उसने अपनी जिन्दगी में सिर्फ तीन पहाड़ देखे
सामने का पहाड़ जिसमें पसरी है जिन्दगी
बायें तरफ का पहाड़, जो ढँका है चीड़ों से
और वह पहाड़ जिसमें आबाद है उसका गाँव
उसने सिर्फ दो ही पट्टियाँ देखीं,
मायके और ससुराल की.
गाँव के नीचे बहती नदी से उसे खासा लगाव है
क्योंकि वह बहकर आ रही है उसके मायके से
आज भी सुन सकती है वह गीत, नदी के स्वर में अपने ![]()
पूर्वजों के
वह जानती है, प्राण पनपते हैं इस नदी में
वह गाती है
जब उसे उदासी घेर लेती है
प्रवासी पति, बेटे की याद सताती है
कभी-कभी मायका में छोड़े अपने अतीत पर
वह गाती है बाजूबंद सिर्फ बाजूबंद
वह देती है गाली
ककड़ी की चोरी पर लड़कों को
खेतों के चुगान पर ग्वालों को
घास की चोरी पर घसियारियों को
चुगली खाने पर चुगलखोरों को
उसकी गाली में भी एक संगीत होता है
पहाड़ की चेली ले, पहाड़ की ब्वारी ले
कैभे नि खाया द्वि रुवाटा, सुख ले
पहाड़ की चेली ले, पहाड़ की ब्वारी ले
राति उठी, पोश गाड़ना
पानी ले भरी लियूना
बिना कलेवा रुवाटा,
तिवीली जाण घास का मगना
बार बाजी तू घर आयी
सासू के गाली पायी
पहाड़ की चेली ले, पहाड़ की ब्वारी ले
कैभे नि खाया द्वि रुवाटा, सुख ले
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जो बजता है अपनी ही धुन में…
वह नफरत करती है
पूस के ठंडे पानी से
पेटीकोट के जुंओं से
काला बाँसा और गाजर घास से
खाकी वर्दी से
वह चाहे जंगलात की हो
या पुलिस की
वह वोट को दान नहीं मानती
उसने जिन्दगी में दो बार वोट दिया
एक प्रधान को, जहाँ उसके पति को खानी पड़ी है मार
एक विधायक को, जिसने बेच दिया है उसके बच्चे के
बचपन को
उसे अपने बिस्तर के अलावा कहीं नींद नहीं आती
वह मायके भी सिर्फ दिन भर के लिए जाती है
सड़क उसने वही देखी जिस पर चलती है वह
उसका आदि और अंत उसे नहीं मालूम
वह सड़क उसे मरे अजगर जैसे लगती है
जिस पर फिसलती है जिन्दगी
उसने चाँद को देखा और सोचा वह सिर्फ हमारा है
सूरज- जो तपता है सिर्फ हमारे लिए
तारे जो चमकते है सिर्फ हमारे गाँव के ऊपर
जंगल
बाँज, बुराँस, मौरु, कणदी से उसके अपने रिश्ते हैं
घिंघारु, मोळ, भमोर, किल्मोड़ और हिंसर जी भर कर
खाती है
घुघती, हिलाँस, योलड़ी, कफू उसके दुख के साथी हैं
जो आते हैं उसके गीतों में ![]()
क्योकि जंगल और खुद में उसने कोई अंतर नहीं समझा
आज
उसका गाँव उजड़ गया विकास के नाम पर
उसकी नदी बिक गयी विकास के नाम पर
उसका जंगल कट गया विकास के नाम पर
उसको छोड़ चले उसके रिश्ते के परिन्दे
वह गा रही है गीत जिन्दा रहने के
गाली दे रही है, किसको, पता नहीं
वह पिट रही है पुलिस के हाथों
और सो रही है जेल के सड़े कम्बलों पर
एक गहरी सपनों से भरी नींद में
-त्रेपन सिंह चौहान

























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