अभी हाल में उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य के लिए एक नई कृषि नीति का मसौदा तैयार किया है। इस मसौदे में क्या है यह तो पता नहीं पर इसे तैयार करने का काम जिस तरह किया गया वह पूरी तरह आपत्ति करने लायक है। राज्य के लिए नई कृषि नीति का मसौदा तैयार किया जा रहा था मगर राज्य के किसानों और उनके प्रतिनिधि संगठनों की इस सम्बन्ध में न कोई राय ली गई और न ही उनसे कोई सुझाव आमंत्रित किये गये। पंतनगर कृषि विश्व विद्यालय के माध्यम से तैयार किये गये इस मसौदे के निर्माण का ठेका जिला स्तर पर विभिन्न एन.जी.ओ. को दिया गया और राज्य की जन विरोधी नौकरशाही और एन.जी.ओ. को ही इस मसौदे को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। जाहिर है कि कृषि नीति का यह प्रस्तावित मसौदा राज्य के किसानों के जीवन को उन्नत बनाने के बजाय बड़े नौकरशाहो, राजनेताओं और एनजी. ओ. के लिए कमाई के नये रास्ते तलासने की कवायद के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।
अगर हमारी राज्य सरकार को राज्य के किसानों के हित में कोई नई कृषि नीति बनानी है तो उसे सबसे पहले राज्य में एक नया भूमि सुधार कानून लाना चाहिए। राज्य में उत्तराखण्ड कुमाऊँ जमीदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून (कूजा एक्ट) 1960 और उ.प्रजमीदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून दोनों लागू हैं। कूजा एक्ट ने राज्य में कृषि क्षेत्र के विस्तार को पूरी तरह रोक कर पहाड़ की कृषि अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है। इसके चलते पहाड़ के किसान आज एक बड़े भूमि संकट के मुहाने पर खड़े हैं। राज्य के हरिद्वार जिले में उ.प्र. जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून बेनाप, बंजर, परती, चरागाह, पनघट, नदी, तालाब व पोखर की जमीनों को ग्राम पंचायत के नाम दर्ज कर ग्राम पंचायतो में भूमि प्रबन्ध कमेटी के माध्यम से इन जमीनों के प्रबन्ध व वितरण का अधिकार ग्राम पंचायतों को देता है। मगर पर्वतीय क्षेत्र में कूजा एक्ट ग्राम पंचायतों को इस भूमि व उसके प्रबन्ध व वितरण के अधिकार से वंचित कर देता है। ऐसे में राज्य के लिए एक नये भूमि सुधार कानून की मांग राज्य के किसानों की प्रमुख मांग है।
राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में कृषि क्षेत्र के विस्तार में एक और प्रमुख रोड़ा है। अंग्रेजों ने पहाड़ की बेनाप बंजर (संजायती) जमीनों को सन् 1893 में एक शासनादेश के माध्यम से रक्षित वन भूमि की श्रेणी में डाल दिया था। आजादी के बाद और नया राज्य बनने के नौ साल बाद भी सन् 1893 के इस शासनादेश को रद्द कर पहाड़ की समस्त बेनाप बंजर भूमि को ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित करना चाहिए। राज्य के 88 प्रतिशत भू-भाग में पहाड़ हैं। पहाड़ की खेती को रोजगारपरक बनाने के लिए राज्य में एक नये भूमि बन्दोबस्त के माध्यम से जमीन की गोल खाता व्यवस्था को खत्म कर हर परिवार की जमीन का स्वतंत्र खाता और जमीन में चकबंदी कार्यक्रम लागू करना राज्य की प्राथमिकता में होना चाहिए। स्वैच्छिक नहीं बल्कि कानूनन हो और इसके लिए देश का चकबन्दी कानून प्रर्याप्त ताकत रखता है। बिना चकबन्दी के राज्य के पहाड़ी किसान व्यवसायिक खेती नहीं कर सकते हैं। नये भूमि बन्दोबस्त के माध्यम से तराई और पहाड़ में बड़े फार्मरों, इस्टेट के मालिकों और बागवानी के नाम पर बड़ी संख्या