उत्तराखंड में लंबे समय से वन्य प्राणियों और आबादी के मध्य ‘भूख’ मिटाने की लड़ाई चल रही है। आबादी के साथ ही गुलदार को भी इसकी कीमत अपनी जान चुकाकर देनी पड़ रही है। गुलदार, बाघ, हाथी, सुअर जैसे जंगली जानवरों का कहर यहाँ की आबादी पर टूट रहा है। शेही, बंदर जैसे कई जंगली जंतुओं ने ग्रामीणों की फसल चौपट कर उसकी आजीविका का भी ताना-बाना बिगाड़ा है।
जंगलों में विचरने वाला गुलदार बाघ व हाथी मानव बस्तियों तक पहुँच कर महिलाओं, बच्चों व मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं। घात लगाकर हमला करने वाले गुलदार ने तो ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की नाक में दम कर रखा है। आदमखोर होते गुलदार का आतंक बढ़ते जा रहा है। रामनगर के गर्जिया निवासी 55 वर्षीय महिला शांति देवी को बाघिन ने उस समय अपनी चपेट में ले लिया जब वह जंगल में चारा जुटाने के लिए गई थी। यह गुलदार लोगों को न सिर्फ जंगल में बल्कि घर के आंगन में पहुँचकर अपना शिकार बना रहा है। गर्जिया की इस घटना के बाद वन विभाग ने ग्रामीणों के जंगल में जाने पर रोक लगा दी। गाँव में मवेशियों के लिए चारे का संकट पैदा हो गया। लोग चारे के अभाव में अपने मवेशियों को औने-पौने दामों में बेचने को विवश हो गए। वर्ष 2000 से लेकर अब तक विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में 317 लोग अपनी जान गँवा बैठे हैं। 824 लोग घायल हुए हैं। गुलदार के हमले में जहाँ 204 लोगों ने अपनी जान गँवाई तो 363 घायल हुए। वहीं हाथी के हमले में 85 लोगों को जान गँवानी पड़ी तो 63 घायल हुए। भालू के हमले में 15 लोग मरे, 374 घायल हुए। जंगली सुअर के हमले में 2 लोग मरे, 05 घायल हुए। बाघ के हमले में 15 लोगों ने अपनी जान गँवाई, 19 लोग घायल हुए। यह सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गुलदार के आबादी में घुस जाने से लोग इतने तंग आ चुके हैं कि बीते रोज लैंसडौन के पास ग्रामीणों ने वन कर्मियों से पिंजरा छीनकर कैद मादा गुलदार को कैरोसिन का तेल छिड़कर जिंदा जला डाला। वन्य जीवों के प्रति मनुष्य का यह आक्रोश व वन्य जीवों का आबादी पर हमले की घटनाएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं।
सवाल है कि जंगल में रहने वाले जानवर अचानक आदमखोर कैसे बन बैठे हैं विशेषकर बाघ व गुलदार। गुलदार व बाघ के हमलों में महिलाओं व बच्चों की संख्या अधिक है। आज उत्तराखंड में शायद ही ऐसा कोई जिला हो जहाँ पर आदमखोर गुलदार का आतंक न हो। सभी जनपदों के ग्रामीण इलाके गुलदारों के आतंक से भयभीत हैं। गुलदारों का आदमखोर बनकर मानव बस्तियों में पहुँच जाना और आदमी व मवेशियों को अपना शिकार बनाना तो एक बड़ा सवाल है ही, वहीं राज्य में लगातार वन्य जीव-जंतुओं को मौत के घाट उतारना उससे भी बड़ा सवाल। जंगलों में असुरक्षा के चलते ही गुलदार व अन्य वन्य जीव-जंतुओं ने मानव बस्तियों की ओर हिंसक होकर रुख किया है। पिछले एक दशक में 90 के आस-पास गुलदारों को वन विभाग आदमखोर घोषित कर चुका है। इनमें से कई गुलदार पकड़े गए हैं तो कई को वन विभाग मौत के घाट उतार चुका है।
