अल्मोड़ा के निकट ‘डीना अस्पताल’ में ताला लटकने के बाद किसी प्रकार की राजनीतिक-सामाजिक संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया का न होना चिन्ताजनक है। चिकित्सा केन्द्र जैसे एक सार्वजनिक संस्थान को इस तरह से एकाएक बन्द कर देना अस्पताल की संचालक ‘जन जागरण समिति’ की कार्यप्रणाली पर भी संदेह पैदा करता है।
डीना अस्पताल अल्मोड़ा से 12 किमी. दूर कसारदेवी व डीनापानी के मध्य मटेना गाँव के ऊपर 2002 में ‘जन जागरण समिति’ द्वारा डीना केयर फाउंडेशन (यूएसए) के सहयोग से स्थापित किया गया। आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ इस अस्पताल में झाड़-फूँक व बेभूत लगाने वाले डंगरिये की भी व्यवस्था थी। गरीबी रेखा के नीचे के मरीजों से कम शुल्क लिया जाता था। अल्मोड़ा जिला मुख्यालय के अस्पतालों में सुविधाएँ न होने के कारण वहाँ के मरीज डीना अस्पताल आने लगे। कुछ चिकित्सक भी सरकारी नौकरी छोड़ यहाँ आ गये। अस्पताल की ख्याति इतनी फैली कि बागेश्वर, पिथौरागढ़ से ही नहीं हल्द्वानी आदि से भी मरीज आने लगे। इस बीच डीना केयर फाउंडेशन ने आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी तो पिछले दो साल से जनजागरण समिति इसे फोर्टिस समूह के साथ मिलकर चलाने लगी। बताया जाता है फोर्टिस से हाथ मिलाने के बाद टाटा ट्रस्ट आदि अन्य दाता संस्थाओं ने आर्थिक सहायता बंद कर दी। इसके बाद अस्पताल चलाना मुश्किल हो गया। देनदारी बढ़ जाने से दिसम्बर माह में डीना अस्पताल बंद कर दिया गया। अस्पताल बंदी की कोई सार्वजनिक सूचना न मिलने से दूर-दूर से आने वाले मरीजों की फजीहत हुई। चार महीना बीत जाने के बाद भी यह खबर आम नहीं हो पाई। इस बीच अस्पताल की सिटी स्कैन मशीन, अल्ट्रासाउंड, इंडोस्कोपी, लैप्रोस्कोपी आदि मशीनें बेच दी गई हैं। अस्पताल में केवल एक चौकीदार बचा है।
जिला पंचायत सदस्य महिपाल सिंह बिष्ट बताते हैं कि दिसम्बर में अस्पताल के बंद हो जाने पर भी संचालकों ने ग्राम सभा को सूचना नहीं दी तो जनवरी में ‘जन जागरण समिति’ की मुखिया मुक्ति दत्ता से वार्ता की गई। उन्होंने फंड न मिलने के कारण अस्पताल बंद करने की लाचारी बताई। तब तय हुआ कि अस्पताल के उपकरणों को बेच कर वहाँ के कार्मिकों की देनदारी चुकाई जाये और 15 अप्रेल तक अस्पताल चालू नहीं हुआ तो ग्राम सभा जमीन व अस्पताल भवनों को कब्जे में ले लेगी। महिपाल सिंह के अनुसार 1998-99 में मुक्ति दत्ता के प्रस्ताव से प्रभावित होकर ग्राम सभा ने 20 नाली जमीन पर्यावरण जन जागरण समिति को इस शर्त के साथ दी थी कि अस्पताल बंद होने पर यह सम्पत्ति स्वतः ग्राम सभा की हो जायेगी। अस्पताल में योग्यतानुसार 75 प्रतिशत नियुक्ति गाँव के बेरोजगारों की होगी और जाँच, एक्स रे, ओपीडी व ऑपरेशन आदि में ग्राम सभा के निवासियों को विशेष छूट मिलेगी। अस्पताल की प्रबंध समिति में ग्राम प्रधान को पदेन सदस्य व तत्कालीन ब्लॉक प्रमुख अमर सिंह बिष्ट को सदस्य के रूप में शामिल किया गया। अस्पताल बन्द होने से कई लोग बेरोजगार हो गये, जिनमें मटेना के ही दो दर्जन से अधिक लोग शामिल हैं। जन जागरण समिति की प्रमुख मुक्ति दत्ता कहती हैं कि अस्पताल में सात-आठ लाख रुपये का घाटा था। 16 लाख प्रति माह खर्चा आता है। अब डॉक्टर एक लाख से ज्यादा वेतन माँग रहे हैं। मगर वे इस मामले को निजी बताते हुए ज्यादा तूल न देने का आग्रह करती हैं और आश्वासन देती हैं कि जल्दी ही कोई रास्ता निकल आयेगा।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि अस्पताल चलाने में दिक्कत आ रही थी तो इसे चुपचाप बन्द क्यों कर दिया गया? इस कठिनाई को सार्वजनिक कर जनता से सहयोग करने की अपील क्यों नहीं की गई ? क्यों इस जमे जमाये अस्पताल को उत्तराखंड सरकार को देने की पेशकश नहीं की गई ? इस घटना से ‘जन जागरण समिति’ की भूमिका संदेह के घेरे में है। डीना अस्पताल को भूमि देने वाले मटेना ग्रामवासियों को अभी भी आशा है कि अस्पताल फिर से चल निकलेगा। मगर इसकी उम्मीद कम ही लगती है।