स्मृतिशेष
‘‘ए गमे दिल क्या करूँ, वहशते दिल क्या करूँ’’ जो इस गीत को फिल्मी गाने के रूप में जानते हैं उनके लिए देवरानी जी की याद में इन पक्तियों का इस्तेमाल शायद ओछा लगे। पर मज़ाज़ की इन पंक्तियों को जिन्होंने पीताम्बर देवरानी जी के मुँह से सुना होगा, वे शायद जानते होंगे कि जमाने भर के दुःखों को अपना समझने वाले देवरानी जी के न रहने का क्या अर्थ है। हममें बहुत से लोग अनाथ हो गये हैं।
औपचारिक रूप से देवरानी जी के लिए लिखना बहुत सरल है। वे 10 अप्रैल 1925 को मटियाली के पास डुंडेख गाँव में एक वन अधिकारी के घर में पैदा हुए। रेंजर के घर पैदा होने पर उन्हें तमाम वे सुविधाएँ मिलीं, जो उन्हें आम गाँव वाले से काट कर एक लक्जरी दुनिया का आदी बना सकती थीं। उन्होंने गढ़वाल, रुड़की सैनिक स्कूल तथा मेरठ में अध्ययन किया। चार-पाँच साल फौज में क्लैरिकल स्टाफ में रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्होंने चुपचाप गढ़वाल राइफल्स के मुख्यालय में अपने ऑफिस में तिरंगा फहरा दिया। फौज की नौकरी से हाथ धो दिया। यहीं उन्होंने प्रसिद्ध गढ़वाली साहित्यकार स्व. भजन सिंह ‘सिंह’ का सान्निध्य प्राप्त किया। सिंह जी ने ही चन्द्र सिंह भण्डारी को- अमर चन्द्रसिंह गढ़वाली बनाने की शुरूआत की थी।
इसके पश्चात उन्होंने देवी खेत मटियाली, भृगुखाल स्कूलों की स्थापना की तथा प्रधानाध्यापक रहे। साथ ही दिल्ली कोटद्वार में भी अध्यापन करते रहे। फिर मटियाली कालेज के प्रान्तीयकरण के बाद वे सरकारी सेवा में समायोजित हुए।
पत्रकारिता में उन्होंने ‘आवाज’ अखबार शुरू किया फिर गढ़वाल के सबसे प्रतिष्ठित साप्ताहिक ‘कर्मभूमि’ के संपादन से जुड़े और बाद में ‘सत्यपथ’ का संपादन किया। पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे।
हम पहाड़ की ओर से पिछले एक वर्ष से उन्हें सम्मानित करने की योजना बना रहे थे। उनसे पूछने पर वे कहते कि जो चाहे करो। पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर वे हर बार कुछ दिन रुकने तथा स्वस्थ होने के बाद आयोजन की बात कहते। अंततः हमने 19 सितम्बर 2009 को आयोजन कर उन्हें सम्मानित करने का मन बना लिया था। हमारे जीवन में अब वह 19 सितम्बर 2009 कभी नहीं आयेगा।
लेकिन देवरानी जी किसी व्यक्ति के शरीर का इस दुनिया में केवल आना, रहना तथा जाना ही नहीं थे। वे समय का एक दस्तावेज थे। वे एक आचरण संहिता थे। वे इन्साक्लोपीडिया थे और सबसे बड़ी बात यह कि वे एक आजीवन योद्धा थे, जिन्होंने समाज के लिए संघर्ष करना सिखाया।
देवरानी जी का कद ? उसे नापा नहीं जा सकता। परंतु कुछ घटनायें हैं, जो उनके कद का आभास हमें कराती हैं। वे समर्पित कम्युनिस्ट थे। लेकिन उनके आस पास के राजनैतिक लोगों ने उन्हें कभी भी सिर्फ सी.पी.