15 फरवरी जसवंत सिंह नेगी का पौड़ी में निधन हो गया। वे 85 वर्ष के थे और अविवाहित रहे। 30 साल तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातन भारतीय इतिहास पढ़ाने के बाद कुछ वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हुए थे। स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण उनके भतीजे उन्हें पिछले साल पौड़ी ले आए थे।
वे अपने विद्याथियों में अत्यन्त लोकप्रिय रहे। मैंने अपने जीवनकाल में दो ही शिक्षक देखे, जिन्हें विद्यार्थी पाँव छू कर प्रणाम करते थे। एक थे पंडित क्षितीन्द्र चट्टोपाध्याय, जो उसी विश्वविद्यालय में 1950 तक संस्कृत के प्रोफेसर रहे, और दूसरे नेगी जी। इस आदर के कारण ही नेगी जी अध्यापन के दौरान विश्वविद्यालय की छात्र यूनियन के लगभग 15 साल तक कोषाध्यक्ष रहे। इलाहाबाद उस समय देश के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में एक समझा जाता था। विश्वविद्यालय उनके लिये इतना लालायित था कि सन् 1948 में एम.ए. की परीक्षा के नतीजे घोषित होते ही नेगी जी विश्वविद्यालय में लेक्चरर नियुक्त हो गये, जबकि अन्य लोगों को डॉक्टरेट करने के बाद इस पद के लिए आवेदन करना होता था। उन्होंने सैकड़ों छात्रों को पी-एच. डी. करवाई, किन्तु स्वयं उन्हें इस उपाधि की आवश्यकता नहीं पड़ी। उनकी लिखी पुस्तकें और शोधपत्र महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं। इस प्रचार के युग में नेगी जी ने अपने बारे में कुछ प्रचारित नहीं होने दिया, किन्तु प्राचीन भारत के इतिहास के जानकार उनके बारे में अवश्य जानते थे।
वे एक मध्यवर्गीय परिवार से थे। मैं पढ़ाई में उनसे चार साल पीछे था, किन्तु हम दोनों एक साल से अधिक इलाहाबाद के एक कमरे में साथ-साथ रहे। छात्र जीवन में वे गर्मियों की छुट्टी में अपने बड़े भाई हनुमंतसिंह, जो कानपुर में रोडवेज़ के डेपुटी जनरल मैनेजर थे, के पास जाते और वहाँ से अपने लिए साल भर के लिये दस कमीजें और दस पाजामे सिला लाते। जब विश्वविद्यालय में नौकरी लगी, तो समझा गया कि उन्हें एक कोट तो पहनना ही चाहिए। कोट उनके पास था नहीं, मेरे पास था। हम दोनों छोटे कद के दुबले-पतले सो मेरा कोट काम आया। अपना पहला क्लास लेने के बारे में अध्यापकों को चिंता रहती है। वे अंदाजा नहीं लगा पाते उन्हें किस तरह लेंगे ? उन दिनों तो विद्यार्थी भी काफी बड़ी उम्र के होते थे। मुझे प्राचीन भारतीय इतिहास की क्लास याद है। नये अध्यापक डॉ. गोविंद चंद्र पांडे पहली बार पढ़ाने आए थे। लड़के शोर मचाने लगे। कुछ खिड़की से निकल भागे, कुछ जूतों को फर्श पर रगड़ कर घिस-घिस करने लगे। पांडे जी इस सबसे बेपरवाह नोट लिखवाने लगे। वे उच्च परिवार से थे और अच्छा सा सूट पहन कर आए थे. बाद को डॉ. गोविंद चंद्र पांडे दो विश्वविद्यालयों, गोरखपुर और जयपुर, के कुलपति बने।
