सुवर्ण रावत
जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न सूट-बूट का हव्वा, जहाँ न हो झूठ का दिखव्वा
ऐसा हो स्कूल हमारा…
ये कुछ पंक्तियां हैं गिर्दा की उस कविता की जो उन्होंने रुद्रपुर के शिक्षक वर्कशॉप में 2007-08 में सुनायी थी। इस कार्यशाला का सारा सुपरविज़न डॉ. डी.एन. भट्ट, जिला कॉरडिनेटर सर्व शिक्षा अभियान, कर रहे थे। उन्होंने गिर्दा के अलावा और एक्सपर्ट्स को भी बुलाया था जिनमें अनंत गंगोला, शिरीष डोभाल, सुभाष रावत आदि थे। सब लोगों के
विदा होने के बाद उस रोज देर तक गिर्दा के साथ सिर्फ डॉ. भट्ट और मैं थे। जब हम लोग मुखानी-हल्द्वानी गैस्ट हाऊस में बातें कर रहे थे तो उन्होंने ए.सी. बंद करवा दिया, पर्दे की तरफ बीड़ी सुलगाई, सलाद और पनीर की भुजिया के साथ थोड़ी सी डोज लेने के बाद न्योली सुनाई। दूसरे गीत सुनाये। खूब सारी बातें देर रात तक होती रहीं। दूसरे दिन गाड़ी में जाते वक्त भी तब किसे पता था कि यह उनसे आखिरी मुलाकात होगी। हालाँकि मैंने उनको दिल्ली आने का न्यौता दिया था और उन्होंने भी नैनीताल आने को कहा था। प्रोग्राम बना भी, फोन पर बात भी हुई। दिल्ली से प्रेम के आने की बात कही कि वो भी आ रहा है और साथ में कैमरा भी। बातचीत, इन्टरव्यू शूट करने को किसी वजह से मेरा जाना नहीं हो पाया। तब किसे पता था कि कभी मिलना नहीं हो पायेगा गिर्दा से।
2004-05 में गिर्दा युगमंच ग्रुप के साथ दिल्ली आये थे। अभिमंच ऑडिटोरियम एनएसडी में कल्चरल प्रोग्राम था। संजय जोशी और ज़हूर आलम के अलावा शेखर पाठक, राजेश जोशी, हेमंत बिष्ट आदि सब मदद में लगे थे। गिर्दा के गीतों ने राजधानी में रहने वालों के लिये पहाड़ों की याद ताजा कर दी। छानियों से उठता धुआँ…डेगची में चढ़ी दाल की भीनी-भीनी खुशबू, रम्भाते गोरू। बड़ी ही जबरदस्त भावनात्मक अभिव्यक्ति, जो लोगों को अंदर तक छू दे और ऑडिटोरियम ‘वन्स मोर वन्स मोर’ की आवाज़ों से गूँज उठा।
लोक गीत के इस देशी-विदेशी छोंके से हर रोज सरोबार हो जाता। पूरी तरह से तर-ब-तर भीग कर। अस्सी के दशक में राजेश आर्या के साथ दो जगहों में अक्सर जाना होता था, एक मल्लीताल में ज़हूर आलम की दुकान में डॉ. अनिल पंत, धर्मवीर परमार, अनिल घिल्डियाल, वाचस्पति डियूंडी, प्रमोद साह, मंजूर, के.के. आदि से मुलाकात होती वहीं दूसरी ओर तल्लीताल में राजीव लोचन साह के नैनीताल समाचार ऑफिस में गिर्दा के साथ हरीश पंत से भी मुलाकात होती। एक रोज गिर्दा की रिहर्सल देखने जाना हुआ तब उनसे 1975 में अल्मोड़ा की उस बैठक का पता चला, जिसमें उनके साथ लेनिन पंत, मोहन उप्रेती, शेखर पाठक शरीक हुए। उसके एक साल बाद 1976 में गिर्दा के साथ लेनिन पंत, के.पी. साह, के.सी. पांडे, एस.सी. अवस्थी आदि लोगों ने मिलकर अंधा युग नाटक के साथ युगमंच की स्थापना की। 1978 में गिर्दा का लिखा और निर्देशित नाटक ‘नगाड़े खामोश हैं’ लेनिन पंत की मदद से हुआ। युगमंच बैनर से हुआ।