आई. का व्यक्ति नहीं माना। इसीलिए कभी भी, कोई भी राजनैतिक व्यक्ति आ कर उनसे सलाह ले सकता था। उनके व्यक्तित्व की व्यापकता इससे नहीं बनती कि वे बिना किसी पूर्वाग्रह के किसी भी राजनैतिक व्यक्ति को सलाह देते, परंतु इस बात से थी की हर पार्टी वाला उनसे सलाह लेने पहुँचता। क्योंकि उनकी नजर में उनके व्यक्तित्व को, उनके अनुभवों को सिर्फ एक पार्टी नहीं बांध सकती थी। उन्हें क्या क्या सम्मान मिले ? किसने दिए ? मैं उन्हें गिनाना नहीं चाहता। यह जरूरी भी नहीं। क्योंकि इन सम्मानों ने देवरानी जी का महत्व नहीं बढ़ाया, बल्कि देवरानी जी ने उन सम्मानों को स्वीकार कर उनका कद बढ़ाया था। वे आजीवन जन आंदोलनों से जुड़े रहे। शिक्षकों के अधिकारों की लड़ाई के लिए वे टर्मिनेट भी किए गए। गाँव व वनवासियों के जल, जंगल, जमीन की लड़ाई में वे आगे रहे। उमेश डोभाल कांड मे वे अग्रणी भूमिका में माफिया की खिलाफत करते रहे।
उत्तराखंड आन्दोलन में वे नागरिक मंच की ओर से प्रमुख योद्धा रहे। अब जब कि वे अस्वस्थ थे, गैरसैण को राजधानी बनाने की वकालत कर रहे थे।
पीताम्बर देवरानी जी, मैं उन्हें स्वर्गीय लिखने की हिमाकत नहीं करूँगा- क्योंकि वे कहते थे कि स्वर्ग और नर्क यहीं हैं। हमने जो काम किया है वही हमें यहाँ जिंदा रखता है। संस्कृत तथा उर्दू के विद्वान रहे। हमें कभी भी किसी विषय के लिए संस्कृत के कोटेशन की जरूरत होती तो वे उनकी जुबान पर रहते। किसी शब्द की व्युत्पत्ति जाननी होती तो वे संस्कृत मूल से उसे समझाते। वे वेद, उपनिषद् तथा गीता का अध्ययन करते। अपने अंतिम दिनों में वे गीता का पुनः अध्ययन कर रहे थे और कहते थे कि मैंने अपने कम्युनिस्ट साहित्य के अध्ययन में जो कुछ पढ़ा है, समझा है वही सब मुझे गीता में मिल रहा है।
उर्दू की नफ़ासत तथा नज़ाकत से हमारा परिचय देवरानी जी ने ही कराया। उनके पास उर्दू की गजलों तथा शेरों का बेहतर कलेक्शन था। जब भी वे नई कविता या शेर पढ़ते तुरंत मुझे फोन कर सुनाते। इसलिये कि हम जान सकें कि क्या-क्या लिखा जा रहा है, क्यों लिखा जा रहा है। वे एक प्रखर वक्ता थे। उनके ज्ञान का दायरा इतना बड़ा था कि जब वे किसी विषय पर धाराप्रवाह बोलते तो उसमें एक वाक्य भी निरर्थक या रिपीट नहीं होता था।
देवरानी जी एक इनसाक्लोपीडिया थे- इसलिये नहीं कि उन्होंने बहुत ज्यादा या विविध पढ़ा था। उनकी जानकारी के पीछे जन संघर्ष, जन से जुड़ाव, विलक्षण विश्लेषण तथा संवेदनशीलता और गजब की याददाश्त थी। वे लोक कला, लोक संगीत तथा लोक वाद्यों के ज्ञाता थे। ढोल सागर पर उनकी विशेषज्ञता थी। उनके पास संस्मरणों की अमूल्य धरोहर थी। मोहन उप्रेती हों, भगवती चरण निर्मोही हों, शिवप्रसाद डबराल हों, बाल कुँवरी देवी हो, जगमोहन सिंह नेगी हों, इन सबके साथ उनके संस्मरण सिर्फ किस्सागोई नहीं थे। तत्कालीन इतिहास, राजनीति व समाज शास्त्र पर टीका हुआ करते थे। गढ़वाल के स्वंतत्रता आन्दोलन से जुड़े लोगों, स्थानों तथा घटनाओं के बारे में उनसे ज्यादा ज्ञान शायद ही किसी को रहा हो।
