देवीदत्त सांगुड़ी
23 अगस्त को प्रताप भैया के देहान्त के बाद अनेक यादें ताजा होने लगीं। पचासवें दशक की बात है। प्रताप भैया लखनऊ यूनिवर्सिटी में जाते और मैं नैनीताल में पढ़ता था। तभी उनसे परिचय हुआ। उन दिनों लखनऊ यूनिवर्सिटी में एक छात्र आंदोलन हुआ, जिसने हिंसक रूप ले लिया। गिरफ्तारियाँ र्हुइं। प्रताप भैय्या नैनीताल आ गये और मेरे साथ रुके। उन्होंने कहा कि उन्हें लखनऊ के विद्यार्थियों के लिए आर्थिक एवं नैतिक समर्थन जुटाना है। इस हेतु कई स्थानों पर जाना भी है। वे भीमताल हमारे घर भी गये। उनका व्यवहार मेरी माता जी, परिवार के सदस्यों तथा आसपास के अन्य निवासियों से इतना आत्मीयतापूर्ण था कि वे जीवनपर्यन्त भैया को याद करते रहे। मेरी माँ तो उन्हें पुत्रवत मानने लगीं। यह सहृदयता प्रताप भैया में अद्भुत थी। दौरों में मिलने वाले स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध, सभी के साथ तादात्म्य स्थापित करने की उनकी विलक्षण क्षमता मुझे चकित करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने अपने संस्मरणों में भैया जी के इस व्यवहार एवं मंत्री बनने के बाद के वास्तविक व्यवहार के बारे में जब एक प्रतिकूल टिप्पणी की तो मैंने तथा कतिपय अन्य साथियों ने उन्हें पत्र लिख कर पुस्तक के अगले संस्करणों में इस टिप्पणी को रिवाइज करने की कृपा करने को कहा। हमारे इस आग्रह का क्या हुआ, पता नहीं।
जब प्रताप भैया पढ़ते थे, तब प्रजातांत्रिक समाजवाद के मसीहा माने जाने वाले आचार्य नरेन्द्र देव लखनऊ
विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उस जमाने में ऐसे लोग कुलपति हुआ करते थे, जिनकी अमिट छाप उनके शिक्षार्थियों पर पड़ती थी। आचार्य जी प्रताप भैया के गुरु, पथप्रदर्शक तथा राजनैतिक गुरु बन गये। अपने द्वारा खोले गये तमाम स्कूलों की श्रृंखला का नाम उन्होंने आचार्य जी के नाम पर ही रखा। गुरु दक्षिणा देने का यह उनका तरीका था।
आजादी के बाद भारत में समाजवादी विचारधारा दो मुख्य धाराओं में बँटी थी। उन्हीं के आधार पर समाजवादी पार्टियाँ मिलती और बँटती रही। एक शाखा को मानने वाले शुद्ध समाजवादी विचारधारा पर चलने वाले थे। ये लोग अधिक मिलिटेन्ट थे। डॉ. राममनोहर लोहिया इनके मुख्य नेता थे। दूसरी शाखा के लोग अपने व्यवहार को देश, काल परिस्थितियों के अनुरूप निर्धारित करते थे। नरेन्द्र देव इस विचारधारा के मूर्धन्य नेता थे। मेरा व भैया जी का साथ भी इन्हीं दो राजनैतिक विचारधाराओं के आधार पर जुड़ता तथा टूटता रहा। समाजवादी दर्शन का मतावलम्बी होने के बावजूद व्यवहार की भिन्नता इन लोगों को अलग-अलग दल बनाने का आधार बनी रही। ऐसा एक उदाहरण केरल की पहली समाजवादी तथा देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार से सम्बन्धित है। केरल में पहली समाजवादी सरकार पद्मनाथ पिल्लई के नेतृत्व में बनी। तब आचार्य नरेन्द्र देव समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष थे। एक आन्दोलन में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। डॉ. लोहिया ने कहा कि जनता के सीने पर गोली दागने वाली सरकार को इस्तीफा देना चाहिये। पार्टी ने निर्णय किया कि इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है। इसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी दोफाड़ हो गयी।