अस्सी के दशक में ‘द मैन विदाउट शैडो’ और ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ बतौर एक्टर युगमंच से जुड़ा और एनएसडी जाने से पहले ‘ओडिपस रैक्स’, ‘कैकेसियन चाल्क सर्किल’, ‘हैम्लेट’, ‘नाटक जारी है’ आदि नाटकों में अभिनय किया। इदरीस मलिक निर्देशित नाटकों का रिव्यू मीटिंग के बाद गिर्दा के साथ अलग से नाटकों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होती और नाटकों के प्रति उनकी बेबाक प्रतिक्रिया का पता चलता जो उनकी सूझबूझ का प्रतीक होती।
एनएसडी के इन्टरव्यू के लिये मुझे ड्रामा का जो टुकड़ा मिला था -
उमंगों भरी उम्र है
पूरे आलम को फतह करने के ख्वाब देखने की उम्र है…
मैं जब पहली बार दौलताबाद आया था तब 21 बरस का था…
ये लाइन गिरीश कर्नाड के नाटक ‘तुगलक’ में थी। उसके लिये वह नाटक पढ़ना जरूरी था। मुझे नाटक न तो दुर्गा साह पुस्तकालय में मिल पाया और न कहीं और जगह। पता चला की गिर्दा के पास हो सकता है। तब गिर्दा मल्लीताल रहते थे और मैं भवाली टीबी सेनेटोरियम और स्टेट वैक्सीन पटावाडांगर से पुलिस अस्पताल तल्लीताल आया था। रात हो चली थी। बादल गरज रहे थे। बिजली कौंध रही थी। मैं फिर भी तल्लीताल से मल्लीताल के लिये चल पड़ा। गिर्दा का घर का दरवाजा खटखटाया। बड़ी देर में खुला। शायद खराब मौसम के अंदेशे के वजह से। तुगलक किताब के लिये आया हूँ। एनएसडी के लिये स्पीच तैयार करनी है। मुझे पानी से ऊपर से नीचे तक तरबतर देख कर उन्होंने कहा- ‘‘तू कल सुबह तक का इंतजार नहीं कर सका और ऐसे आंधी-तूफान में भी रात को चला आया। ऐसा जुनून और पागलपन। तुम्हारा एनएसडी में एडमिशन निश्चित है।’’ यह कहते हुए उन्होंने किताब मुझे पकड़ा दी। इंटरव्यू देकर जब नैनीताल लौटा तो कुछ दिनों बाद एनएसडी दिल्ली से मिले टेलीग्राम को लेकर उनके घर पहुँचा और उनको दिखाया- सलैक्टेड फ़ॉर एडमिशन…जॉइन ऑन इलेवंथ, लैटर फ़ॉलोज…डाइरेक्टर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा….
गिर्दा आपका कहा एकदम सच हो गया। उस पल उनकी आँखों में खुशी की चमक देख कर अहसास हो रहा था जैसे सलेक्शन मेरा नहीं उनका हुआ हो।
गिर्दा की रचनाओं में शिखरों के स्वर (1969), हमारी कविता के आंखर (1978), रंग डालि दियो हो अलबेलिन में (1999), उत्तराखंड काव्य (2002) आदि मुख्य हैं। गिर्दा अपनी ही तरह की एक अलग शख्सियत थे, जिन्होंने अपने जनगीतों के जरिये आम लोगों के दर्द को उकेरा। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान इनकी कविताओं और गीतों के जरिये युगमंच, काला दर्पण, शैलनट जैसे उत्तराखंड के अनेक प्रशिक्षित संस्थानों ने जन-जन को झकझोरा। उनके बाद के गीतों में आदमी का वो दर्द झलकता है जिसने कभी उत्तराखंड के विकास के सपने संजोये थे। उनकी आखिरी विदाई के वक्त दाह संस्कार वाले काफिले में शामिल सभी पुरुष और स्त्रियों के सैलाब अपने मन मस्तिष्क में रचे-बसे उन्हीं गीतों को गाकर गिर्दा को आखरी विदा दे रहे थे। गिर्दा ने जहाँ अपने गीतों में मात्र भूमि और जन्म भूमि की जय जयकार की है वहीं उन्हें बदलाव की उम्मीद रही है। गिर्दा के ही एक और गीत में …
जैंता एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में…