देख हम आगे भगदाणु को चल पड़े। भगदाणु लगभग दस-पन्द्रह मवासों का रास्ते के दोनों ओर फैला हुआ छोटा सा गाँव है। होली की बजाय लोग यहाँ अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में डूबे दिखे। आगे रास्ता उतार का है। सड़क का काम यहाँ भगदाणु के नीचे एक चट्टान के आ जाने से धीमा हो गया है।
(अगले अंक में जारी)