भीमताल से आये उस फोन ने मुझे हिला कर रख दिया। मेरा दोस्त फ्रैडरिक स्मेटाचैक नहीं रहा था। पिछले दस सालों से खराब स्वास्थ्य से जूझ रहा, शय्याग्रस्त फ्रैडी हमें छोड़ कर चला गया था। कुछ समय पहले मैंने उस पर एक लेख अपने ब्लॉग ‘कबाड़खाना’ पर लगाया था, जिसे बतौर श्रद्धांजलि मैं पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। ![]()
वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन वाले जापानी मासानोबू फुकुओका और वर्मीकल्चर के प्रतिनिधि ऑस्ट्रियाई किसान सैप होल्जर फिलहाल विश्वविख्यात नाम हैं और दुनिया भर के पर्यावरणविद उन्हें हाथोंहाथ लेते हैं। उनकी लिखी किताबों की लाखों प्रतियाँ बिका करती हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर के कामों को मीडिया द्वारा पर्याप्त ख्याति दिलाई जा चुकी है। लेकिन उत्तराखंड के कोटमल्ला गाँव के बंजर में बीस हजार पेड़ों का जंगल उगाने वाले जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ जैसे प्रकृतिपुत्रों को उनके हिस्से का श्रेय और नाम मिलना बाकी है। ठीक ऐसा ही 15 फरवरी की सुबह हमें छोड़ गये मेरे प्यारे दोस्त फ्रेडरिक स्मेटाचेक (जूनियर) के बारे में भी कहा जा सकता है।
भीमताल की जून एस्टेट में दिवंगत फ्रेडरिक स्मेटाचेक (जूनियर) के घर में एशिया का सबसे बड़ा व्यक्तिगत तितली संग्रह है। हल्द्वानी से भीमताल की तरफ जाएँ तो पहाड़ी रास्ता शुरू होने पर चीड़ के पेड़ों की बहुतायत मिलती है। हमारे वन विभाग की मेहरबानी से पहाड़ों में कल्पवृक्ष के नाम से जाने जाने वाले बाँज के पेड़ों का करीब करीब खात्मा हो चुका है। जून एस्टेट में चीड़ के पेड़ खोजने पड़ते
हैं। यहाँ केवल बाँज है, दशकों से सहेजा हुआ।
फ्रेडरिक के पिता फ्रेडरिक स्मेटाचेक (सीनियर) 1940 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में यहाँ आकर बस गए थे। चेकोस्लोवाकिया के मूल निवासी लेकिन जर्मन भाषी फ्रेडरिक स्मेटाचेक हिटलर विरोधी एक संस्था के महत्वपूर्ण सदस्य थे। उनकी मौत का फतवा बाकायदा हिटलर के दस्तखतों से जारी हुआ। जान बचाने की फेर में फ्रेडरिक अपने कुछ साथियों के साथ एक पुर्तगाली जहाज पर चढ़ गए। यह जहाज कुछ दिनों बाद गोआ पहुँचा। गोआ में हुए एक खूनी संघर्ष में जहाज के कप्तान का कत्ल हो गया। सो बिना कप्तान का यह जहाज चल दिया कलकत्ता की तरफ।
कलकत्ता में फ्रेडरिक स्मेटाचेक ने बाटा कम्पनी में नौकरी कर ली। इत्तफाक से इन्हीं दिनों अखबार में छपे एक विज्ञापन ने उनका ध्यान खींचा। कुमाऊँ की नौकुचियाताल एस्टेट बिकाऊ थी। उसका ब्रिटिश स्वामी वापस जा रहा था। मूलतः पहाड़ों को प्यार करने वाले फ्रेडरिक (सीनियर) को फिर से पहाड़ जाने का विचार जँच गया। वे कलकत्ता से नौकुचियाताल आ गए और फिर जल्दी ही उन्होंने नौकुचियाताल की संपत्ति बेचकर भीमताल की जून एस्टेट खरीद ली जो फिलहाल उनके बेटों के पास है।