में जमीन हड़पने वाले भूमि चोरों के कब्जे से फालतू जमीनों को निकालना और राज्य में सीलिंग की सीमा घटा कर फालतू जमीन भूमिहीनों को बाँटने का काम राज्य सरकार तत्काल अपने हाथ में ले। राज्य के नब्बे प्रतिशत किसानों व भूमिहीनों की यह प्रमुख मांग है। सन् 1976 का वृक्ष संरक्षण कानून पहाड़ के किसानों को अपनी भूमि पर उगाये गये पेड़ों का स्वयं के लिए और व्यवसायिक रूप से काटने की इजाजत नहीं देता है। जबकि कृषि व सब्जी उत्पादन के अयोग्य भूमि पर पहाड़ का किसान भी मैदानी किसानों की तरह वृक्ष उगाकर उसके व्यवसाय से अपनी रोटी चला सकता है। मगर उत्तराखण्ड सरकार को इन नौ वर्षों से चला रहे सत्ताधारियों को पहाड़ के किसान की यह समस्या दिखाई नहीं देती। इसलिए वृक्ष संरक्षण कानून में संसोधन कर पहाड़ी किसानों को भी उनका यह अधिकार दिलाना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में होना चाहिए।
उत्तराखण्ड को हर्बल स्टेट बनाने की घोषणायें इन नौ वर्षों में हर सरकार ने की है। इस मद में बजट भी अच्छा खासा लगा है। मगर राज्य का किसान इसका फायदा नहीं उठा पाता है। यह पूरा बजट प्रदर्शनी के रूप में उत्पादन कर एन.जी.ओ., नौकरशाही और राजनेताओं की जेब में चला जा रहा है। राज्य का किसान जड़ी-बूटी उत्पादन को अपने रोजगार का साधन तब तक नहीं बना सकता जब तक जड़ी-बूटी को वन उत्पाद की श्रेणी से हटाकर कृषि उत्पाद की श्रेणी में नहीं रखा जाता। जड़ी-बूटी का वन उत्पाद की श्रेणी में हाने के चलते इसके उत्पादन से लेकर विपणन तक पूरी प्रक्रिया में वन विभाग थानेदार की भूमिका में रहता है और किसान इस जटिल प्रक्रिया से गुजरने में भारी लूट का शिकार होता है।
हमारी कृषि व पशुपालन पूरी तरह से वनों पर आश्रित है। खासकर पर्वतीय क्षेत्र की। वनों से जनता के परम्परागत अधिकार छिनने के कारण कृषि पशुपालन का व्यवसाय अरुचिकर व अलाभप्रद बन गया है। पहाड़ के ग्रामीणों, जोनसार भाबर व राज्य के खत्ता-खरक वासियों को अन्य परम्परागत वनवासियों की श्रेणी में रखने का विधेयक राज्य सरकार को तत्काल राज्य विधानसभा में लाना चाहिए। इससे अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य परम्परागत वन वासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून के तहत वनों पर निर्भर राज्य की इस आधी आबादी को अपने परम्परागत वन अधिकार मिल जायेंगे जो राज्य की कृषि व पशुपालन को रोजगारपरक बनाने में मददगार होगा।
राज्य से गौ रक्षा कानून को तत्काल हटाकर गौ वंश की बिक्री पर लगा प्रतिबन्ध तत्काल हटना चाहिए। गौ रक्षा के नारे ने गौ वंश की आज जो दुर्दशा की है वह इतिहास में मिलना कठिन है। यह नारा देने वाले गौ पालक नहीं हैं। गौ पालक किसानों और हल बैल से खेती करने वाली हमारी आधी से ज्यादा कृषक आबादी इस प्रतिबन्ध से शोषित और पीड़ित है। इसके साथ ही पशु नस्लों में सुधार के व्यापक कार्यक्रम और हर गांव तक सहकारी दुग्ध समितियों के गठन की योजना राज्य बनने के नौ साल बाद भी शुरू नहीं हुई है। राज्य के नीति निर्धारक अगर इस दिशा में कृषक हित में ठोस कदम उठायें तो राज्य एक बड़ी श्वेत क्रांति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। किसान की खेती को जंगली जानवरों जैसे हाथी, सुअर, हिरन, भालू, बन्दर और आवारा पशुओं से भारी क्षति हो रही है। पहाड़ के कई क्षेत्रों में बन्दरों व सुअरों के आतंक से ग्रामीणों ने अपनी भूमि में खेती करना कम कर दिया है। राज्य सरकार को किसानों की मेहनत की रक्षा के लिए दीर्घकालिक योजना के तहत कृषि भूमि की दिवालबन्दी और विद्युत करेंट की योजनाओं का जाल बिछाना चाहिए। विद्युत करेंट के लिए सौर ऊर्जा स्कीमों को विकसित कर उन्हें ग्राम पंचायतों के माध्यम से निःशुल्क वितरण की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए बजट में विशेष प्रावधान होना चाहिए।
