अल्मोड़ा नगरपालिका परिषद कर्मचारियों के अपनी चार सूत्रीय मांगों को लेकर पिछले 24 फरवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाने से नगर की सफाई व्यवस्था चरमरा गई है। जगह-जगह कूड़े के ढेर लग गये हैं और गंदगी से नाले-नालियाँ पटी पड़ी हैं जिनसे भभके उठ रहे हैं। मुख्य बाजारों व कुछ मुहल्लों में लोगों ने अपने बूते सफाई करनी शुरू कर दी है पर अपने घरों का कूड़ा पॉलीथीन में भर बाहर फेंकने वालों की कमी नहीं है।
छठे वेतनमान का एरियर की पहली किस्त तुरन्त देने, पिछले 20 माह से जमा नहीं हुए कर्मचारियों का फंड को तुरन्त जमा करने, पेंशन का भुगतान करने तथा संविदा पर रखे गए सफाई कर्मचारियों का मानदेय 1500 रुपया प्रति माह करना आदि कर्मचारियों की प्रमुख माँगें हैं। इन माँगों को लेकर अहं इस कदर टकराये कि कर्मचारी हड़ताल पर चले गए और समस्या सुलझने के बजाय उलझ गई है। इधर कई दिनों से कर्मचारियों व पालिका प्रशासन के बीच कोई वार्ता तक नहीं हो पाई है। कर्मचारी नगरपालिका की जर्जर वित्तीय स्थिति से वाकिफ हैं और मानते हैं कि यह समस्या गले की हड्डी बन गई है। कर्मचारियों द्वारा सुझाव दिया गया था कि मल्टीस्टोरी पार्किंग रूप में बन रही 42-43 दुकानों के आबंटन से मिलने वाले करीब चार करोड़ रुपयों के विरुद्ध बैंक से ऋण लेकर समस्या सुलझाई जा सकती है। मगर तथ्य यह है कि अब कोई बैंक पालिका को ऋण देने को तैयार नहीं है। पालिका पुराने कर्जों की किस्त ही जमा नहीं कर पा रही है। निर्माण कार्यों व कूड़ा ढोने की दो गाड़ियाँ खरीदने आदि के लिए 2,10,00,000 रुपए का जो ऋण लिया था उसकी किस्तें जमा न होने से उसका ब्याज ही 1,35,00,000 रुपए से अधिक हो गया है और कुल देनदारी 3.5 करोड़ रुपया हो गयी है।
पालिकाध्यक्ष शोभा जोशी बताती हैं कि वर्तमान में कर्मचारियों की 7.5 करोड़ रुपये की देनदारी है। कर्मचारियों की कुछ माँगों पर विचार करने के लिये उनसे छः माह का समय माँगा था, लेकिन कुछ पॉल्टिशियनों के बहकावे में आकर वे अपनी बात पर अड़े हुए हैं। राज्य सरकार कहती है कि नगर निकाय अपने संसाधन खुद तलाशें, लेकिन पहाड़ी नगरों की पालिकाओं के पास आय के ऐसे स्रोत क्या हैं ? वित्त आयोग से 14 लाख रुपया प्रति माह मिलता है जबकि प्रति माह खर्चा है 35 लाख। पहले 57 लाख रुपया क्षतिपूर्ति का मिलता था। वह भी पिछले ढाई वर्षों से नहीं मिल रहा है। पिछले लम्बे समय से नगरपालिका अधिशासी अधिकारी, जूनियर इंजिनियरों, हेल्थ इंस्पेक्टर, एकाउण्टेंट के बगैर अपना काम चला रही है। एक अध्यक्ष अकेले नगरपालिका का कैसे संचालन कर सकता है ? ऐसी स्थिति में अगर राज्य सरकार एकमुश्त बड़ा अनुदान नहीं देती है तो नगरपालिका का दिवाला निकलना तय है। 20 मार्च को राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष इन्दु कुमार पाण्डे अल्मोड़ा आ रहे हैं। उम्मीद है समस्या सुलझ जायेगी। फिलहाल नगर की सफाई व्यवस्था के बारे में पालिकाध्यक्ष कहती हैं कि अल्मोड़ा नगर के लोग काफी जागरूक हैं। उन्होंने बाजारों व अपने-अपने मुहल्लों में सफाई अभियान चलाना शुरू कर दिया है।
अल्मोड़ा के चरित्र से परिचित लोगों से यह बात छिपी नहीं है कि इस नगर की बेमतलब टाँग खिंचाई वाली राजनीति ने पालिका को बदहाल स्थिति में पहुँचाया है, इस बार भी यही हुआ है। बहरहाल इस बीच अल्मोड़ा की बाजारों के इतर जहाँ-तहाँ गंदगी से अटे नाले-नालियों,रास्तों के इनारे-किनारे पॉलीथीन के अन्दर जमा कूड़े के बेतरतीब ढेरों व कचड़े से भिनभिनाते मक्खियों से बचते-बचाते जाने पर इस नगर की हालत पर तरस आता है। दुनियाभर की राजनीति करने वाले इस बौद्धिक शहर में अब इतना भी दमखम नहीं रह गया कि अपनी सफाई व्यवस्था ही दुरुस्त कर ले।























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