सिक्किम में पिछले महीने आये भूकम्प से सारे हिमालयी क्षेत्र में चिन्ता बढ़ गई है। मध्य हिमालय के एक हिस्से के रूप में उत्तराखंड भी भूकम्प की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील है। प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया का कहना है,
‘‘मध्यम और बड़े भूकम्प अपने बूते पर उत्तराखंड की धरती में संचित तनाव को उस सीमा तक नहीं घटा सकते, जहाँ महा भूकम्प की सम्भावना ही न रहे। सन् 1803 के गढ़वाल भूकम्प (जिसका परिमाण 7.5 से अधिक और 7.9 से कम था) के बाद के दो सौ वर्षों में एकत्र तनाव की विपुल राशि को मध्यम प्रबलता के ये भूकम्प कम कर पाये होंगे, ऐसा नहीं लगता। उत्तराखंड की धरती में इतना अधिक तनाव एकत्र हो गया है कि उसे पूरी तरह निकालने की क्षमता केवल महा भूकम्पों में ही है। वस्तुतः वे भूकम्प ही तनाव निकाल सकते हैं, जिनकी प्रबलता रिक्टर पैमाने पर 8 से अधिक हो। भूकम्प को तो आना ही है, लेकिन कब आना है यह अनिश्चित है। इसलिये भूकम्प से बचने की तैयारी हमेशा रहनी चाहिये।’’
प्रो. वल्दिया आगे कहते हैं,
‘‘इतिहास में जितना कुछ ज्ञात हुआ है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि मध्यवर्ती हिमालय में महाभूकम्प अन्तिम बार सन् 1505 में आया था और उसके बाद सबसे प्रचण्ड भूकम्प सन् 1803 में गढ़वाल में आया था। अधिकांश भूकम्प 5 या इससे अधिक के थे। सन् 1816 (तीव्रता 6.8), 1916 (6.5), 1945 (6.5), 1964 (6.2), 1968 (7.0), 1979 (6.5), 1980 (6.5), 1991 (6.6) तथा 1999 में 6.8 तीव्रता के भूकम्प आये। जब भूकम्प उठते हैं तब उथल-पुथल केवल उसी दरार तक सीमित नहीं रहती, जहाँ से वह पैदा हुआ हो, वरन् उन दरारों पर भी कमाबेश हलचल होती है, जो भूकंपमूलक भ्रंश से सम्बन्धित हैं। उत्तराखण्ड की धरती अगणित भ्रंशों से विदीर्ण है, कटी-फटी है। इनमें से अतीतकाल से ही सक्रियता रही है। उन पर बड़े पैमाने पर धरती धँसी थी, उभरी थी, खिसकी थी, सरकी थी। यदि फिर कभी महाभूकम्प आ गया तो सभी दरारें सक्रिय हो जायेंगी। कुमाऊँ में आये भूकंप के इतिहास पर नजर डालें तो लोहाघाट में 2 जुलाई 1832 में रिक्टर पैमाने पर 6 तीव्रता का भूकंप आया था। यहीं पर 30 मई 1833 को व 14 मई 1835 को भी लोहाघाट भूकंप के झटके से हिल गया था। धारचूला में 28 अक्टूबर 1916 को, 05 मार्च 1935 को, 28 सितम्बर 1958 को, 27 जून 1966 को व 24 अगस्त 1968 को आये भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी। इसकी तीव्रता 7.5 के लगभग थी। याद रहे मेन सेंट्रल थ्रस्ट भारत-नेपाल सीमा के पास धारचूला से कश्मीर तक अपना प्रभाव रखती है।’’
प्रो. वल्दिया का यह भी कहना है,
‘‘विकास के नाम पर जो कार्य हुए उनको व्यावहारिक रूप देने में प्रकृति के साथ सबसे अधिक छेड़छाड़ हुई है।’’
यह हमारी विकास नीति की कटु सच्चाई है। उत्तराखंड में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल भूकम्प की दृष्टि से जोन 5 में आते हैं, जबकि नैनीताल, चम्पावत, उधमसिंह नगर, पौड़ी गढ़वाल, देहरादून, उत्तरकाशी और हरिद्वार जोन 4 में आते हैं। 1962 में जब भारत चीन के बीच सीमायुद्ध हुआ तो भूकम्प की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील इन्हीं क्षेत्रों में सैकड़ों किमी सड़कें बगैर पर्यावरण को ध्यान में रख कर बना दी गईं। चट्टानों को ही नहीं, पेड़ों को भी डाइनमाइट से उड़ा दिया गया, बगैर इस बात को ध्यान में रखे कि भविष्य में इसके कितने खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। याद रहे 1978 में भागीरथी व काली नदी क्षेत्र में जबर्दस्त तबाही मची थी। आज भी इन क्षेत्रों में हर बरसात में तबाही होती है। आये दिन भूस्खलन की खबरें आती रहती हैं। पिछले वर्ष भूस्खलन से 200 सड़कें महीनों तक बंद रहीं। अल्मोड़ा शहर के पास देवली व बाड़ी गाँव पूरे तबाह हो गये और 23 लोगों को जानें गँवानी पड़ीं। कपकोट में जल विद्युत
परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग के नजदीक के एक स्कूल में भूस्खलन से 18 बच्चे काल के ग्रास बन गये। 1991 के उत्तरकाशी 6.6 तीव्रता के भूकम्प में 1500 लोग मारे गये थे। सबसे अधिक, 71 लोग गंगोत्री मोटर मार्ग पर मनेरी जल विद्युत परियोजना के बैराज को पार करने के बाद लगभग पाँच सौ मीटर की ऊँचाई पर भूमि के समतल हिस्से में बसे जामक गाँव में मारे गये थे। यह हानि सुरंग के समीप व सीमेन्ट के मकान होने के कारण हुआ। जामक के बाद गवाँणा, नैताला, रथैल, छीना व सैज गाँवों में ज्यादा तबाही हुई। ये सारे गाँव सड़क के किनारे थे और मनेरी भाली परियोजना का सीमेन्ट आराम से मिल जाने के कारण आर.सी.सी. की अधकचरी तकनीक से बने हुए थे। इसके आठ साल बाद, 1999 में चमोली में आया भूकम्प 6.8 तीव्रता का होने के बावजूद इसमें जान-माल की हानि अपेक्षाकृत कम हुई। हालाँकि 200 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में किसी जल विद्युत परियोजना का न बनना तथा सीमेंट के लेंटर के मकानों का कम होना यहाँ कम नुकसान का कारण रहा। अभी उत्तरी सिक्किम में आये भूकम्प में सर्वाधिक हानि चुगथंग के पास बन रहे तीस्ता हाइडिल प्रोजेक्ट के आसपास के गाँवों में हुई है। तथाकथित विकास इस क्षेत्र में तबाही का मुख्य कारण रहा।
भूकम्प तो आयेंगे ही, उनसे बचा नहीं जा सकता। लेकिन हमारी तैयारी ऐसी होनी चाहिये कि भूकम्प से नुकसान नहीं के बराबर हो। अभी तो हालात ऐसे हैं कि देश की राजधानी दिल्ली भी भूकंप से सुरक्षित नहीं है। विशेषज्ञों पर विश्वास करें दिल्ली के लगभग 33 लाख 80 हजार मकानों में से सिर्फ 2 प्रतिशत मकान बड़े भूकंप सहने की स्थिति में हैं। अगर कभी जोर का भूकंप आ गया तो दिल्ली का क्या होगा ? दरअसल हानि भूकंप से नहीं होती गलत विकास और सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से होती है।