मैदानी किसानों को उसकी प्रमुख फसलों पर समर्थन मूल्य और खरीद की गारण्टी मिलती है। मगर पहाड़ के किसानों की प्रमुख फसलों जैसे मड़ुआ, गहत, भट्ट, सोयाबीन, ओगल (कोटू), रामदाना, राजमा, दालें तथा फलों का न तो राज्य सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है और न हीं उनके इन उत्पादों की खरीद की कोई व्यवस्था की है। इसका नतीजा यह है कि पहाड़ी किसान अपने इन उत्पादों को कौड़ियों के दाम बेचने पर मजबूर होता है। इसलिए राज्य सरकार को पहाड़ी किसानों के इन उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर हर विकास खण्ड में चार सरकारी क्रय केन्द्रों के माध्यम से इसके खरीद की गारण्टी करनी चाहिए।
पहाड़ में बे-मौसमी सब्जियों का उत्पादन होता है। सब्जी उत्पादन को प्रोत्साहित करने व मण्डियों तक किसान की सीधी पहुँच बनाने के लिए राज्य सरकार को हर तहसील में एक सब्जी मण्डी की स्थापना करनी चाहिए जिससे किसानों द्वारा उत्पादित सब्जियों व फलों की उन्हें उचित कीमत मिल सके। हर विकासखण्ड में कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना कर इसके साथ फल-उद्यान, पशुपालन, मत्स्य उत्पादन जैसे विभागों को भी सम्बद्ध कर किसानों को वैज्ञानिक जानकारी के एकल केन्द्र ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध कराने चाहिए। पहाड़ की खेती सिंचाई के लिए अब भी पूरी तरह (लगभग 90 प्रतिशत) वर्षा जल पर निर्भर है। जबकि पहाड़ की नदियाँ देश के एक बड़े हिस्से को अथाह जल भण्डार दे रही हैं। पहाड़ में सिंचाई व्यवस्था को सूचारु बनाने के लिए नदी घाटियों में हाई ड्रम सिंचाई योजनाओं का जाल बिछाया जाना चाहिए। इसके साथ ही ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए लिफ्ट योजना बनाकर पूरे पर्वतीय कृषि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जा सकती है।
राज्य को ऊर्जा प्रदेश बनाने में पहाड़ के ग्रामीणों को ही हर तरह से तबाही का मंजर देखना पड़ रहा है। इसके बावजूद उस उत्पादन से राज्य को मिलने वाली 12 प्रतिशत रायल्टी का फयदा पहाड़ के ग्रामीणों को नहीं दिया जा रहा है। राज्य सरकार को पर्वतीय किसानों को घरेलू विद्युत बिल एक रुपये प्रति यूनिट देना चाहिए और इन विद्युत बिलों में फिक्स डिमाण्ड चार्ज के रूप में लिया जा रहा 15 रुपया प्रति माह का अतिरिक्त चार्ज समाप्त करना चाहिए। इसकी भरपाई विद्युत योजनाओं से मिल रही रायल्टी से होनी चाहिए।
उत्तराखण्ड राज्य के लिए बनने वाली कृषि नीति में अगर उपयुक्त सवालों और समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो जाहिर है राज्य सरकार द्वारा तैयार कृषि नीति का मसौदा बड़े फार्मरों, भूमि चोरों एन.जी.ओ., नौकरशाहों और राजनेताओं के हितों की ही रक्षा करेगा। ऐसे में राज्य के व्यापक किसानों के सामने इस कृषि नीति के खिलाफ सड़कों में उतरने का विकल्प ही बचा रहेगा जो उत्तराखण्ड में एक जनपक्षीय विकल्प की दिशा में आगे बढ़ेगा।
























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