प्रताप भैया की दो और बातें अनुकरणीय थीं। एक, अनुशासन तथा दूसरी किसी भी परिस्थिति में हार न मानना। राजनैतिक जीवन के आरम्भिक में भैया और मैं घंटी बजाकर मीटिंगो का एलान करते थे। कभी मैं घंटी बजाता और वे एलान करते और कभी वे घंटी बजाते और मैं एलान करता। मीटिंगें बिना माइक के हुआ करती थीं। एक दिन उन्हें विचार आया कि ‘नागरिक रनिंग ट्राफी’ के नाम से एक वाद- विवाद प्रतियोगिता करनी चाहिये। इसके लिए कुछ पैसे की जरूरत थी, जो न भैया के पास था और न मेरे। चन्दा माँगने में मुझे शर्म महसूस होती थी, लेकिन भैया जी चंदा माँगने को जनता से जुड़ना कहते थे। पुरस्कारों के लिए कुछ पैसे जुड़ जाते और काम चल जाता था। यह भैया की आदत थी कि जो चीज आरम्भ कर दी, उसे जीवनपर्यन्त चलाते रहे। यह प्रतियोगिता भी विपरीत परिस्थितियों में भी चलती रही। वे अपने कार्यक्रमों का वार्षिक कलेण्डर बनाते थे। जिन्होंने प्रताप भैया को एक स्थापित नेता के रूप में देखा है, वे उस जमाने के रोमांच की कल्पना भी नहीं कर सकते।
वर्ष 1957 में एम.एल.ए. का चुनाव जीतकर लखनऊ जाने पर उन्होंने मिलने आने वालों के लिये एक रजिस्टर रखा था, जिसमें नाम व पता तथा मिलने का मकसद आदि कॉलम बने थे मैं भी यदा-कदा बलिंगटन होटल के उस आवास में जाता था। मुझे यह रजिस्टर भरना बुरा लगता था, अतः मैंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष चन्द्रशेखर तथा सचिव ओम प्रकाश के पास ए.पी. सेन रोड स्थित प्रदेश कार्यालय में जाना आरंभ कर दिया। भैया जी द्वारा चलाई गई यह प्रथा अन्य मुलाकातियों को भी अखरी होगी। उनका तो विधान सभा क्षेत्र भी बहुत बड़ा था। इसमें नैनीताल जिले का उनके घर वाला पर्वतीय हिस्सा, टनकपुर-खटीमा का थारू बहुल इलाका तथा पीलीभीत जिले का पूरनपुर का इलाका शामिल था। भैया के विरोधी कांग्रेस प्रत्याशी मुसलमान थे। वहीं पूरनपुर इलाके के प्रजा समाजवादी पार्टी दल के एक प्रभावशाली नेता थे, जो कांग्रेसी उम्मीदवार के रिश्तेदार भी थे। लेकिन उन्होंने भैया जी के लिये इस तरह जान लगा दी कि पूरनपुर से प्रताप भैया को अधिक वोट मिली, जबकि भैया के अपने घर के इलाके से कांग्रेस को अधिक वोट मिले थे। लोग तब इस बात पर चुहलबाजी भी किया करते थे। बाद में वही सज्जन उनसे मिलने लखनऊ आये तो उनके सामने भी रजिस्टर रख दिया गया। वे नाराज हो गये और उन्होंने बगैर रजिस्टर भरे भैया जी से मिलने की जिद ठान ली। खैर, बाद में उनकी भेंट भैया जी से हुई तो भैया जी ने उनसे सर्वप्रथम रजिस्टर न भरने के बारे में ही पूछा। इस पर वे इस कदर उखड़े कि नारायणदत्त तिवारी के पास पहुँचे और पार्टी छोड़ने की धमकी दे डाली। तिवारी जी के क्षमा माँगने के बावजूद अगले चुनाव में उन्होंने भैया जी का पूरा विरोध किया। भैया जी की हार का वह भी एक कारण रहा। इसके बावजूद रजिस्टर रखने का उनका नियम बना रहा।
समाजवादी दल आये दिन बन्द, घेराव आदि के कार्यक्रम करता रहता था, जिनकी स्वाभाविक परिणति गिरफ्तारी में होती थी। प्रताप भैया आरम्भ से ही अनाश्वयक रूप से गिरफ्तारी देने के खिलाफ थे। यह उनका सैद्धान्तिक निर्णय था। मगर आम तौर पर विपक्ष में ही बैठने के लिए बनी पार्टी के सदस्य के लिए जेल न जाने की नीति बहुधा आत्मघाती होती है। उन्हें भी इसके लिये आलोचना झेलनी पड़ी। लखनऊ यूनिवर्सिटी के उनके कई साथी आरोप लगाते थे कि प्रताप गिरफ्तारी के डर से यूनिवर्सिटी के आंदोलन को छोड़ नैनीताल चला गया। उनका यह निर्णय उन समाजवादियों से अधिक मेल खाता था, जिनके नेता आचार्य नरेन्द्र देव रहे थे। वहां मिलीटेन्सी कम थी तथा गिरफ्तारी वाले फर्मान ऊपर से कम मिलते थे।
