प्रस्तुति : किशोर जोशी
चंपावत जिला मुख्यालय के सुदूरवर्ती और विकास की दृष्टि से बेहद पिछड़े गाँव ओखलढूंगा निवासी वरिष्ठ पत्रकार उमेश जोशी का अचानक दुनियां से विदा होना मीडिया जगत ही नहीं पहाड़ के गाँवों के विकास को संघर्षरत संगठनों को भी करारा झटका है। उनके ‘न धूम्रपान न मद्यपान, बस ज्योतिष विद्या है पहचान’ यह शीर्षक उस खबर का है जो उमेश जोशी द्वारा अपनी मातृभूमि के बारे में लिखी गई थी। इस शीर्षक से साफ है कि उनका मातृभूमि के प्रति कितना लगाव था।
पुरोहिताई का काम करने वाले पं. रूपदेव जोशी के पुत्र उमेश जोशी आठ भाई-बहनों में दूसरे नम्बर के थे। प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय भिरतोला में हुई, फिर हाईस्कूल उन्होंने उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिफ्टी से किया। उसके बाद वह चंपावत आ गये और मामा की किताबों की दुकान में काम के साथ ही आगे की पढ़ाई शुरू की। चंपावत जिले से ख्यातिप्राप्त साहित्यकार हिमांशु जोशी के बाद उमेश जोशी संभवतया इकलौते पत्रकार थे जो जीवनपर्यन्त अपनी माटी से जुड़े रहे।
हमारी तहसील चंपावत थी। सो हमें अक्सर छोटे-मोटे सरकारी कार्यों के लिए वहाँ जाना पड़ता था। तहसील जाने वाली सड़क के किनारे दोमंजिले मकान में वह परिवार समेत रहते थे और वहीं से अमर उजाला के लिए खबरें भेजते थे। मेरे गाँव चनोड़ा में उमेश जोशी की रिश्तेदारी थी, सो उनके चर्चे अक्सर गाँव में होते थे। बाद में मेरी उनसे मिलने की जिज्ञासा हुई तो मैं चंपावत ही चला गया। मन में इच्छा थी कि गाँव में सड़क न होने का मामला उनके समक्ष रखूँ। इसलिए परिचय की रस्में पूरी करने के बाद उन्होंने ही मुझसे कह दिया, भाई मैं तुम्हारे गाँव आने का कई बार प्रोग्राम बना चुका हूँ,। लेकिन क्या करें, तुम्हारा गाँव हो अथवा हमारी सड़क अभाव में विकास के लिए छटपटा रहे हैं। मैं मन ही मन खुश इसलिए था कि अब उमेश दा गाँव में सड़क की खबर लगाएँगे और हमारे गाँव में सड़क बन जायेगी। यह बात करीब 1990 की है। दूसरे दिन उम्मीद के मुताबिक उमेश दा ने हमारे गाँव में सड़क न होने के साथ ही तत्कालीन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ ही जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए समाचार प्रकाशित किया। उसके बाद तो उनके साथ मैं दिली रूप से जुड़ गया।
मेरे घनिष्ठ मित्र व वर्तमान में अमर उजाला चंपावत में कार्यरत चंद्रशेखर जोशी व सतीश जोशी के साथ अक्सर बातचीत में उमेश दा का जिक्र आता था तब वह पौड़ी में थे। उसके बाद जब उन्हें बीमारी ने जकड़ लिया तो मैं उनसे मिलने देहरादून चला गया। तब उन्होंने ‘उत्तराखण्ड मेल’ समाचार पत्र का संपादन एवं प्रकाशन शुरू कर दिया था। चारपाई में बैठे उमेश दा के चेहरे का तेज यह बताने को काफी था कि वह कितने हिम्मती थे। बोले, किशोर तुम्हें घर जाकर अखबार के ग्राहक बनाने है। बातचीत का एक ही विषय था, कैसे दूर होगी चंपावत के दूरस्थ क्षेत्रों की समस्याएँ।
इसके बाद उन्होंने ‘उत्तराखण्ड मेल’ का अंक निकाला तो उसमें ओखलढूंगा गाँव की बदहाली की खबर लीड रोल में थी। इसके अलावा कई अन्य गाँवों की समस्याएँ प्रमुखता से प्रकाशित की गई थी। मैं इस लेख में इन तथ्यों को इसलिए उजागर कर रहा हूँ कि वर्तमान दौर में मीडिया का दायरा बढ़ रहा है, लेकिन मीडिया से गाँव गायब हो रहा है। उमेश जोशी को मैं ग्रामीण विकास का ध्वजवाहक इसलिए मानता हूँ कि उन्होंने जीवन की अंतिम साँस तक ग्रामीण विकास के लिए कार्य किया।
वास्तव में उमेश जोशी की दुनिया से विदाई उन लोगों के लिए झटका है, जो अपनी माटी से दूर रहकर तरक्की के द्वार खोलना चाहते हैं। जीवन भर अभाव की जिंदगी जीने वाले उमेश जोशी ने पत्रकारिता की गरिमा एवं निष्पक्षता के पैमाने को आधार बनाया, यह बहुत कम देखने को मिलता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके बच्चे समाज में वह मुकाम हासिल करें जो उन्हें हकदार होने के बाद भी नहीं मिल सका। मुझे यह बात काफी कचोटती है कि जिन लोगों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए उमेश जोशी के मन मस्तिष्क को ठेस पहुँचाई, अब वे ही समाज में उनके साथ नजदीकी का हवाला देकर अपना कालर ऊँचा कर रहे हैं।

























विनम्र श्रद्धांजलि