‘‘ससुर पर लगे बहू की हत्या के आरोपों के पाप को मैं धोना चाहता हूँ….यही मेरी मृतात्मा को श्रद्धांजलि होगी। मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। मेरा काम बस सच को सामने लाना है…..मैं तथ्यों की कड़ी जोड़ रहा हूँ……उत्तराखंड तो देव भूमि हुई…..देवता भी यहाँ न्याय करने वाले हुए।’’ ये कहना है एडवोकेट चंदन रौतेला का।
लखनऊ से कानून की डिग्री लेने के बाद चंदन रौतेला ने बागेश्वर और हल्द्वानी में वकालत की। फिरं झिरौली की मैग्नेसाइट फैक्ट्री में नौकरी की। लगभग चौदह वर्षों की नौकरी के बाद फिर से वकालत शुरू कर दी। गत वर्ष बागेश्वर की उप तहसील काफलीगैर के कठानी गाँव की भगवती देवी की हत्या के बाद उन्होंने पुलिस का नंगा नाच देखा तो पूरी ताकत से उसमें कूद गये हैं। उन्होंने इस प्रकरण में पुलिस अधिकारियों पर न्यायिक मामला दर्ज कराया है।
रौतेला बताते हैं कि भगवती देवी को गाँव के कुछ लोगों ने पुरानी रंजिश के चलते मार दिया और फिर उसके ससुर को फँसा दिया। 28 सितंबर 2011 को भगवती देवी अपनी सास आनुली देवी के साथ अपनी ननद के ससुराल सुनौली गाड़ गई थी। ननद के लड़के का नामकरण था। इस इरादे से कि शाम तक घर लौट आयेगी, अपने चार, छह साल व चौदह माह के बच्चों को ससुर की देखरेख में छोड़ गई। सास का एकाध दिन अपनी लड़की के घर रुकना तय था। ससुर मोहन सिंह रिटायर्ड फौजी हैं। नामकरण संस्कार से लौटने में थोड़ी देर हो गई। उसके गाँव से बोहाला तक जंगल का रास्ता है, वहाँ से आगे मोटर रोड। बोहाला में दुकानदार लक्षिमा देवी से ही राह गुजरते अक्सर जीप है या नहीं जैसी बातें पूछ लेते हैं। भगवती के ससुर ने बोहाला फोन कर पूछा तो उसे पता चला कि बहू वहाँ आ गई है। वह निश्चिन्त हो गया कि बहू के पैदल घर पहुँचने के लिए वक्त काफी है। लगभग साढ़े पाँच बजे उसने गाँव की ही आशा देवी को बोहाला की ओर जाते देखा। अंधेरा घिर आने पर भी बहू नहीं पहुँची तो थोड़ा चिंतित हो कर मोहन सिंह बोहाला वाले रास्ते की ओर चल पड़ा। थोड़ा आगे, पानी की टंकी के पास पहुँचा ही था कि झुटपुटे में उसने एक महिला को बदहवास हालत में आते देखा। पास आने पर देखा कि वह आशा थी। आशा ने बताया कि वह बाजार से लौट रहे अपने पति को लेने जा रही थी कि जंगल में गरजैल के पास लाल कपड़ों में एक लाश पड़ी देखी। वह भाग आई। यह सुनते ही मोहन सिंह गाँव के कुछ लोगों के साथ जंगल को दौड़े। वहाँ खून से लथपथ बहू की लाश मिली। उसे पत्थरों व धारधार हथियार से मारा गया था। उसके शरीर से सोने के करीब साढ़े छह तोले के जेवरात गायब थे।