इमर्जेंसी में भारी संख्या में गिरफ्तारियाँ र्हुइं। कई जगह तो पार्टी कार्यकर्ताओं ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। नैनीताल जिले में उन दिनों एम. सी. जोशी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे। उनके और पुलिस की एप्रोच में फर्क था। पुलिस ने विरोधी पार्टियों के तमाम कार्यकत्र्ताओं, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था, की सूची बना रखी थी। हम सभी उसमें शामिल थे। जिलाधिकारी जोशी जी का मानना था कि जब तक कोई व्यक्ति प्रशासन के लिए वास्तव में कोई समस्या पैदा नहीं करता, तब तक उसे गिरफ्तार नहीं करना चाहिये। इस कारण नैनीताल में सिर्फ वही लोग जेल गये, जिन्होंने गिरफ्तारियाँ दीं। जब अन्यत्र समाजवादी गिरफ्तार होने लगे तो हमने भैया जी से कहा कि अब हमें भी जेल जाने के लिये कुछ करना चाहिये। जनता को हमसे कुछ आशायें हैं। मगर अपने सिद्धान्तों पर अडिग भैया जी ने कहा कि हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे, जिससे प्रशासन को हमें गिरफ्तार करने का मौका मिले। हाँ, पार्टी कार्यकर्ता होने से गिरफ्तारी होती हो तो हो। हम में से कुछ लोग निराश भी हुए, लेकिन भैया जी तब हमारे नेता थे। हम लोग जेल से बाहर रह गये। भैया जी को इसकी बहुत बड़ी कीमत अपने राजनैतिक जीवन में देनी पड़ी। इमर्जेंसी के बाद किसी राजनैतिक दल या समूह ने उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया। इस कारण वह उन राजनैतिक ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच पाये, जहाँ जाने की उनमें क्षमता थी। इसके बावजूद गिरफ्तारी के विषय में उनके विचार यथावत रहे। मैंने प्रताप भैया को कई बार समझाया कि वे नैनीताल तक सीमित न रह कर लखनऊ या दिल्ली को भी अपना कार्यस्थल बनाएँ, लेकिन नैनीताल के लिये उनके प्रेम ने उन्हें रोक लिया।
समाजवादी पार्टी में श्रम को पूजनीय माना जाता था। नैनीताल जिले में पचास के दशक में श्रमदान को एक आंदोलन का रूप दिया गया था। ‘खुट खुटानी सुट बिनेक’ एक लोकप्रिय नारा हो गया। भीमताल के समीप खुटानी से विनायक तक जन-जन द्वारा श्रमदान से एक सड़क का निर्माण किया। इसमें समाजवादी पार्टी के शीर्षस्थ नेतृत्व ने भी भागेदारी की। अपने ढंग का यह देश में पहला प्रयोग था। उस दौर में गाँवों के रास्ते, पेय जल की व्यवस्था, स्कूली पढ़ाई, जंगल का प्रबन्धन आदि जनता से जुड़ी तमाम बातों में जन की भागेदारी के इस विचार को खूब बढ़ावा मिला। सार्वजनिक रास्ते, नल व नौले ठीक करना, पेड़ लगाने जैसे कामों में विद्यार्थियों व सामान्य ग्रामीणों की भागीदारी देखने लायक होती थी। काश यह सिलसिला आज भी चालू रहता! उन्हीं दिनों प्रताप भैया के घर के इलाके में एक इण्टर कॉलेज खुला था, जिसके लिये फर्नीचर हल्द्वानी से आया था। मोटर रोड से बीस मील से भी अधिक दूर स्थित विद्यालय में फर्नीचर कैसे पहुँचे, यह समस्या थी। भैया जी ने क्षेत्रवासियों तथा विद्यार्थियों को संगठित और प्रेरित किया। देखते-देखते सारा सामान सिर, कन्धों और पीठ पर विद्यालय तक पहुँच गया। लोगों को उद्देश्य के लिये संगठित करने की उनकी अपूर्व क्षमता थी।
प्रताप भैया मुतवातिर 10 बजे कचहरी पहुँचते और काम कम हो या ज्यादा, चार बजे तक वहाँ पर डटे रहते थे। उनकी कोई छुट्टी बगैर किसी राजनैतिक या सामाजिक कार्यक्रम के नहीं बीतती थी। वे नये लोगों को भी इन क्षेत्रों में आगे आने को प्रेरित करते थे। कहते कि मंच वे प्रदान कर रहे हैं, तुम लोग आओ तो सही। ऐसा करने में उन्हें प्रसन्नता होती थी। इसके उनका कोई साथी सार्वजनिक जीवन में बहुत आगे नहीं बढ़ पाया।
प्रताप भैय्या इस क्षेत्र के जनजीवन में अपना विशिष्ट स्थान बनाये रहे। उनके द्वारा छोड़ी गई खाली जगह भरने में देर लगेगी।