इन दिनों समाचार पत्रों में अक्सर एक समाचार मय फोटो के देखा जाता है। समाचार में लिखा होता है कि फलाँ नेता ने जन समस्यायें सुनीं। समझ में आता है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री जन समस्यायें सुने और उन समस्याओं का निराकरण करे। यह भी समझ में आता है कि जिले, मंडल या प्रदेश का कोई सक्षम अधिकारी जन समस्यायें सुने और उन समस्याओं का हल निकाले। और यह भी समझ में आता है कि विपक्ष का कोई सक्षम नेता समस्यायें सुने और उन समस्याओं के निराकरण के लिए शासन पर दबाव बनाए ताकि समस्याओं से जूझ रहे लोगों को राहत मिले।
लेकिन इन दिनों राजनीति के दंगल में घुस आया हर लगुवा-भगुवा जन समस्याओं से रूबरू होता दिखाई दे रहा है।
कैसे हैं ये लोग जो उनके पास समस्याओं का रोना लेकर जाया करते हैं ? कैसे हैं ये समाचारों को छापने वाले, जिन्हें यही पता नहीं कि आंखिर यह जन समस्या सुनने वाला है कौन ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपना रुतबा गाँठने के लिए जन समस्याओं का रोना लेकर इकट्ठा हो रही भीड़ भी प्रायोजित होती है ? क्या किसी को अब तक लगा कि जिन समस्याओं से उन्होंने समस्याओं से रूबरू होने वाले को अवगत कराया उनका निराकरण हुआ ? शायद इसका उत्तर नहीं में होगा।
सवाल एक और भी है कि जिन लोगों के सामने समस्यायें रखी जा रही हैं क्या वे किसी दूसरे देश के हैं, जिन्हें समस्याओं का पता ही न हो ? क्या आन्दोलनों की आग में जल रहे प्रदेश में जन समस्यायें इतनी छिपी हुई हैं कि उन्हें किसी भी लगुवे-भगुवे को सुना कर हल किया जा सकता है ?
तब खबरनबीस क्यों बौरा गए हैं ऐसी खबरों के लिए ?
दरअसल ये जन समस्या सुनने वाले खुद ही समस्या हैं। जब ये खुद ही समस्या हैं, तब कैसे किसी जन समस्या का हल ढूढ पायेंगे ? इनकी समस्या है अपनी ठौर तलाशना और जन समस्या से रूबरू होना इसका सबसे अच्छा बहाना है। लोगों को लगता है कोई तो नेता किस्म का आदमी उनका रोना-धोना सुन गया और कह गया कि चिन्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। आने वाली सरकार अपनी है या सरकार आप ही के लिए तो बड़ी-बड़ी योजनायें बना रही है।
पार्टी में पैंठ बनाने का भी यह एक अच्छा तरीका है। अखबारों में बराबर छाए रहने से रुतबा भी बनता है और बड़े लीडरों की नजर भी पड़ती है। अब अखबारों में ही नहीं, बिजली और टेलीफोन के खम्भों में भी इनकी बड़ी सी तस्वीर टँगी रहती है, जैसे किसी जमाने में शातिर अपराधियों को चौराहे पर लटका दिया जाता था। अब ये तो चौराहों और उनसे गुजरने वालों की समस्या बन गए हैं।