इन सब के साथ साथ देवरानी जी एक बेहतर इंसान भी थे। जरूरी नहीं कि प्रतिभा या विलक्षणता ही एक बेहतर इंसान बनाए। आज जब अवसरवादिता और चाटुकारिता आगे बढ़ने के हथियार हैं- वहाँ देवी खेत विद्यालय प्रकरण का जिक्र किया जा सकता है। देवरानी जी को जब देवीखेत में प्रधानाध्यापक बनाने की बात हुई तो उन्हें पता चला कि उनसे कुछ दिन सीनियर बलवीर सिंह नेगी वहाँ अध्यापन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानाचार्य बनने का हक बलबीर सिंह जी का है। वे देवीखेत विद्यालय में तभी पढ़ायेंगे जब बलवीर सिंह जी को प्रिंसिपल बनाया जायेगा ! बलबीर सिंह जी कहते कि प्रिंसिपल के लिए देवरानी का चुनाव हुआ है, अतः वे प्रिंसिपल बनें। देवरानी जी कहते कि बलबीर सिंह जी सीनियर हैं, इसलिए प्रिंसिपल बनने का हक उनका है। कई महीनों तक बिना प्रिंसिपिल के स्कूल चला। प्रिंसपिल तब मिला, जब बलबीर सिंह जी को एक दूसरे स्कूल में जाने का मौका मिला।
देवरानी जी बताते थे कि दिल्ली से बेहतर नौकरी छोड़ कर देवी खेत वे अपने क्षेत्र को शिक्षित करने आए थे। प्राइवेट स्कूल के लिए स्थाई संसाधन नहीं थे। सुबह सब अध्यापक पढ़ाते, शाम को प्रिंसिपिल सहित सब अध्यापक छात्रों की खोज में निकलते। साथ ही छांछ, झंगोरा खाने के लिये लाते।
देवरानी जी को प्रिंसिपल बनने का नुकसान भी उठाना पड़ा। सारे अध्यापक अपनी अपनी कक्षा से फीस लेते तथा अपनी तनखा काट कर आफिस में देते। स्थिति यह थी कि शिक्षक अपनी तनखा के 40 रुपए काट लेते तो प्रिंसिपल के लिए कुल मिला कर 20-25 रुपए बचते। लेकिन उन्होंने कोई शिकायत नहीं की और न ही उन्हें कभी वापस दिल्ली जाने का विचार आया। बल्कि कष्टों से डर कर जो अध्यापक जाने की सोचते भी, उन्हें भी वे रोकते।
देवरानी जी आजीवन सीखते रहे। इसलिए वे अन्त तक विकास करते रहे। वे बच्चों के साथ बच्चों की तरह व्यवहार करते, युवाओं का साथ उन्हें भाता। इसलिये अपने को शायद वे हमेशा जवान महसूस करते। वे अच्छे गवैय्या भी थे (यह शब्द उनका अपने लिए ही था)। वे उर्दू गजल गाते थे, और कभी ठुमरी।
हम से एक अक्षम्य अपराध हुआ है। हम चाह कर भी देवरानी जी के अकूत संस्मरणों को लिपिबद्ध नहीं कर पाए। पिछले कई वर्षों से मैं उनके पीछे पड़ा था- मैंने उन्हें टेपरिकार्डर भी दिया था- परन्तु वे रिकार्ड नहीं कर पाए। केवल कुछ बात-बहस मैंने अपने कम्प्यूटर पर उनके साथ रिकार्ड की हैं।
पत्नी की मृत्यु के बाद वे अकेले थे। समय-समय पर मैं उनसे मिलने जाता- पर उनका अकेलापन दूर नहीं हो सकता था। घर के बगल में ही एक पार्क में डूबते सूरज के साथ मुझे मज़ाज़ की गजल सुनाई थी: ‘ए गमे दिल क्या करूं -वहशते दिल क्या करूँ!’ दिल से निकली आवाज के बाद फिर सँभलते हुए उन्होंने पूछा था- कि तुमने ध्यान दिया ? देखा तुमने ? हम अपनी सोचते हैं। मजाज ने चाँद को कैसे देखा- फिर गुनगुनाने लगे:
‘‘एक महल की आड़ से निकला है
पीला आफताब
जैसे मुल्ला का अमामा,
जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी,
जैसे बेवा का शबाब’’
मैं तो बस आसमान में चाँद को ढूँढने की कोशिश करने में लगा था। अब तो उस चांद का दिखना मुश्किल है क्योंकि उसको दिखाने वाला चला जो गया…. 30 अगस्त 2009 को !