नौकुचियाताल और भीमताल के इलाके में फ्रेडरिक स्मेटाचेक (सीनियर) ने प्रकृति और पर्यावरण का गहन अध्ययन किया। खासतौर पर इस इलाके में पाए जाने वाले कीट पतंगों का और तितलियों का। पर्यावरण के प्रति सजग फ्रेडरिक ने अपने बच्चों को प्राकृतिक संतुलन का मतलब समझाया और पेड़-पौधों, जानवरों, कीट-पतंगों के संसार के रहस्यों से अवगत कराया। 1945 के साल से फ्रेडरिक स्मेटाचेक (सीनियर) ने तितलियों का वैज्ञानिक संग्रह करना शुरू किया, जो अब एक विशद संग्रहालय बन चुका है। संग्रहालय के विनम्र दरवाजे पर हाफ पैंट पहने हैटधारी स्मेटाचेक (सीनियर) का फोटो लगा है।
स्मेटाचेक सीनियर के मित्रों का दायरा भी बहुत बड़ा था। विख्यात जर्मन शोधार्थी लोठार लुट्जे अक्सर अपने दोस्तों के साथ जून एस्टेट में रहने आते थे। इन दोस्तों में अज्ञेय और निर्मल वर्मा भी थे और विष्णु खरे भी। अभी कुछ दिन पहले स्मेटाचेक (जूनियर) ने मुझे सम्हाल कर रखा हुआ एक टाइप किया हुआ कागज थमाया। यह स्वयं विष्णु जी द्वारा टाइप की हुई उनकी कविता थी, ‘दिल्ली में अपना घर बना लेने के बाद एक आदमी सोचता है’। शायद यह कविता वहीं फाइनल की गई थी।
अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटों विक्टर और फ्रेडरिक स्मेटाचेक (जूनियर) ने संभाला। बड़े विक्टर अब जर्मनी में रहते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूवैज्ञानिक माने जाते हैं, अंटार्कटिका की पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ। भारत में स्मेटाचेक परिवार के इकलौते ध्वजवाहक फ्रेडरिक स्मेटाचेक (जूनियर) थे, जो मृत्यु से पूर्व लगभग एक दशक तक पूरी तरह पूरी तरह शैयाग्रस्त रहे। लेकिन बिस्तर पर लेटे इस बेचैन शख्स के कुछ देर बैठते ही पिछले चालीसेक सालों की आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय कथाओं का पुलिन्दा खुलने लगता था।
फ्रेडरिक स्मेटाचेक (जूनियर) के घर की बेहतरीन वास्तुकला ध्यान खींचती है। बहुत सादगी से बने दिखते इस घर के भीतर लकड़ी का बेहतरीन काम है। इसे नींव से शुरू करके मुकम्मल करने का काम खुद फ्रेडरिक ने स्थानीय मजदूर मिस्त्रियों की मदद से किया। घर की तमाम आल्मारियाँ, दरवाजे, पलंग, कुर्सियाँ सब कुछ उसने अपने हाथों से बनाए। वह गर्व से कहता था कि पूरे इलाके में उस जैसा बढ़ई कोई नहीं है। न सिर्फ बढ़ईगीरी, बल्कि बाकी तमाम क्षेत्रों में अपने पिता को वह अपना उस्ताद मानता था। अपने पिता से फ्रेडरिक ने प्रकृति को समझना और उसका आदर करना सीखा था। किस तरह कीट, पतंगों और तितलियों-चिड़ियों के आने-जाने के क्रम के भीतर प्रकृति अपने रहस्यों को प्रकट करती है और किस तरह वह अपने संतुलन को बिगाड़ने वाले मानव के खिलाफ अपना क्रोध व्यक्त करती है, यह सब फ्रेडरिक को बचपन से सिखाया गया था। उसकी पुरानी लाल जिप्सी का जिक्र आने पर वह बताता था कि गाड़ी बीस साल पुरानी है। अपने जर्मन आत्मगर्व के साथ वह यह भी बताता था कि वह न सिर्फ इलाके का सबसे बढ़िया बढ़ई है, बल्कि सबसे बड़ा उस्ताद कार मैकेनिक भी।
