दुर्गम परिस्थितियों में रोजगार की तलाश में निकला एक युवक जन संघर्षों की समझ को विकसित करते, मार्क्स-लेनिन की थ्योरी को समझते, मजदूरों के आंदोलन को आगे बढ़ाते ‘यायावर’ बन जाता है। चन्द्रसिंह ‘यायावर’ 21 नवम्बर को कैंसर की असाध्य बीमारी से जूझते, जीर्ण तन किंतु स्वस्थ मन लिए हमसे विदा हो गए। मई 2007 में चिकित्सकों ने उन्हें गले का कैंसर घोषित कर दिया था। लेकिन जिजीविषा के धनी यायावर ने हार नहीं मानी। लगातार मीटिंगें, सेमीनारों, पत्र लेखन व आलेखों के जरिये अपना वह काम कर रहे थे जो उन्होंने स्वयं चुना। काम था उत्तराखण्ड आंदोलन, जन चेतना का प्रसार, विकास और उसके अवरोधों को पहचानना, उत्तराखण्ड के नाम से लेकर उसकी समृद्ध संस्कृति की पहचान को आगे बढ़ाना।
चमोली जिले के गैरसैण प्रखण्ड में मेहलचौरी के पास लालधार गाँव में माता गंगोत्री देवी व पिता नयन सिंह के घर 4 अक्टूबर 1935 को जन्मे चन्द्रसिंह की प्राथमिक शिक्षा रामपुर (चौखुटिया) व जूनियर हाईस्कूल चौखुटिया से हुई। तब वे अपने ननिहाल सिमलखेत में रहते थे। 2008 में बीमार होकर भी वे अपने ननिहाल से ही गये। कहना न होगा कि सिमलखेत से उन्हें अपनत्व का असीम पाठ मिला। आम पहाड़ी युवक की तरह मिडिल पास कर वे रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली चले गये। वहीं मैट्रिक किया। सन् 1954 में डाक तार विभाग से सरकारी सेवा प्रारम्भ करने वाले चन्द्रसिंह 1957 में केन्द्रीय सचिवालय सेवा में आ गये। 19 सितम्बर 1965 को केन्द्रीय कर्मचारियों की एक दिवसीय हड़ताल के मुख्य कर्त्ता के रूप में चिन्हित हो नौकरी से घर बैठ गए। बाद में यूनियन की सरकार से हुए समझौते से बहाली हुई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभावशाली फैडरेशन ऑफ सेन्ट्रल सेक्रेटरियट इम्प्लाइज में सक्रिय चन्द्रसिंह कॉमरेड पार्वती कृष्णन व श्रीपाद अमृत डांगे जैसे छठे दशक के शीर्ष कम्युनिस्टों के निकट सम्पर्क में रहे। मार्क्स व लेनिन की विचारधारा का उन्होंने गहन अध्ययन किया। भारत, रूस अथवा चीन के साम्यवाद के साथ लेटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का गहन अध्ययन उनके पास था। सरकारी सेवा के दौरान अपनी सोच को विकसित करने का कोई अवसर जाया न करने वाले यायावर सहकारिता के प्रबल समर्थक थे।
समय से पूर्व 1987 में सेवानिवृत्ति लेते समय उनके दो पुत्र तथा एक पुत्री सरकारी सेवा में थे। वे चाहते तो दिल्ली में आराम से रिटायर्ड जिन्दगी गुजारते। लेकिन उत्तराखण्ड जिसके सपनों में बसता हो, आम आदमी की पीड़ा जिसे विचलित करती हो, वह दिल्ली की भव्यता में कैसे कैद रहता ? धर्मपत्नी को साथ ले आ पहुँचे लालधार और शुरू हो गया जनजागरण। आधार संस्था का गठन, ‘उत्तरा महोत्सव, महिलाओं की खेलकूद प्रतियोगिताएँ, कवि सम्मेलन।
सन् 1994 का उत्तराखण्ड आंदोलन। गैरसैंण में सबसे ऊँची आवाज में नारे लगाने वाले आंदोलनकारियों में से एक। किसी भी मोर्चे पर कभी ना नहीं सुनी जाती। 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली रैली और 1996 में उत्तराखण्ड राज्य के लिए आमरण अनशन, गिरफ्तारी, पदयात्राएँ, राज्य प्राप्ति के हर उद्यम में वे आगे और आगे।
सी.पी.आई (एम.एल.) से जुड़े, अलग हुए। उत्तराखण्ड समन्वय व परिवर्तन मोर्चों की बैठकों में बेबाकी से अपने विचार रखते, उनका चिन्तन-मनन और विचार को सहमति मिलती। सन् 2006 में पत्नी की मृत्यु ने उनमें कहीं एकाकी होने का दंश दिया और वे भी अस्वस्थ रहने लगे थे। लेकिन उनके मन ने हार नहीं मानी । एक साल से बोलने में असमर्थ व ग्रास नली में तरल भोज्य हेतु लगी नलिका, जीर्ण शारीरिक अवस्था के बावजूद ‘युगवाणी’ के सितम्बर 2009 के अंक में प्रकाशित उनका पत्र- ‘‘कोस्टारिका एक छोटा देश है। वहाँ सेना नहीं है और सैन्य व्यय जनता के विकास में खर्च होता है। भारत में ऐसा कहना देशद्रोह से कम नहीं होगा। बढ़ते सैन्य बजट के बीच प्रभावित होते विकास के बारे में क्या सोचा जा सकता है….।’’ कितने स्वस्थ मन का परिचायक है।
रीजनल रिपोर्टर व नैनीताल समाचार में उन्होंने दर्जनों लेख लिखे। उनकी प्रतिक्रियाएं अपने आप में बेमिसाल थीं। उनके व्यंग्य बेमिसाल होते थे। राज्य गठन के बाद एक बार लिखा-‘‘उत्तर प्रदेश से अलग होते समय क्या उत्तराखण्ड की सत्ता ने नहीं सोचा कि बरेली और आगरा हमारे पास नहीं हैं। क्या उत्तराखण्ड को मानसिक रुग्णालय की आवश्यकता नहीं होगी ?’’ मेहलचौरी में यायावर का लिखा पोस्टर चिपका-‘‘राशन कार्ड दो रुपया में बनता है, न अधिक लें और न अधिक दें।’’ जन शिक्षण का यह अनोखा तरीका यायावर ही इजाद कर सकते थे। महिला मंगल दल को सक्रिय करना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जागरण, हाथ से लिखे पत्रों, पोस्टर और आधार पुस्तकालय कितना उत्साह, कितनी आग कितनी लगन, कितना परिश्रम। सफेद कागज पर लाल स्याही से लिखे पोस्टर पेशावर दिवस के याद दिलाते तो कार्यक्रमों की जानकारी देते। पाठक रूप में दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों पत्र उनकी व्यापक पैनी सोच को दर्शाते हैं। पर्वतीय पत्रकार एसोसिएशन की तहसील इकाई के संरक्षक बनने पर उनकी विनम्र प्रतिक्रिया थी, ‘‘मैं पत्रकार नहीं हूँ।’’
यायावर जी आपको प्रणाम। अमरता शायद इसे ही कहते हैं।