ताल के किनारे मछली मारने वालों को देखना कई बार गहन अनुभूति देता है। पर नैनीताल जैसे शहर में अब ऐसे दृश्य दिखाई नहीं देते। जबकि मछली पकड़ना अब उच्च वर्ग के पर्यटकों के शौक में शामिल हो चुका है। गर्मियों का सीजन शुरू होने के साथ ही पर्यटक उत्तरी भारत के पर्यटन स्थलों और पहाड़ों की तरफ रुख करने लगते हैं। पर्यटकों का एक खास वर्ग शहरों की गहमागहमी से दूर झील और नदियों के तट पर मछलियों की हलचल के बीच उन्हें पकड़ने का रोमाँच महसूस करना चाहता है। यही वजह है कि पर्यटन और मछली पकड़ना एक नए किस्म के रिश्ते में जुड़ने लगे हैं। पर्यटन व्यवसाय से जुड़े कुछ आयोजक एंगलिंग के लिए आठ-दस दिन के पैकेज टूर भी चला रहे हैं। गर्मियों का सीजन शुरू होने के साथ ही हिमालय क्षेत्र की नदियों में मत्स्य -क्रीड़ा के शौकीनों की हलचल दिखाई देने लगती है। देश के कई भागों से मछलियों को पकड़ने के रोमांचक खेल में रुचि रखने वाले लोग प्रकृति की गोद में बैठ कर साफ पानी में मछलियों की गतिविधियों के बीच अपनी इच्छा के अनुरूप मछलियों को पकड़ने की चुनौती से निबटने के लिए पहुंचते हैं। सुनहरी महासीर और ट्राउट मछलियों को अपने काँटे में फँसाने व कब्जे में करने के रोमांचक खेल में उनके कई घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चलता। कई स्थानीय लोग भी अपने भोजन के लिए मछलियाँ पकड़ने में व्यस्त देखे जा सकते हैं। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र में ठंडे पानी में रहने वाली मछलियों के खास ठिकानों तक पहुँचने के लिए टूर आयोजकों या स्थानीय लोगों की मदद लेना एक आवश्यकता बन जाता है।
ट्राउट मछली के शिकार करने के लिए जम्मू-कश्मीर की बर्फानी नदियों, हिमाचल प्रदेश में सतलुज और ब्यास के ऊपरी हिस्सों, उत्तराखंड की पिंडर व भागीरथी आदि नदियाँ और पूर्वात्तर की कुछ झीलें प्रमुख आकर्षण हैं। हिमालय क्षेत्र की नदियों में ब्यास और इसकी सहायक नदियों व हिमाचल प्रदेश की गिरि नदी, हरियाणा के ताजेवाला और उत्तराखंड में डाक पत्थर के बीच यमुना, ऋषिकेश और टिहरी के बीच रामगंगा और इसकी सहायक नदियाँ और काली, सरयू, पूर्वी एवं पश्चिमी रामगंगा, पूर्वी एवं पश्चिमी नयार, सौंग और कोसी, जम्मू-कश्मीर में चेनाब और सहायक नदियाँ, तावी इखनी नाला तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र में जिया भोरेली, दिबांग, सुबांसिनी और मानस नदियाँ महासीर की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा कुमाऊँ के तालाबों- भीमताल, नौकुचियाताल, खुर्पाताल, नल दमयंती ताल और सात ताल में पर्याप्त संख्या में महासीर हैं।
भारत में मत्स्य-क्रीड़ा के लिए सबसे अच्छा समय अक्तूबर से नवम्बर का और फिर फरवरी के मध्य से मई तक होता है जबकि नदियाँ हर तरह की मछलियों से भरी-पूरी रहती हैं। मछली पकड़ने वालों की सबसे पहली पसंद महासीर का शिकार करने में होती है जो कि अच्छे-भले मछली मारों के पसीने छुटा देती है। दक्षिण भारत में मत्स्य-क्रीड़ा के लिए अप्रैल से सितम्बर का समय उपयुक्त है। विभिन्न प्रकार की मछलियों के प्रजनन काल की जानकारी होना आवश्यक है क्योंकि इस काल में मछली मारने की अनुमति नहीं होती। हिमालय क्षेत्र में दिसम्बर से मार्च के बीच बेहद ठंड होने के कारण मौसम ठीक नहीं कहा जा सकता है। उत्तरकाशी में डोडीताल में प्रायः हर मौसम में मछली पकड़ना संभव होता है। विकल्प के तौर पर ऋषिकेश क्षेत्र, जिम कार्बेट पार्क क्षेत्र में रामगंगा और शारदा नदियाँ भी हैं।
महाशीर को खतरा गैर कानूनी ढंग से व गलत तरीकों से चोरी-छिपे शिकार करने वालों से है। ये लोग बॉम्बिंग, बिजली के करंट और ब्लीचिंग पाउडर के इस्तेमाल जैसे तरीकों से बड़ी मात्रा में मछलियाँ मार कर ले जाते हैं। यहाँ अधिक संख्या में परमिट जारी कर पर्यटकों को आकर्षित किया जाना चाहिए, ताकि घातक तरीकों से महाशीर के शिकार की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
कई राज्यों के मात्स्यकी विभागों ने मछली पालन और उनके प्रजनन को बढ़ावा देने के उपाय किये हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने इस दिशा में उल्लेखनीय काम किये हैं। तेजी से घटती मत्स्य संपदा के संरक्षण के बारे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) तथा इसकी मत्स्य अनुसंधान संस्थाएँ सजग हैं। वे अपने मत्स्य प्रजनन केन्द्रों में इन मछलियों की वंशवृद्धि के बारे में अनुसंधान व उपाय खोजने में संलग्न हैं। सम्बद्ध राज्य सरकारों के सहयोग से ट्राउट और महासीर के वंश विस्तार के लिए बीज तैयार करने को प्राथमिकता दी जा रही है। शीत जल मात्स्यकी निदेशालय भीमताल द्वारा ट्राउट और महाशीर मछलियों के बीज तैयार किये जा रहे हैं।
महाराज आपने एन्ग्लिंग को मछली मारने का खेल बता कर हद ही कर दी. पपनै जी के लेख में कहीं एन्ग्लिंग का मतलब मछली पकड़ना नहीं बताया गया है. आपने हैड लाइन में न जाने कहाँ से एन्ग्लिंग को मछली मारने का खेल बता दिया. महाराज जी उत्तराखंड में अधिकांश जगह मछली मारना अपराध है. इसके किये वन्य जीवन संरक्षण कानून के तहत सजा हो सकती है. लेकिन एन्ग्लिंग अपराध नहीं है. एन्ग्लिंग के शौक़ीन मछलियाँ पकड़ कर उन्हें फिर से नदी या तालाब में छोड़ देते हैं. आपका शीर्षक भ्रामक है. इससे क़ानून से अनभिज्ञ लोगों को एन्ग्लिंग का परमिट लेकर मछली मरने पर सजा भुगतनी पड़ सकती है. नैनीताल समाचार शुरू से ही पर्यावरण संरक्षण का समर्थक रहा है. कृपया भूलसुधार कर पाठकों की गलतफहमी दूर कर दें.