सत्तर के दशक में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के बाद फ्रेडरिक ने थोड़े समय तक नैनीताल के डी. एस.बी. कॉलेज में पढ़ाया, लेकिन नौकरी उसे रास नहीं आई। उसने बंजारों का जीवन अपनाया और कुमाऊँ- गढ़वाल भर के पहाड़ों और हिमालयी क्षेत्रों की खाक छानी। सन् 1980 के आसपास से कुमाऊँ में फैलते भूमाफिया के कदमों की आहट पहचानने और सुनने वाले पहले लोगों में फ्रेडरिक था। फ्रेडरिक ही था, जिसने अपने इलाके के निवासियों के लिए राशनकार्ड जैसा मूल अधिकार सुनिश्चित कराया।
अस्सी के दशक में फ्रेडरिक अपनी ग्रामसभा का प्रधान चुना गया और पाँच सालों के कार्यकाल के बाद उसकी ग्रामसभा को जिले की आदर्श ग्रामसभा का पुरस्कार प्राप्त हुआ। इस दौरान उसने अपने क्षेत्र के हर ग्रामीण की जमीन-जायदाद को बाकायदा सरकारी दफ्तरों के दस्तावेजों में दर्ज कराया। जंगलों में लगने वाली आग से लड़ने को स्थानीय नौजवानों की टुकड़ियाँ बनाईं। दबे-कुचले लोगों को बताया कि शिक्षा को वे बतौर हथियार इस्तेमाल करें तो उनका जीवन बेहतर बन सकता है। यह समय आसन्न लुटेरों के खिलाफ लामबन्दी की तैयारी का भी था, जो तरह-तरह के मुखौटे लगाए पहाड़ों की हरियाली को तबाह करने के गुप्त रास्तों की खोज में कुत्तों की तरह सूँघते घूम रहे थे।
पूरा पहाड़ न सही, वह अपनी जून एस्टेट और आसपास के जंगलों को तो बचा ही सकता था। इसके लिए उसने कई दफा अपनी जान की परवाह भी नहीं की। जून एस्टेट में पड़ने वाली एक सरकारी जमीन को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भगवा सरकार ने रिसॉर्ट बनाने के वास्ते अपने एक वरिष्ठ नेता को स्थानान्तरित कर दिया। इस रिसॉर्ट के निर्माणकार्य में सैकड़ों बाँज वृक्षों को काटा जाना था। इन पेड़ों की पहरेदारी में स्मेटाचेक परिवार ने करीब आधी शताब्दी लगाई थी। भगवा राजनेता ने धन और शराब के बल पर स्थानीय बेरोजगारों का समर्थन खरीद कर निर्माण चालू कराया, लेकिन फ्रेडरिक के विरोध और लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय के रास्ते निर्माण को बन्द करवाया जा सका। इस पूरे प्रकरण में कुछ साल लगे और कानून की पेचीदगियों से जूझते फ्रेडरिक को पटवारियों, क्लर्कों, पेशकारों से लेकर कमिश्नरों तक से बात करने और लड़ने का मौका मिला। उसे मालूम पड़ा कि असल लड़ाई तो प्रकृति को सरकारी फाइलों और तुगलकी नीतियों से बचाने की है। कम से कम लोगों को इस बाबत आगाह तो किया जा सकता है।
