पिछले एक-दो साल से ऐसा बार-बार होने लगा है कि कुछ-कुछ दिनों बाद किसी न किसी करीबी के बिछुड़ने की खबर मिल जाती है। वैसे तो मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है, मगर अपने किसी भी परिचित, करीबी या आत्मीय की मृत्यु मन को गहरे तक विचलित कर ही देती है। भगत दा का जाना भी कुछ ऐसा ही अवसाद पैदा कर रहा है।
नन्दकिशोर भगत यानी भगत दा से मेरा परिचय नैनीताल समाचार की अपनी पाठशाला में ही हुआ था। पहली बार जब मैं उनसे मिला था तब हरीश पन्त या राजीव दा में से किसी ने मेरा उनसे परिचय कराया था, ये भगत दा हैं। मैने हाथ जोड़े, हाथ मिलाया और उन्होंने पूछा कब आए ? मैने जब उन्हें बताना शुरू किया तो तब तक वे किसी स्थानीय अखबार को पलटने में जुट चुके थे। कुछ देर बैठे रहने के बाद वे अचानक उठे, झोला उठाया फिर बोले, अभी तो रहोगे ? और मुझे ऐसा लगा था कि मेरा जवाब सुनने से पहले ही वे सीढि़याँ उतर चुके थे।
नैनीताल समाचार के उन सबसे सक्रियता और जोश से भरे दिनों में भगतदा को करीब से जानने, उन्हें समझने और उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मुझे लगातार मिलता रहा। वे सबसे अलग तरह के गुरु थे। गुरुओं में सबसे अलग। हालाँकि एक तरह की लापरवाही और उदासीनता हमेशा उनके आसपास दिखाई देती थी। मगर जैसा वे दीखते थे, थे उसके ठीक उलट। वे बेहद जिम्मेदार थे और कभी भी किसी भी मुद्दे पर उदासीन नहीं रहते थे। हालाँकि हर मुद्दे के विश्लेषण का उनका तरीका एकदम अलग होता था। वे हमेशा हर बात का अपनी ओर से विश्लेषण जरूर करते थे और फिर अपने निष्कर्षो के आधार पर मामले में हस्तक्षेप करने या तटस्थ रहने का फैसला लेते थे।
नैनीताल समाचार के उन उत्साह से लबालब दिनों में भगत दा हमेशा हर निर्णय में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते थे। सबको यह जानने की उत्सुकता जरूर रहती थी कि भगत दा इस बात पर क्या कहेंगे ? वे हमेशा दूसरों से अलग सोचते थे। गिरदा के साथ उनका वैचारिक द्वन्द्व चिरस्थायी था। गिरदा प्रायः अपने तर्कों को अपने खास अन्दाज और तेवरों में ज्यादा दखल के साथ पेश करता था, जबकि भगत दा हमेशा अपनी बात को बहुत धीर, गम्भीर और सांकेतिक अन्दाज में कहते थे। बहस के किसी निष्कर्ष पर न पहुँचने की स्थिति में जहाँ गिरदा अधिकारपूर्वक ‘‘हमने अपनी बात रख दी है, अब इसे कैसे करना है, यह तय करना आपका काम है,’’ कह कर अपनी बात खत्म करता था, वहीं भगत दा सलाह या सुझाव के अंदाज में अपनी बात रख कर अनिर्णय या अपनी बात अस्वीकार होते देखने की स्थिति आने से पहले ही बहस से उठ जाते थे। संन्यासियों का सा यह अन्दाज उनके व्यक्तित्व का एक खास गुण था। अनेक बार बहस के बीच में यह पता तक नहीं चल पाता था कि भगत दा कब उठ कर चले गए, कब गायब हो गए?
