प्रति तीन कंडोम के पैकेट का मूल्य एक रुपया, प्रति गर्भनिरोधक गोलियों के चक्र का मूल्य भी एक रुपया, प्रति आपातकालीन गर्भनिरोधक की एक गोली का पैकेट दो रुपए, यह भारत सरकार द्वारा वितरित व आशा द्वारा घर-घर वितरण हेतु है। यह है केन्द्र सरकार द्वारा सामाजिक व्यवसाय (सोशल मार्केटिंग) की एक प्रायोगिक योजना जिसके माध्यम से लोगों को परिवार नियोजन के साधन उपलब्ध कराये जाने हैं। प्रायोगिक तौर पर देश के 17 प्रान्तों के 233 जनपदों में यह योजना चलाई जा रही है। इसके अन्तर्गत आशा कार्यकर्तियों को गर्भनिरोधकों की आपूर्ति करनी है। लेकिन यह योजना शुरू होते ही विवादों में आने लगी है। इस योजना को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी जिन आशा कार्यकर्तियों के जिम्मे है, वह इसे व्यावहारिक नहीं मानती। खुद इनके परिवार के लोग भी इस योजना को अव्यावहारिक करार देते हैं। आशा कार्यकर्तियों का कहना है कि इस तरह के कामों के लिए वह न तो मानसिक रूप से तैयार हैं न हमारा सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश इसकी इजाजत देता है। इस सोशल मार्केटिंग की वजह से आशा कार्यकर्तियों को सुरक्षित प्रसव, टीकाकरण व अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों के निर्वहन करने में दिक्कतें पैदा हो रही है। यह कार्यक्रम इन्हें सामाजिक कार्यकर्ता से कंडोम बेचने वाला कमीशन एजेंट बना रहा है, जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में इनकी भूमिका ‘चेंज ऐंजेट’ की है। कंडोम बेचने की इस सामाजिक योजना की व्यावहारिकता पर अब तमाम सामाजिक संगठन भी मुखर होने लगे हैं।
उल्लेखनीय है कि गर्भवती महिलाओं को मीलों दूर से चिकित्सालय लाकर सुरक्षित प्रसव करा मातृत्व सुख का अहसास कराने, बच्चों का समय पर टीकाकरण कर स्वस्थ व सुरक्षित जीवन प्रदान करने वाली आशा कार्यकर्तियों की समाज में जीवनदायिनी की जो छवि बनी है, इस सामाजिक व्यवसाय ने उस छवि पर प्रतिकूल प्रभाव डालने का काम किया है। सोशल मार्केटिंग के तहत आशा को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह गाँवों में उन पात्र दम्पतियों की सूची तैयार करे, जो गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल करने के इच्छुक हैं, या फिर जिन्हें इसकी जरूरत है, फिर उन परिवारों तक गर्भनिरोधकों की आपूर्ति भी वह करे। गर्भनिरोधकों को लाने के लिए आशा को सीएचसी, पीएचसी की दूरी तय करनी पड़ेगी लेकिन इसके लिए उसे कोई यात्रा भत्ता देय नहीं होगा। इस व्यवसाय के बदले आशा को मिलेगा मात्र एक रुपए। अब इस एक रुपये के लिए आशायें अपनी सामाजिक पूंजी को दाँव पर लगाने से झिझक रही हैं। झिझक यह है कि घर-घर जाकर पुरुषों के बीच गर्भनिरोधकों का वितरण करे तो कैसे? कुंठित सामाजिक सोच के बीच इस व्यवसाय को करना उन्हें काफी जोखिमपूर्ण लगता है। ऊपर से परिवार के लोगों का इस तरह का काम न करने का दबाव अलग है। ऐसे में आशा कार्यकर्तियां यही आशा कर रही हैं कि यह योजना बंद हो जाय तो बेहतर हो।