उत्तराखंड की स्त्रियों द्वारा चलाए जा रहे शराब-विरोधी आंदोलन ने काफी प्रगति की है। उससे घरों में बनने वाली शराब की बिक्री दो महीनों में आधा रह गई है। यदि आंदोलन चलता रहा, जैसा कि उम्मीद है, तो संभव है घरों में कच्ची शराब बनना पूरी तरह बंद हो जाये।
लेकिन इससे पहाड़ शराब मुक्त नहीं हो पाएगा। हर साल मार्च में उत्तराखंड सरकार देशी शराब की दुकानों के लिए शहरों तथा बड़े कस्बों में ठेके देती है। वहाँ से जो जितनी चाहे बाहर की बनी बोतलों में भरी शराब लेना चाहे खरीद सकता है। इतना अवश्य है कि इन दुकानों में शराब का मूल्य घर में बनी शराब की अपेक्षा बहुत अधिक होता है और कीमत के कारण लोग उसका घर बनी शराब की भाँति मनमाना उपयोग नहीं कर पाते। तब भी बाहर से बन कर आई शराब की बोतलें इन दुकानों में धड़ल्ले से बिक रही हैं और उस में तेजी भी आई है। चमोली जिले, जहाँ मैं रहता हूँ, में सरकार द्वारा आबंटित शराब की 13 दुकानें हैं, जो शीघ्र ही बढ़ कर 15 हो जायेंगी। इन में प्रत्येक की प्रतिदिन की बिक्री लगभग दो लाख रुपए है। इस बिक्री पर उनके मालिकों को कोई आय, बिक्री या अन्य कर नहीं देना पड़ता, सिवाय आरंभ में 10 प्रतिशत आबकारी शुल्क के। बाकी सब मुनाफा ही मुनाफा है। सरकार ने प्रत्येक दुकान की आमदनी का अनुमान लगा कर उन पर आबकारी कर लगाया है।
ये दुकानें शराब के बडे़ व्यापारियों या सिंडिकेट द्वारा चलायी जाती हैं, जो इस क्षेत्र में पौंटी चड्ढा तथा एम. एल जुयाल के पास हैं। वैसे 2002 की शराब नीति के अनुसार दुकानें स्थानीय व्यक्तियों के नाम पर आबंटित होती हैं, लेकिन असली चलाने वाले मालिक इन दो व्यक्तियो की सिंडिकेटें होती हैं, जो कई दुकानें एक साथ चलाती हैं। ये असली मालिक बाहर से दुकानों तक शराब की बोतलें पहुँचाते हैं, उनको रखने के गोदाम स्थापित करते हैं तथा दुकानों में सेल्समैन नियुक्त करते हैं। दुकानों के लिये आवेदन पत्र का शुल्क आरंभ में 200 रुपए था, जिसे 2002 में बढ़ा कर 15,000 रुपए कर दिया गया। प्रत्येक दुकान के लिए दर्जनों लोग आवेदन करते हैं तथा कई लोग एक से अधिक दुकानों के लिए अर्जी देते हैं। अनुमानतः प्रत्येक आवेदनकर्ता कम से कम 60,000 रु. सिर्फ आवेदन पत्र खरीदने के लिए खर्च करता है। आवेदन मंजूर होने पर 10 प्रतिशत आबकारी कर आरंभ में जमा करना पड़ता है, जो लाखों रुपया होता है। इतना धन सामान्य पहाड़ी व्यवसायी के पास तो होता नहीं। तब सिंडिकेट के मालिक आते हैं और वे आवश्यक धनराशि उपलब्ध करा देते हैं। आबंटी से वे एक करार कर कि दुकान वे चलायेंगे, दुकान अपने हाथ में ले लेते हैं। यह दस्तावेज पंजीकृत नहीं होता। इस तरह सिंडिकेट के मालिक एक से डेढ़ लाख रुपए दे कर दुकान अपने कब्ज़े में कर लेते हैं और उसे चलाने के लिये अपने सेल्समैन नियुक्त कर देते हैं। ये कर्मचारी ही सिंडिकेट के गोदामों से शराब की बोतलें लाकर बेचते हैं तथा दिन भर की बिक्री का धन बैंक में भी जमा करते हैं। इस तरह शराब की दुकान किसी के नाम होती है, लेकिन चलाने वाला कोई और होता है। गढ़वाल में इन दो सिंडिकेटों में जुयाल का कारोबार फिलहाल इसी क्षेत्र तक सीमित है, जब कि पौंटी चड्ढा का व्यापार सारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा अन्य राज्यों में फैला है।
शराब की इन दुकानों का आबंटन मार्च में होता था, जो इस साल नहीं हुआ। कहा जा रहा है कि वह अब संभवतः जुलाई में होगा। ये सिंडीकेट धन की दृष्टि से इतने प्रभावशाली हैं कि सरकार की शराब नीति को अपनी सुविधानुसार बदलवा सकते हैं। वे चुनावों में पार्टियों और उम्मीदवारों पर बहुत सारा धन व्यय करते हैं। कहा तो यहाँ तक जाता है कि शराब से हुई आय से जनपद के लगभग सभी अधिकारियों को हिस्सा मिलता है, जो बिना माँगे ही उनको दे दिया जाता है। यदि कोई कर विभाग जानना चाहे कि शराब बिक्री से प्रतिदिन कितनी आय होती है तो वह बैंकों के खातों से पता लगा सकता है। कुछ दुकानों में शराब मनमाने मूल्य पर बेची जाती है। प्रति बोतल पर दस या बीस रुपए अधिक ले लिए जाते हैं। खरीदने वाले हड़बड़ी में होते हैं। उन्हें सही दाम मालूम करने का समय नहीं होता।
शराब के व्यापारी बढ़ती आय से अन्य व्यवसायों की ओर जा रहे हैं। जुयाल, जो इस व्यापार में अधिक पुराने नहीं हैं, ने देहरादून में तीन होटल खोल लिए हैं। कहा जा रहा है कि हाल में उन्होंने देहरादून में एक विश्वविद्यालय की स्थापना भी कर ली है। कुछ माह पूर्व, जैसा कि अखबारों में छपा था, पौंटी चढ्ढा के मेरठ स्थित मकान से करोड़ों की नकदी मिली थी, जिसकी जाँच चल रही है।