मैं पहली बार टिहरी गया था। मुझे लेने के लिये चन्दवदनी देवी के पुजारी दाता राम भट्ट आये थे। मैं उस दिन बुद्धिबल्लभ डियूण्डी ‘सैनिक’ का मेहमान था। वे उन दिनों जाखणीधार विकास खंड के खंड विकास अधिकारी थे। टिहरी के पुराने बाशिंदे और एक अच्छे लेखक के रूप में जाने जाते थे। डियूण्डी जी सुमन चौक के सन्तेश्वर मुहल्ले में रहते थे-सत्तेश्वर मुहल्ला एक पुरानी गांठ की तरह बंद था। करीबन् 20-30 परिवार रहते थे वहाँ पर। स्वामी मनमथन जी डियूण्डी साहब की पत्नी विद्यावती डियूण्डी को मसूरी लाये थे बिमारावस्था में। और फिर मेरी डियूटी क्या लगाई की वह श्रेष्ठ एक मित्र के रूप में उभर आई।
उन्हीं दिनों उन्होंने मुझे महावीर प्रसाद गैरोला से मिलवाया था। उनके घर की दाईं तरफ वाली एक गली में रहते थे वह संत। सच मायने में वे एक संत ही थे। दरवाजा खटखटाया तो अंदर से आई एक लड़की ने कुण्डी खोली और डियूण्डी साहब को देखते ही कहा – बाबूजी पिताजी भीतर हैं अंधेरा कमरा। कहने के लिये नाममात्र का एक रोशनदान। पलंग से लगी एक सेज पर रखी एक मूरत – जिसे वे अपने हाथों से संवार रहे थे। पता नहीं उस घुप्प अंधेरे में वे कैसे तराश रहे थे उस मूर्ति को। जैसे ही डियूण्डी जी आये – अरे भाई साब ! बैठा-बैठा यख अन्दयारू छ। अरे तुम्हारी दगड् कू छः ? अरे यह है सुरेन्द्र पुण्डीर, मसूरी रहते हैं। हमारे मित्र हैं। आपसे मिलने की बात कर रहे थे। तभी मैं इन्हें यहाँ लाया हूँ। उन्होंने मेरी ओर तुनक भरी दृष्टि से देखा और कहने लगे – करते क्या हो ? जी पढ़ता हूं अभी एम.ए. कर रहा हूं। जरा लिखने -पढ़ने का शौक है। बस अच्छा और फिर वह उस मूर्ति को तराशने में लग गये। थोड़ी देर में दूसरी अंधेरी कोठरी से उनकी लड़की तीन कप चाय लेकर आई और चाय बिस्तर में रख कर सरपट दौड़ पड़ी। उन्होंने चाय आते ही डियूण्डी जी से कहा लो भाई चाय, चाय उन्होंने मेरी तरफ बढ़ा दी। चाय की चुस्की लेने का जी तो कर रहा था लेकिन चाय का रंग ऐसा था कि वह मन को भा नहीं रहा था। शरमा-शरमी मैंने चाय गटक ली। उन्होंने भी अपना काम पूरा कर लिया।
डॉ. महावीर प्रसाद गैरोला एक सहज व्यक्ति थे। छोटा कद छोटे-छोटे बाल, गले में मफलरनुमा टाई, काले कोट में उस स्वामी राम तीर्थ का चित्र हमेशा लगा रहता। अकसर वे कोर्ट में मिल जाया करते थे। या फिर घर में अपने लेखन व अन्य कार्यों में उलझे रहते। उन्होंने मुझे अपनी कविताओं, कहानियों और निबंध संग्रह की बहुत किताबें दी। आज भी वह मेरी लाइब्रेरी में हैं। साहित्यिक रुझान के साथ-साथ राजनीति और सामाजिक कार्यों में भी तल्लीन रहते, गोष्ठियाँ करते। उनका एक अपना समूह। काम से फुर्सत मिली तो दिमाग को ताजा करने के लिये चर्चा करते।
डॉ. महावीर प्रसाद गैरोला मूलतः गढ़वाली साहित्यकार थे उनकी ‘कपाली की छमोट’, ‘पार्वती’ (उपन्यास) एक ऐसा उपन्यास है जिसने गढ़वाली उपन्यासों की शुरूआत की। उन्होंने जिन्दगी भर कभी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया। आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने जिन्दगी से कभी हार नहीं मानी। आर्य समाज के अनुयायी तथा स्वामी दयानन्द के रास्ते पर चलने के लिये हमेशा तत्पर रहे। कई वर्षों तक उन्होंने आर्य समाज का प्रचार-प्रसार किया तथा आर्य समाज मंदिर को सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक कार्यों की तपस्थली बनाया। कई समाजोत्थान की योजना का यहाँ से प्रारम्भ भी की।
पैसे के लिये उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया लेकिन समाज के कार्यों में इतने उलझे रहे की उन्हें समय ही नहीं मिला वकालत के लिये। हर समय कई चीजें उनके जेहन में चलती रहती। नगरपालिका टिहरी के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उन्होंने टिहरी नगर की सेवायें की। महावीर प्रसाद गैरोला ने बांध न बनाये जाने का अंतिम सांस तक विरोध किया। विरेन्द्र सकलानी, सरदार प्रेम सिंह तथा सुंदर लाल बहुगुणा जी के साथ हमेशा जुड़े रहे। कई बार उन्होंने चन्द्रवदनी के जोगी (स्वामी मनमथन) के कार्यों की प्रशंशा भी की और कहा कि स्वामी जी जैसी आग हमारे अंदर होती तो हम टिहरी को एक नया रास्ता दिखा पाते। वे कहा करते थे टिहरी में तीन दाड़ी वाले सरदार प्रेम सिंह, स्वामी मनमथन तथा इन्द्रमणी बडोनी अगर एक साथ मिल जायें तो राह मिल ही जायेगी।
उत्तराखंड राज्य के संस्कृति विभाग द्वारा वृद्ध साहित्यकारों को सम्मान करने वाली योजना के तहत वे मसूरी आये थे। तब गुरुवर सत्य प्रसाद रतूड़ी जी से मिले थे। पैर में प्लास्टर लगे होने के बावजूद भी वह अपने साथियों को मिलने आये। बाद-बाद में इस संत का राजनैतिक पार्टियों से इतना मोह भंग हो गया था कि उन्होंने एक आध्यामिक वामपंथी पार्टी ही बना डाली। जिसके वे स्वयंभू अध्यक्ष भी थे। उन्होंने एक अखबार निकाला ‘नैतिकी’ जिसका प्रकाशन कुछ वर्षों तक देहरादून के समय साक्ष्य प्रकाशन से होता रहा। टिहरी नगर का वह एकाकी संत हमेशा उसी नगर के लिये जिया। टिहरी डूबने के उपरान्त वह भी बीमार रहने लगे। आर्थिक अभाव एवं समय पर ठीक उपचार न मिलने के कारण टिहरी नगर का वह मनीषी, राजनैतिक, बुद्विजीवी, मूर्तिकार, साहित्यकार, सन्त हमेशा-हमेशा के लिये हमसे विदा हो गया।

























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