‘‘कहो कैसा लगा नैनीताल ? कहा था न… ऐसी जगह ले जाउंगा जहाँ सकून है, तन्हाई है, मस्ती है।’’
‘‘वाह क्या जगह है नैनीताल, मै तो हर साल यहाँ आना चाहूँगी। न आई.डी का झंझट है न ‘रेड’ का डर। हाँ, थोड़ा महंगा जरूर है, पर ‘सेफ’ है।’’
एक जनवरी की सुबह मालरोड कूड़े से अँटी पड़ी है। बड़े आश्चर्य की बात है कि उनमें आपस में बातचीत हो रही है। क्यों न हो आज का कूड़ा आम दिनों से अलग है। महंगी शराब, बीयर, सोडा और पानी की बोतलें बिखरी पड़ी हैं। पैक्ड ‘मटन’, चिकन, महंगी सिगरेट और पीजा बर्गर के खाली रैपर कल रात की रंगीनियों को बयान कर रहे हैं।
बाहर से आया कूड़ा महंगा कूड़ा है। जो सड़क के किनारे पर कूड़ा कम ‘भूला हुआ सामान’ ज्यादा लगता है। रोज नजर आने वाले अंडे और मूँगफली के छिलके, बीड़ी-सिगरेट के डिब्बे, देसी शराब की बोतलें, पॉलीथीन और कागज की थैलियाँ सब बड़े आश्चर्य से बाहर से आये कूड़े को देख रहे हैं।
‘‘कैसा रहा थर्टीफर्स्ट ?’’ मैक्डॉवल्स के चिकन बर्गर ने ‘मैजिक मोमेंट’ की बोतल से पूछा।
‘‘कल कुछ ज्यादा हो गयी थी।’’ मैजिक मोमेंट की बोतल ने कहा और फिर बाद में मँगवाये गये ‘हाफ’ को सावधानी से अखबार में लपेटा और डस्टबिन में डालने चल पड़ी।
सामने पुलिस का चैकपोस्ट है, जिसके बाहर कुछ फूटे हुए बम और सीले हुए पटाखे और माचिस की डिब्बियाँ पड़ी हैं। मैं पटाखे उठाकर ऊँची जगह पर रखना चाहता हूँ। पटाखों को हाथ लगाते ही मुझे अहसास होता है कि पटाखे सीले नहीं हैं। जमीन में पड़े रहें तो सीले से लगते हैं। हाथ लगाते ही सुर्ख अंगार हो जाते हैं। मैं उन्हें जस का तस रख देता हूँ।
सामने एक ‘लेगपीस’ पड़ा है, जिसमें कुछ माँस अब भी बचा है। कुत्ते उसके लिये लड़-मरने को तैयार हैं। लगता है खूँन की नदियाँ बहेंगी…….पर आश्चर्य कुत्ते एक टोली में बदल गये और बोटियों को लेकर गलियों में गुम हो गये।
अचानक हवा तेज हो गयी। ‘रोज का कूड़ा’ बाहर से आये कूड़े में मिल गया। लगता है लड़ाई हो रही है। हवा और तेज हुई तो ओने-कोने पड़ी प्लास्टिक, डिस्पोजल गिलास और पानी की बोतलें बीच-बचाव को आने लगीं। ट्रिपल फाइव का पैकेट बीड़ी के बंडल को धमकाते हुए लोअर माल रोड़ में फेंक देता है। देशी शराब और किंगफिशर की बोतलें आपस में टकराने लगती हैं। मूँगफली के छिलके थैली फाड़ कर पूरी मालरोड में फैल जाते हैं।
कच्ची का पव्वा चीखते हुए कहता है- ‘‘तुम लोग एक दिन के लिये यहाँ आते हो मौज-मस्ती करने के लिये। सोचते हो कि नैनीताल तुम्हारी जागीर है। कल रात मैं भी ‘ब्लेक’ में बिका हूँ। मुझसे टकराने की गलती मत करना।’’ घमासान जारी है। हवा बढ़ती जा रही है। कूड़ा लड़ता-झगड़ता फैलता जा रहा है। रात भर ‘मुन्नी बदनाम हुई’ चीखने वाला स्पीकर बड़ी खामोशी से इस नजारे को देख रहा है।
पौ फटते ही चहल-कदमी बढ़ गयी। सफाई की जानी-पहचानी आवाज सुनकर कूड़़ा दहशत में आ गया। पॉलीथीन और कागज की थैलियाँ सरपट हवा में उड़कर भागने लगीं। बोतलें कबाड़ियों के अंधेरे थैलों में समाने लगीं। कल रात की हर घटना को छुपाने का काम सफाई ‘बड़ी सफाई’ से कर रही है। और क्यों न हो ? नैनीताल की सफाई बहुत जरूरी है, जो आज पहली जनवरी से शुरू हो गयी है और भगवान ने चाहा तो अगले ‘थर्टीफस्ट’ तक जारी रहेगी।