लाजवाब शहर है अल्मोड़ा! इसमें कोई दो राय नहीं। आप कितनी ही गहराई से इसे जानते हों, लेकिन हर बार इसे देख कर चमत्कृत हो सकते हैं। अरे, तो यह भी इसका एक चेहरा है ?
राजनीतिक या सामाजिक रूप से यहाँ कुछ विशेष न भी घट रहा हो, लेकिन यहाँ की अद्भुत प्रतिभायें कुछ न कुछ ऐसा अवश्य कर डालेंगी कि आप हैरान रह जायेंगे। हो सकता है बाहर रहते हुए आप उस घटना का कोई नोटिस भी न लेते, लेकिन इस नगर में पाँव रखते ही वह आपको तीसरी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण घटना लगेगी।
शराब को ही लें। लम्बे अर्से तक अल्मोड़ा शराब विरोधी आन्दोलन का केन्द्र रहा। 1984 में यहाँ से उठे ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन ने पूरे देश में अपनी धमक पहुँचायी थी। अब भी यहाँ उस दौर के एक वरिष्ठ आन्दोलनकारी हैं, जो ‘शराब माफिया’ को लेकर अपने कड़े रुख के कारण पूरे उत्तराखंड में विख्यात हैं। शराब माफिया पर उनके हमले लगातार जारी रहते हैं और खीझा हुआ कथित शराब माफिया भी जब-तब उनके खिलाफ गुमनाम रूप से चटपटे पर्चे बाँटता रहता है। इस बार वे शराब माफिया की ओर पीठ फेरे खड़े थे और अपने एक पुराने आन्दोलनकारी साथी के खिलाफ पर्चे बाँट रहे थे कि वे साम्प्रदायिक मंचों पर जाकर भाषण दे रहे हैं और इस प्रकार देश की साम्प्रदायिक एकता के लिये बहुत बड़ा खतरा बन गये हैं। उनके ई मेल अटलांटिक महासागर पार कर पृथ्वी ग्रह के दूसरे सिरे तक पहुँच रहे थे।
इधर शराब माफिया अपना खेल खेल रहा था।
28 मार्च को पूरे प्रदेश की तरह अल्मोड़ा जनपद के लिये भी देशी और विदेशी शराब के ठेके हुए। जनपद मुख्यालय में लॉटरी से भाग्यशाली शराब विक्रेताओं के नाम निकाले गये। लेकिन अन्यत्र कुछ हुआ हो अथवा नहीं, अल्मोड़ा नगर में उस शाम एक भव्य दावत हुई, जिसके छिटपुट धमाके एक सप्ताह बाद भी नगर के विभिन्न गली-कूचों में सुनाई दे रहे थे। कहा जा रहा है कि वह दावत मूलतः पत्रकारों के लिये थी और कसारदेवी के एक भव्य रिजोर्ट में सम्पन्न हुई थी। कुछ लोग कहते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी मौज-मस्ती के मूड में थे, कुछ पत्रकारों ने ही उलाहना देकर कि आप लोग कभी साथ-साथ बैठने का मौका ही नहीं देते, अपने आप को जबरन प्रशासन के गले मढ़ दिया। जिला सूचना अधिकारी दीपक जोशी ऐसी किसी दावत के होने से ही साफ मुकर जाते हैं, जबकि दावत में शामिल पत्रकार दावा करते हैं कि वे वहाँ बाकायदा मौजूद थे। बहरहाल, इतना सभी मानते हैं कि डी.एम., एस.पी., ए.डी.एम., एस.डी.एम., सी.एम.ओ. जैसे वरिष्ठ अधिकारी वहाँ थे और जब वे थे तो उनके साथ लगे रहने वाले छोटे स्तर के अधिकारी तो होंगे ही। दावत में 36 प्रकार के षटरस व्यंजन थे तो कई किस्म की मदिरायें भी थीं। खूब गाना-बजाना हुआ और मस्ती में आये एक एस.डी.एम. साहब यहाँ तक कहते सुने गये कि यह पूरा रिजोर्ट ही अवैध रूप से बना है। यह आयोजन किसकी ओर से हुआ, यह पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। यदि कोई सूचना के अधिकार के तहत पूछे तो शायद स्पष्ट हो जाये।
अलबत्ता अनजाने में इस दावत में पहुँच जाने का दावा करने वाले एक पत्रकार कहते हैं कि जब उन्होंने पूछा कि यह दावत हो किसकी तरफ से रही है, तो आबकारी अधिकारी ने गर्व से उन्हें बताया था कि ‘आप लोगों ने लॉटरी की पर्चियाँ निकाली थीं, इसलिये हमारी ओर से यह दावत है।’ अब जाहिर है कि आबकारी से जुड़े अधिकारी अपनी जेब से ऐसी दावतें तो करते नहीं। ![]()
हमारा समाज अब बहुत उदार हो गया है। जहाँ कहीं महिलाओं की जिन्दगी नारकीय हो गई है, वहीं वे किसी बाहरी संगठन अथवा मीडिया की मदद के बगैर शराब के खिलाफ अपनी लड़ाइयाँ लड़ रही हैं। जैसे अल्मोड़ा से महज 26 किमी. दूर बसौली में। वैसे खाते-पीते घरों की महिलायें बाकायदा शराब के ठेके ले रही हैं। शादी-बारात जैसे निजी आयोजनों में सार्वजनिक रूप से शराब पीना अब बीस-पच्चीस साल पहले की तरह बुरा नहीं माना जाता। अनेक बार सरकारी आयोजनों में भी डिनर के साथ शराब परोस दी जाती है। लेकिन इस दावत की टाइमिंग अद्भुत थी। दिन में लॉटरी और शाम को आबकारी महकमे की ओर से दावत ! जाहिर है कि अल्मोड़ा जैसी ‘सांस्कृतिक नगरी’ में चकल्लस तो होना ही था। अब, यहाँ से प्रेरणा लेकर सारे ही जनपद मुख्यालयों के पत्रकार अगले वर्ष से उस दिन का इन्तजार करेंगे, जिस दिन शराब के ठेके छूटने वाले होंगे।
एक पुछल्ला और सुनें। दावत उड़ाने वाले एक पत्रकार कहते हैं, भाई साहब बात कुछ भी नहीं है। यह तो साप्ताहिक अखबारों के उन चुक गये पत्रकारों की भड़ाँस है, जिन्हें प्रशासन ने घास नहीं डाली। वे नुक्कड़ों-दुकानों में जाकर इसे ‘इशू’ बना रहे हैं। बेमतलब पत्रकारों की एकता तोड़ी जा रही है।
है न मजेदार बात ? अब आप कभी अल्मोड़ा आयें तो अखबार पढ़ने के झंझट में न पड़ें, ओने-कोने में हो रही फुसफुसाहटों पर कान लगायें।