अलविदा!
राजू भाई, अलविदा!
नश्वर देह त्यागने से पूर्व
सतीहरी ने किया था सचेत
खबर कभी भी मिल सकती है
तुम्हारे जुदा होने की
उनकी आँखों से मैंने देखी
तुम्हारे नेत्रों की चमक
और सुने
अधखुले होंठों से निकले स्वर
जो आह्वान कर रहे थे
एकजुट होने का
उन विध्वंसकारियों के खिलाफ
जो रच रहे हैं
साजिश जन के खिलाफ
तुम्हारी स्मृति हमें त्वरा देगी
और नेत्रों की ज्योति होगी पथगामी
अपने अहं को तिरोहित कर
हम बढ़ चलेंगे साथी
क्षीण काया तो आनी-जानी है
नये भोर की बेला में फिर मिलेंगे
साथी
एक नया इतिहास रचेंगे साथी
तुम्हें सलाम!