भगत दा जो सोचते थे वह हमेशा दूसरों से अलग और मौलिक होता था। नैनीताल समाचार में उनके लिखे ‘सौल कठौल’ इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि भगत दा कितनी साफगोई से लिखते थे। भगत दा की कहानियाँ एक जमाने में बहुत चर्चित हुई थीं। लेकिन शायद कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियों ने उनके कहानीकार मन को कहीं कुम्हला दिया था। इन जिम्मेदारियों ने उनके अन्दर की सम्भावनाओं के सागर को छलकने से रोक दिया और शायद यही घुटन उनके व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग बन गई। लेकिन बार-बार यह सागर उनके अन्दर उफान भरता रहा और विभागीय पत्रिकाओं-पुस्तकों से लेकर पर्वतीय और नैनीताल समाचार तक यदा कदा वह बाहर भी छलकता रहा। अभी एक-दो वर्ष पहले जिन दिनों मैं ‘डी एन ए’ का संपादन कर रहा था उन दिनों भी भगत दा ने उसमें अपना एक व्यंग कालम लिखने की इच्छा जाहिर की थी। पहली रचना हमने छापी भी थी, मगर फिर यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ पाया। मैने उनसे दो-तीन रचनाएँ साथ भेजने का अनुरोध किया था मगर यह अनुरोध अनुरोध ही रह गया।
शरीर से बहुत दम खम वाले न होने पर भी भगत दा में बहुत आत्मिक बल था। व्यक्तिगत समस्याएँ और दुःख-दर्द किसी से बाँट न पाने की आदत ने उन्हे शराब का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया और इस घातक सहारे ने उनके शरीर को बहुत कष्ट दिए। हालाँकि इस लत के बावजूद वे अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटे। पूरी गम्भीरता से उन्हे निभाते रहे। लेकिन इस लत ने उनके शरीर को बहुत कमजोर बना दिया था और इसके चलते उन्हे काफी कष्ट भी उठाने पड़े। लेकिन उनका मन कभी नहीं हारा। हल्द्वानी में सुशीला तिवारी अस्पताल में अन्न जल छूट जाने के बाद भी उन्होंने हरीश पन्त से एक दैनिक अखबार की 6 महीने की लागत का हिसाब बनाने को कहा था। यानी उनके मन में उस वक्त भी कुछ चल रहा था।
उन्हे चीजों को गहराई से समझने में महारत थी। चाहे कानूनी मुद्दे हों या सामाजिक सरोकार, वे हमेशा चीजों को गहराई से विश्लेषित करते। अपनी समझ और तार्किकता से अपना नजरिया बनाते। हालाँकि वे दूसरों पर उसे थोपने या लादने से हमेशा परहेज रखते थे। वे बँधी-बधाई लीक पर चलने या ‘लाईन’ का अंधानुकरण करने में भी यकीन नहीं रखते थे। जिन्दगी की रेल-पेल में जिस तरह के दबाव उन्होने झेले, उनको भी दूसरों के साथ बाँटने में उन्हें बहुत आनन्द नहीं आता था। इसीलिए वे अपना रोना भी दूसरों के आगे कभी नहीं रोते थे। युवावस्था के साथी कलमकारों का बढ़ता कद उन्हें बहुत सुख देता था मगर इस सुख का सार्वजनिक प्रकटीकरण करने में भी उन्हे बहुत हिचक होती थी।
औघड़ों जैसा हठ और अनिश्चितता उनके व्यक्तित्व में बार-बार दिखाई देती थी। वे जितनी आसानी से नाराज हो जाते थे, उतनी ही आसानी से मान भी जाते थे। नैनीताल समाचार का सहकारी प्रकाशन बनना भगतदा की ही सोच थी। वे इसके जरिए समाचार को न सिर्फ बार-बार आर्थिक कारणों से बन्द हो जाने के खतरे से बचाना चाहते थे बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और लाभकारी बनाना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए बहुत प्रयास किए। मगर बीच में जब कुछ मित्रों