इधर 1990 के बाद से दिल्ली और बाकी महानगरों से आये बिल्डरों ने औने पौने दाम दे कर स्थानीय लोगों की जमीनें खरीदना शुरू किया। इन जमीनों पर रईसों के लिए बंगले और कॉटेजें बनाई गईं। भीमताल की पूरी पहाड़ियाँ इन भूमाफियाओं के कब्जे में हैं और एक भरपूर हरी पहाड़ी आज सीमेन्ट-कंक्रीट की बदसूरत ज्यामितीय आकृतियों से अँट चुकी है। अकेला फ्रेडरिक इन सब से निबटने को काफी नहीं था। फिर भी सन 2000 में उसने नैनीताल के उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। यह याचिका पिछले दशकों में शासन की लापरवाही, प्रकृति के प्रति क्रूरता और आसन्न संकट से निबटने के लिए वांछनीय कार्यों का एक असाधारण दस्तावेज है। पाँच सालों बाद आखिरकार 2005 के शुरू में इस याचिका पर शासन ने कार्य करना शुरू कर किया। वर्ष 2000 में फ्रेडरिक ने बाकायदा भविष्यवाणी करते हुए जल निगम को चेताया था कि उचित कदमों के अभाव में जल्द ही समूचे हल्द्वानी की तीन-चार लाख की आबादी को भीमताल की झील के पानी पर निर्भर रहना पड़ेगा, क्योंकि लगातार खनन और पेड़ों के कटान ने एक समय की सदानीरा गौला नदी को एक बीमार धारा में बदल दिया था। 2005 की गर्मियों में यह बात अक्षरशः सच साबित हुई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि फ्रेडरिक एक बढ़िया लेखक और कवि भी था। वह अंग्रेजी में लिखता था और उसका ज्यादातर लेखन व्यंग्यात्मक है। उसे शब्दों और उनसे निकलने वाली ध्वनियों से खेलने और शरारत में आनन्द आता था। ‘द बैलेस्टिक बैले ऑफ ब्वाना बोन्साई बमचीक’ उसका सबसे बड़ा काम है। अलबत्ता उसे अभी छपना बाकी है । इसके एक खण्ड में पेप्सी और कोकाकोला के ‘युद्ध’ को समाप्त करने के लिए कुछ अद्भुत सलाहें दी गई हैं। दुनिया भर के साहित्य पढ़ चुके फ्रेडरिक के प्रिय लेखकों की लिस्ट बहुत लम्बी है। वह हिमालयी पर्यावरण के विरले विशेषज्ञों में एक था। एक दशक से अधिक समय तक जून एस्टेट के पेड़ों के हक के लिए लड़ते भारतीय दफ्तरों की लालफीताशाही और खसरा-खतौनी जटिलताओं से रूबरू होते हुए वह भारतीय भू अधिनियम कानूनों का ज्ञाता भी बन गया। अपने बिस्तर पर लेटा हुआ वह एक आवाज सुनकर बता सकता था कि कौन सी चिड़िया किस पेड़ पर बैठकर वह आवाज निकाल रही है और कि वह ठीक कितने सेकेंड बाद दुबारा वही आवाज निकालेगी, जब तक कि उसका साथी नहीं आ जाता। जंगली मुर्गियों, तेंदुओं, हिरनों के पत्तों पर चलने भर की आवाज से वह उन्हें पहचान सकता था।
गाँव के बच्चों को हर मेले में जाने के लिए जेबखर्च देने वाला फ्रेडरिक, गैरी लार्सन जैसे भीषण मुश्किल कार्टूनिस्ट का प्रशंसक फ्रेडरिक, देश-विदेश के लेखक-बुद्धिजीवियों का दोस्त फ्रेडरिक, ‘बटरफ्लाइ मैन’ के नाम से विख्यात फ्रेडरिक, कभी कभार शराब के नशे में भीषण धुत्त सरकारी अफसरों को गालियाँ बकता फ्रेडरिक, बैसाखियों के सहारे धीमे-धीमे चलने की कोशिश करता ईमानदार ठहाके लगाता फ्रेडरिक ……… पता नहीं क्या-क्या था वह ! अफसोस कि अब वह नहीं होगा!
फोटो : साभार कबाड़खाना






















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