घटनास्थल से ही पटवारी को फोन किया गया। रात को ही बोल कर एक सादे कागज में गोपाल सिंह, गोविंद सिंह, बहादुर सिंह, आशा देवी तथा हरीश सिंह के खिलाफ नामजद प्राथमिकी लिखाई गई, जिसे पटवारी ने 29 सितंबर की सुबह दर्ज किया लेकिन आशा देवी व बहादुर सिंह का नाम हटा दिया। अगले दिन बागेश्वर में पोस्मार्टम हुआ। वहाँ तहसीलदार व पटवारी ने मोहन सिंह को बुला एफआईआर में से दो नाम हटा देने के लिए कहा। मोहन सिंह नहीं माने। कुछ दिनों बाद पटवारी ने यह कहते हुए कि सुराग ही नहीं मिल रहे हैं, जाँच से हाथ खड़े कर दिये। मामला रेगुलर पुलिस के पास पहुँचा। 14 अक्टूबर 2011 को सीओ पीसी पंत व थानेदार कुशवाहा ने कठानी गाँव पहुँच कर मोहन सिंह के घर की तलाशी ली। इन्होंने न तो ग्राम प्रधान को बुलाया और न सर्च वारंट दिखलाया। मोहन सिंह की पेंट, कमीज, एक जंग लगा बड़्याठ ये लोग बिना सील किए हुए उठा ले गए। अगले दिन अपने भाई रतन सिंह के पास जा रहे मोहन सिंह को पुलिस ने रास्ते से उठा लिया। उसके रुपये भी मार लिए। भगवती के साथ अवैध सम्बन्धों के चलते उसकी हत्या कबूल करने के लिए दो दिन तक उसका थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया। मोहन सिंह के परिजनों के इस सवाल कि मोहन सिंह की रपट पर कोई कार्रवाही क्यों नहीं की जा रही है, का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। 56 घंटे की अवैध हिरासत के बाद मोहन सिंह को सीजेएम के सामने पेश किया गया और फिर जेल भेज दिया गया। इस दरमियान ग्रामीणों ने कई बार प्रदर्शन कर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। मामले की जाँच सीबीसीआईडी से कराने की भी माँग की। मगर प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी।
रौतेला का कहना है कि यदि नामजद व्यक्तियों व उनके तमाम रिश्तेदारों के काफलीगैर, कठपुडि़या आदि के पोस्ट आफिस व बैंकों के खातों से सितंबर-अक्टूबर 2011 में हुए लेन-देन की जाँच की जाये तो यह सच्चाई सामने आ जायेगी कि इन लोगों ने पुलिस-प्रशासन को कितना पैसा खिलाया।
तीन नवंबर को मोहन सिंह को अदालत से जमानत मिल गई। तब से मोहन सिंह मटेला में अपने पुश्तैनी गाँव में रहने लगा है। हत्या के मामले में इतनी जल्दी जमानत मिलने से ही साबित हो जाता है कि पुलिस का मुकदमा कितना लचर होगा। पुलिस की गवाह बनी आशा देवी खुद ही भूल बैठी है कि उसने कहाँ क्या बयान दिए थे। इन विरोधाभासी बयानों से ही झूठ की परतें उघड़ने लगी हैं। देर-सबेर पूरा सच भी सामने आ ही जायेगा। मगर, जैसा कि एडवोकेट चंदन रौतेला पूछते हैं कि असली मुजरिमों और उनके सरपरस्त पुलिस वालों का क्या होगा ? बागेश्वर की पुलिस और प्रशासन ने तो हत्या की घटनाओं को भी पैसा कमाने का व्यापार बना दिया है!