डॉ. पांडे का प्रथम क्लास याद कर मुझे चिंता हुई कि नेगी जी, जिन्हें हम पौड़ी के लोग जस्सू भाई कहते थे, के साथ न जाने कैसा व्यवहार हो। कद के छोटे और पहनावा भी अन्य लेक्चरारों जैसा उच्च स्तरीय नहीं! लेकिन जस्सू भाई के पास एक जादू था। एक दिव्य चेहरा और उस पर सदाबहार मुस्कान। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ क्लास में प्रवेश किया और कुर्सी के पास जाकर मुस्कराते हुए सबको निहारा। और लड़के सब चुप! उन्हें क्लास में कभी पुस्तक से पढ़ाने की ज़रूरत नहीं हुई। वे इतनी सरलता से, अनेकों संदर्भ और आकर्षक कथाएँ सुना कर पढ़ाते कि किसी को समझने में कठिनाई न होती। उनकी वाणी में आकर्षण था। लड़कों ने कहा कि इम्तिहान के लिए नोट लिखवा दें, तो लिखवा दिये। किसी ने भी कुछ और पढ़ना-जानना चाहा तो उसके लिए भी समय निकाला। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जो कुछ एक बार पढ़ लेते, हमेशा याद रहता था। पढ़ने की गति भी इतनी तेज होती कि पूरी मोटी पुस्तक कुछ ही घंटों में समाप्त कर लेते, लोग उन्हें केवल पन्ने उलटते ही देखते। तब आश्चर्य होता, जब वे किसी संदर्भ के बारे में कहते कि फलाँ पुस्तक के फलाँ पेज में देख लो।
हाईस्कूल से एम.ए. तक वे लगातार पहला डिवीजन पाते रहे। हाइस्कूल में तो उनका स्थान इतना ऊँचा था कि आगे की शिक्षा के लिए उन्हें छात्रवृत्ति मिली। एम.ए. में वे विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम रहे। एक साल उन्होंने इम्तिहान इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें लगा कि कोई और प्रथम स्थान पा लेगा। उस बार सुहृदशीतल बनर्जी, जो आई.ए.एस. में भी सर्वप्रथम आये थे और बाद को भारत सरकार के रक्षा सचिव बने, विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर आये थे।
आरंभ में नेगी जी ने अच्छी कविताएँ लिखीं लेकिन बाद को यह बंद कर दिया। वे चंद्रकुँवर बर्त्वाल के मित्र थे, जिन्होंने नेगी जी पर एक कविता लिखी थी। वह अच्छे हारमोनियम वादक और संगीतज्ञ भी थे। वे संस्कृत के विद्यार्थी रहे थे और कालीदास की रचनाओं के कुछ भाग उन्हें जबानी याद थे, जो वे कभी-कभी सुनाया करते थे।
विश्वविद्यालय के तमाम प्रोफेसरों ने मोटर गाड़ियाँ लीं। लेकिन नेगी जी के पास अपना एक रिक्शा ही रहा। रामधन उसका चालक था। सुबह दस बजे विश्वविद्यालय ले जाता और शाम को काम समाप्त होने पर चला जाता। नेगी जी जहाँ काम करते होते, वहीं बाहर रिक्शा खड़ा मिलता।
वे खाने के शौकीन थे। चौक में मिठाइयों की एक प्रसिद्ध दुकान थी। शाम को नेगी जी वहीं दिखाई देते। बड़े लोगों से सम्बन्ध बनाने से वह बहुत दूर रहते थे। इलाहाबाद के पहाड़ियों में हेमवतीनंदन बहुगुणा अग्रणी थे। विश्वविद्यालय में बहुगुणा की पुत्री, रीता, लेक्चरर लग गई थीं, लेकिन नेगी जी एक बार भी बहुगुणा से मिलने नहीं गये। जब बहुगुणा ने कांग्रेस छोड़ी और इलाहाबाद के कुछ मान्य लोगों ने उनके पक्ष में एक पर्चा निकाला तो शहर के एक नामी वकील ने बिना नेगी जी से पूछे उनका नाम भी उसमें जोड़ दिया। नेगी जी ने कहा कि वे राजनीति में नहीं हैं और उनका नाम उस पर्चे में नहीं होना चाहिए था। बाद को गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिये एक बार उनका नाम आया तो तत्कालीन राज्यपाल, जो इंदिरा गांधी के प्रबल समर्थक थे, ने ‘बहुगुणा का आदमी’ कह कर उनका नाम काट दिया।