प्रस्तुति : एम.पी.एस.मेहता / नीरजा पांडे
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलसचिव प्रो. डी.एन. अग्रवाल का नैनीताल में 30 नवम्बर को 86 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। अपने जीवन के अन्तिम दिन तक वे स्वस्थ रहे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि उनकी अन्त्येष्टि के लिये आये उनके ज्येष्ठ पुत्र अनिल (54 वर्ष) का भी घर में पहुँचते ही हृदय गति रुक जाने से देहान्त हो गया। घर से एक साथ दो अर्थियाँ उठीं।
दिवाकरनाथ अग्रवाल का जन्म 28.09.1923 को कानपुर में एक अत्यन्त साधारण परिवार में हुआ था। छात्र जीवन में ही वे सहपाठियों एवं शिक्षकों में अपनी प्रतिभा एवं कर्मठता के लिये जाने जाने लगे। शिक्षा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिये उन्होंने कानपुर में ही विभिन्न स्थानों पर दैनिक वेतन पर काम किया। आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद वर्ष 1947 से 3 वर्ष तक मारवाड़ी इण्टर कॉलेज कानपुर में अपनी सेवायें दीं। तत्पश्चात् वर्ष 1950 से 1957 तक डी.ए.वी. डिग्री कॉलेज कानपुर में अध्यापन किया। वर्ष 1954 में उन्हें आगरा विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि हुई। लोक सेवा आयोग से चयनित होकर उन्होंने वर्ष 1957 में डी.एस.बी. राजकीय महाविद्यालय, नैनीताल में अर्थशास्त्र विभाग में प्रवक्ता पद का कार्यभार ग्रहण किया और विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र के पद तक पहुँचे। यह वह दौर था, जब डी.डी.पन्त के अतिरिक्त डॉ. मायाराम, डॉ. कपिलदेव उपाध्याय, डॉ. गौतम एन. द्विवेदी, डॉ. झम्मन लाल शर्मा, डॉ. के.एम.एल. सक्सेना, डॉ. बीपी. मिश्रा, डॉ. डी.पी. खण्डेलवाल, प्रो. यज्ञ दत्त पाण्डे जैसे विद्वान देबसिंह बिष्ट महाविद्यालय में अध्यापन करते थे और इस महाविद्यालय को उत्तरी भारत में विशिष्ट स्थान प्राप्त था।
वर्ष 1973 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय की स्थापना होते ही उनकी योग्यता एवं प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए प्रथम कुलपति प्रोफेसर डी.डी.पन्त ने उनकी संस्तुति कुलसचिव के रूप में की। वे प्रतिनिधायन पर वर्ष 1974 से 1978 तक इस पद पर कार्य करते रहे। तदुपरान्त उन्होंने लगभग एक वर्ष तक प्रधानाचार्य, राजकीय महाविद्यालय जयहरिखाल (पौड़ी) में कार्य किया। वर्ष 1979 के अन्त में वह पुनः अर्थशास्त्र विभाग, डी.एस.बी. परिसर नैनीताल में आचार्य पद पर नियुक्त हुए तथा इस पद पर सेवानिवृत्ति के वर्ष 1984 तक कार्यरत रहे। आचार्य पद पर रहते हुए उन्होंने डी.एस.बी. परिसर में प्रशासनिक अधिकारी का कार्य भी किया।
डॉ. अग्रवाल अपनी बुलन्द आवाज एवं विद्वता के लिए प्रख्यात रहे। उनके निर्देशन में एक दर्जन से अधिक शोधार्थियों ने पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनके अनेक शोधपत्र महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनकी तीन पुस्तकें परास्नातक कक्षाओं हेतु प्रकाशित हुई। डॉ. अग्रवाल अपने सरल, बेबाक किन्तु गरिमामय व्यक्तित्व से महाविद्यालय में सदैव सभी का मार्गदर्शन करते रहे। आज उनके पढ़ाये गये छात्र व छात्रायें शैक्षणिक, प्रशासनिक, न्यायायिक, राजनैतिक पदों पर कार्यरत हैं अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे अपने जीवन के अन्तिम समय तक सभी के लिये मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहे- पहले एक प्राध्यापक फिर कुशल प्रशासक, फिर पेंशनर्स संगठन के एक वरिष्ठ सदस्य के रूप में। वे अपनी ईमानदारी तथा कर्मठता के लिए विख्यात रहे। उनके समय बनी नियमावली पर आज भी कुमाऊँ विश्वविद्यालय मजबूती से खड़ा है। डॉ. दिवाकर नाथ अग्रवाल अन्तिम समय तक स्वामी रामदेव जी के अनुयायी रहे और अन्य लोगों को भी योगाभ्यास के लिये प्रेरित करते रहे। वे प्रतिदिन प्रातः प्राणायाम व व्यायाम करते थे। शायद यही उनकी सेहत का राज था, जो वार्धक्य में भी उनके चेहरे पर एक तेज के रूप में प्रकट होता था।























आपकी टिप्पणीयाँ