द्वारा इसको लेकर सवाल उठाए जाने लगे तो वे नाराज हो गए। पूरा काम ठप हो गया। फिर किसी तरह उन्हें राजी किया गया तो उन्होंने एक झटके में नैनीताल मुद्रण एवं प्रकाशन सहकारी समिति के गठन की सारी औपचारिकताएँ पूरी करके ही दम लिया। इसके बाद फिर कुछ मतभेद हुए तो वे फिर अलग हो गए। फिर दुबारा मनाने की कोशिश की गई और वे फिर से काम में जुट गए। मगर जब उन्हें हर ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और उनकी आर्थिक स्वावलम्बन की कल्पना पर ही सवाल उठने लगे तो उन्होंने अपने को उस काम से पूरी तरह अलग कर दिया और आज भी नैनीताल समाचार की प्रकाशक, नैनीताल मुद्रण एवं प्रकाशन सहकारी समिति का काम एक औपचारिकता की तरह ही चल रहा है। लेकिन भगतदा ने अपनी उस कल्पना और अपने उस सपने को अकेले दम पर एक दूसरी जगह पूरा करके दिखाया, ‘फ्रूटेज’ के रूप में।
‘फ्रूटेज’ उनके अनुभवों और सपनों का वास्तविकता के धरातल पर उतरना था। जब वे इस काम को शुरू करने की तैयारी कर रहे थै, उस समय तक इस तरह के कई प्रयोग असफल हो चुके थे। कई लोग सब्सिडी डकार कर मोटे हो चुके थे और फल उद्योग के इस काम को एक तरह से असफल काम मान लिया गया था। भगत दा ने सब कुछ जानते हुए भी अपनी योजना और अपनी मेहनत से इस काम में हाथ डाला और उसको सफलता की मंजिल तक पहुँचा कर ही दम लिया। फ्रूटेज उनकी जिद थी, जिसे संजू (अपने पुत्र संजीव भगत) के सहारे उन्होने हकीकत बना दिया।
यह एक उदाहरण ही इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि उनमें कितनी सम्भावनाएँ थीं। बौद्धिक परजीवीयों से उल्टे उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाए अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ के दम पर, अपने संकल्प और अपनी सोच के बल पर जिस सपने को साकार किया वह आज न सिर्फ नैनीताल आने वाले पर्यटकों के बीच वापसी में अपने साथ ले जाने वाला सर्वश्रेष्ठ स्मृति चिन्ह बन चुका है, बल्कि बीसियों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार भी दे रहा है। लेकिन इस सपने को सच बनाने के लिए उन्होंने बहुत पापड़ बेले थे। उन्होने कई-कई बार लखनऊ के चक्कर लगाए। सरकारी बाधाओं से लड़ते रहे। स्थानीय स्तर पर भी समस्याएँ बहुत थीं। संजू को भी इस बात के लिए राजी करना एक कठिन काम था कि वह अपनी पसंद का काम या रोजगार ढूँढने की कोशिशों के बदले इस तरह की आशंकाओं से भरे काम में मन लगाए। मगर एक-एक कर अपने ही तरीके से, किसी दूसरे को कष्ट दिए बिना उन्होंने सारी बाधाएँ पार कीं और आज फ्रूटेज न सिर्फ एक लाभकारी उद्योग बन चुका है, बल्कि उत्तराखण्ड के दूसरे युवा उद्यमियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी है। भगत दा हमेशा सक्रिय रहते थे। उमेश डोभाल ट्रस्ट के प्रायः हर कार्यक्रम में वे जरूर भागीदारी करते थे। आभिजात्य, बनावट या वैचारिक अतिवाद से उन्हें जरूर परहेज रहता था, मगर सड़क पर होने वाले किसी भी कार्य में वे जरूर हिस्सेदार होते थे।
भगत दा अक्सर कहते थे, ‘‘…ठीक हो गया…..बस ठीक हो गया।’’ लेकिन आज लग रहा है कि उनका इस तरह चले जाना ठीक नहीं हुआ। बिल्कुल ठीक नहीं हुआ। भगत दा तुम बहुत याद आओगे और जब-जब याद आओगे अपनी गहरी आँखों से हमें कुछ सपने, कुछ उम्मीदें जरूर दे जाओगे।