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में हालत यह हैं कि न तो आम आदमी का जीवन सुरक्षित है और न ही उसकी खेती। एक ओर गुलदार ग्रामीणों का जीवन लीलने में लगा है तो दूसरी ओर उनकी खेती को बन्दर, लंगूर, शेही और जंगली शुअर बर्बाद करने में लगे हैं। इन दोनों स्थितियों से निपटने में ग्रामीण खुद को असहाय पा रहे हैं। गुलदारों को वह मार नहीं सकते क्योंकि वन कानूनों के तहत गुलदार को मारने पर सात साल की कैद की सजा का प्रावधान है। ग्रामीणों की एकमात्र उम्मीद वन विभाग से लगी रहती है। सरकार और वन विभाग को भी मालूम है कि गुलदार, तेंदुआ और बाघ जिसे स्थानीय जनता इन्हीं तीन नामों से जानती है आसानी से मानव और उनके पशुओं को अपना शिकार बना रहा है। ग्रामीणों में दशहत है और उनकी दिनचर्या प्रभावित हो रही है। लोगों की दिक्कत यह है कि वे अपने छोटे बच्चों की रखवाली करें या अपने काम पर जायें। हालत यह है कि कई स्थानों पर लोग आदमखोर गुलदार के डर से शाम ढलते ही घरों के अंदर दुबकने को मजबूर हैं। राज्य में बहुतायत संख्या में लोग वन्य जीवों के हमलों में हताहत होते हैं।
आदमखोर द्वारा शिकार बनाये गये लोगों के परिजनों को शासन की ओर से वयस्क व अवयस्कों की मृत्यु पर दी जाने वाली अनुग्रह राशि पर भी लोगों द्वारा समय-समय पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। हालांकि अब शासन ने अनुग्रह धनराशि की नई दरें तय कर दी है। लेकिन ऐसे मामलों के निस्तारण में वन विभाग व सरकार की संवेदनशीलता पर लोग अब भी सवाल खड़े करते दिखाई देते हैं।
गुलदारों का लगातार मानव बस्तियों की ओर आने का कारण घटते वन क्षेत्रों को माना जा रहा है लेकिन उत्तराखंड में यह तर्क कुछ मायने नहीं रखता है। आज भी राज्य में 65 प्रतिशत भू-भाग पर वन हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि तस्करों द्वारा गुलदार के अवैध शिकार के साथ ही जंगलों में लगने वाली आग, विकास के नाम पर हो रहे विस्फोट, जंगल में घटते आहार व पानी के स्रोतों के लुप्त होने के चलते जंगली जानवरों ने मानव बस्तियों की ओर रुख किया है। एक ओर जहाँ आम आदमी के सामने यह सवाल मुँह बाये खड़ा है कि आदमखोर गुलदार से कैसे बचा जाय तो वहीं वन्य जीव भी आए दिन प्राकृतिक, दुर्घटनाओं व अवैध शिकार के कारण अपनी जान गँवाने को विवश हैं।
प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) श्रीकांत चंदोला ने जानकारी देते हुए बताया कि उत्तराखंड के 14 हजार गाँव वन सीमाओं के निकट बसे हैं। एक तरह से मानव व वन्य जीव लंबे समय से बगैर संघर्ष के साथ रहते आए हैं। लेकिन बीते एक दशक से दोनों के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति बन गयी है। वर्ष 2000 से अब तक 815 वन्य जीवों की मृत्यु हुई है। जिसमें 54 बाघ (टाइगर), 566 गुलदार (लैपर्ड), 195 हाथी शामिल हैं। सर्वाधिक 55 गुलदार (लैपर्ड) व 15 हाथी अवैध शिकार की वजह से मरे हैं।
चंदोला कहते हैं, मानव वन्य जीव संघर्ष की समस्या को देखते हुए पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार व मैदानी क्षेत्रों में ट्रांजिट रेसक्यू सेन्टर की स्थापना, अवैध शिकार व वन्य जीव अपराधियों को पकड़ने के लिए डाग स्क्वायड की व्यवस्था के साथ ही रैपिड एक्शन फोर्स व हाईव पेट्रोल की स्थापना भी की गई है। वह बताते हैं, संरक्षित क्षेत्रों में इको विकास समितियाँ भी गठित की गई हैं। अवैध शिकार व वन्य जीव अंगों की तस्करी पर रोक के बाद भी वन्य जीव मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। 200 बाघ, 2365 गुलदार व 1346 हाथी भी वन तस्करों के निशाने में हैं। वन्य जीवों का यही गुस्सा अब मानव आबादी पर टूटने लगा है। आज सवाल वन्य जीवों के हिंसक हमले से आबादी को बचाने का ही नहीं बल्कि इन वन्य जीवों की सुरक्षा का भी है।