एडवोकेट रौतेला की सलाह पर मोहन सिंह ने इस मामले में पुलिस की भूमिका की शिकायत करते हुए गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक व आईजी नैनीताल को भी लिखा। कोई जवाब न मिलने पर न्यायिक मजिस्ट्रेट बागेश्वर की अदालत में पुलिस उपाधीक्षक बागेश्वर, थानाध्यक्ष झिरौली तथा चार कांस्टेबिलों के खिलाफ 420, 330, 340, 323, 324, 504 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया। अदालत ने एसपी को तीन दिन में अपना पक्ष रखने को कहा तो पुलिस तिलमिला उठी। उसने गवाह आशा देवी से एक एफआईआर झिरौली थाने में मोहन सिंह व उसके भाई हिम्मत सिंह के खिलाफ डराने, धमकाने की दर्ज करा दी। हिम्मत सिंह को गिरफ्तार भी किया गया। उसका मामला न्यायालय में विचाराधीन है। एसओ झिरौली ने तो इसी आधार पर मोहन सिंह की जमानत रद्द करने की अर्जी भी लगा दी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। ग्रामीण आशा देवी की शिकायत को फर्जी मानते हैं। उल्टे उन्होंने 16 फरवरी को परगना मजिस्ट्रेट से आशा देवी से बचाने की गुहार लगाई है। उनका आरोप है कि वह हमेशा गाली-गलौज करती है और उन्हें फँसाने की धमकी देती रहती है। पटवारी ने तो चुप्पी साध ही रखी है। फिलहाल एसडीएम की ओर से भी कोई हरकत नहीं हुई है।
कठानी व उसके आसपास के गाँवों में जागर व पूजा में देव-डंगरिये में अवतरित होकर भगवती देवी अपनी मौत की सच्चाई बताने लगी है। इससे ग्रामीण भयभीत हैं। मानवाधिकार संगठन के जांचकर्ता रिटायर्ड कैप्टन जेके पंत ने भी इलाके में जाकर कठानी व बोहाला के ग्रामीणों के बयानों की 16 मार्च 2012 को दो सीडी वीडियो रिकार्डिंग बनाई। उन्होंने अपनी रिपोर्ट व सीडी की दो प्रतियाँ मुख्यमंत्री तथा अनेक उच्चाधिकारियों को भेजीं। मुख्यमंत्री ने पुलिस महानिदेशक को आवश्यक कार्यवाही करने को लिखा। मगर आईजी कुमाऊँ ने सीडी ही वापिस भेज दी। रिपोर्ट में कैप्टन पंत ने कहा है कि मृतका भगवती देवी की हत्या के बाद उसके शरीर से लूटे गए साढ़े छह तोला सोने के गहनों का पुलिस ने कहीं भी जिक्र नहीं किया है। कैप्टन पंत ने इस मामले की जाँच सीबीसीआईडी से कराने तथा नारको एनालिसिस प्रक्रिया अपनाने की माँग की है।
इस प्रकरण के अंतिम अध्याय के रूप में पुलिसिया गवाह आशा देवी के पति की भी 21 मई 2012 को संदिग्धावस्था में मौत हो गई है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दिए गये पत्र में मोहन सिंह ने कहा है कि बागेश्वर में रह कर छोटी-मोटी नौकरी करने वाला आशा देवी का पति आनंद सिंह अपनी पत्नी से वास्तविक हत्यारों के नाम उजागर करने के लिये कहता था। गोपाल सिंह के कहने पर आशा देवी अपने दो बच्चों के साथ 16 मई को बागेश्वर पहुँची। गोपाल सिंह ने ही उसके रहने की व्यवस्था की। इस बीच आशा का पति आनंद फिर से उसे टोकने लगा कि भगवती की हत्या में जो कुछ सच है, उसे बता दे। देवी-देवता नाराज हो रहे हैं। जागर में भी भगवती आने लगी है। 20 मई 2012 की रात खाना खाने के बाद आनंद की हालत बिगड़ने पर आशा देवी व अन्य लोग उसे सुबह अस्पताल के बरामदे में लावारिस छोड़ गये। बाद में एक लावारिस को अस्पताल के बरामदे में देख कर वहाँ हड़कम्प मच गया। डॉक्टरों ने उसकी जाँच की तो वह मृत मिला। गाँव में यह खबर पहुँचते ही आनन्द के भाई पूरन सिंह समेत ग्रामीण आगबबूला हो कर बागेश्वर आ धमके। पूरन सिंह ने कोतवाली बागेश्वर में एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें उसने मृतक की पत्नी आशा देवी, गोपाल सिंह, गोविंद सिंह, बहादुर सिंह तथा हरीश सिंह पर हत्या का संदेह व्यक्त किया। जब उनकी कुछ भी नहीं सुनी तो उन्हें दो दिन तक आंदोलन करना पड़ा। तब जाकर मृतक आंनद का पोस्टमार्टम डाक्टरों के पैनल से कराया गया। इस मामले में भी पुलिस चुप्पी साधे है।
बहरहाल एडवोकेट चंदन रौतेला को विश्वास है कि पुलिस बहुत दिनों तक अपने झूठ को बचाये नहीं रख सकेगी…..