भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार से समर्थन वापसी के लगभग सात महीने बाद हुए उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के 32वें वार्षिक अधिवेशन पर सभी की निगाहें थीं। वह इसलिए कि इस अधिवेशन से ही इस बात का राजनैतिक संदेश निकलना था कि उक्रांद किस तरह के तेवरों, मुद्दों और सवालों के साथ विधानसभा चुनाव में जाएगा। वार्षिक अधिवेशन में पार्टी के सभी पदाधिकारियों, कार्यसमिति, कार्यकारिणी के सदस्यों, सभी जिलाध्यक्षों, सभी प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों और सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को शामिल होना था। विधानसभा चुनाव से पहले इन सभी के एकत्र होने का यह अंतिम अवसर था।
अधिवेशन में उक्रांद अध्यक्ष के सभी मुद्दों को छूते हुए दिए गए तीखे भाषण और अधिवेशन की समाप्ति पर पारित किए राजनैतिक और दूसरे प्रस्तावों को देखकर यह कहा जा सकता है कि जनता का खोया विश्वास प्राप्त करने के लिए उक्रांद एक बार फिर से अपने पुराने तेवरों और मुद्दों पर लौटने का मन बना चुका है। विधानसभा चुनाव में लगभग 6 महीने का समय ही शेष बचा है। इन छः महीनों में यदि उक्रांद ने अपने तेवरों की धार पैनी और नुकीली की तो भाजपा-कांग्रेस के विजय अभियान के आगे उक्रांद आ जाय तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे राजनीति की बिसात पर, वह भी चुनाव की, किसी भी तरह की भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं होता, लेकिन भाजपा सरकार से समर्थन वापसी के लगभग सात महीनों में उक्रांद ने एक बार फिर से राजनीति के गलियारों में अपनी जगह बनाई है। उससे भाजपा-कांग्रेस के रणनीतिज्ञ परेशान तो अवश्य हैं। इसका कारण है कि उक्रांद ही एक ऐसा दल है जो दोनों ही पार्टियों को राजनैतिक कठघरे में खड़ा करने में जुट गया है। उत्तराखण्ड के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े अनेक सवाल हैं जिनके जवाब भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास नहीं हैं। दोनों ही दल इन सरोकारों से जुड़े सवालों को हमेशा राजनैतिक छल-कपट से दूर ही रखते आए हैं।
24 जुलाई को वार्षिक अधिवेशन में उद्घाटन भाषण देते हुए उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार ने कहा कि राज्य के जिस सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक विकास की अवधारणा को लेकर राज्य की लड़ाई लड़ी गयी थी, वह सब सत्ता में बैठे लोगों की राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में आज पूरी तरह से दम तोड़ रही है। उन्होंने आरोप लगाया राज्य के आर्थिक विकास के नाम पर लगाए गए औद्योगिक आस्थानों में युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है, बल्कि उन्हें बन्धुआ मजदूर बनाया जा रहा है। उन्होंने हाल ही में घोषित पुनर्वास नीति को एक घिनौना मजाक बताया। उक्रांद के संरक्षक काशी सिंह ऐरी ने कहा कि जब हमने देखा कि सत्ता में थोड़ी भागीदारी से हम जनसरोकारों से जुड़े सवालों के जवाब नहीं तलाश पा रहे हैं तो हमने सत्ता में भागीदारी छोड़ दी। उक्रांद विधानमंडल दल के नेता पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि चुनाव में जाने से पहले हमें बाँधों जैसे कई सवालों पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी को 2007 में दिए गए राजनैतिक समर्थन के बाद यह पहला अवसर था, जब उक्रांद के नेताओं और कार्यकर्ताओ ने अपने-अपने सम्बोधन में तीखे शब्दों का प्रयोग किया। यह शायद सत्ता की चार साल तक बंधक रही पार्टी के खुली हवा में साँस लेने की तरह था। अधिवेशन में पारित किए गए दो राजनैतिक प्रस्तावों में से पहले में कहा गया है, ‘प्रदेश की भाजपा सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में पूरी तरह से असफल हो चुकी है, ऐसी सरकार को महामहिम राज्यपाल को तुरन्त बर्खास्त कर राज्य में नए चुनाव करवाने चाहिए।’ एक अन्य राजनैतिक प्रस्ताव में कहा गया है कि भाजपा-कांग्रेस ने पहाड़ी राज्य के नाम पर केन्द्र सरकार से लिए गए विशेष आर्थिक पैकेज व छूट का लाभ मैदानी जिलों को ही दिया। राज्य की जनता को मजबूत राजनैतिक विकल्प देने के लिए ही उक्रांद ने समान विचारधारा वाले दलों के साथ क्षेत्रीय मोर्चा बनाने की दिशा में कारगर पहल की है। यह क्षेत्रीय मोर्चा उत्तराखण्ड की जनता की सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बनाया जा रहा है।’ एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया है कि भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने भू कानून में बदलाव का नाटक किया। अभी भी बाहर के लोग यहाँ जमीनें ही नहीं खरीद रहे हैं बल्कि अवैध रूप से राजस्व व वन भूमि पर कब्जे भी कर रहे हैं।