मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ कि हम इस गणतंत्र के लायक नहीं हैं या यह गणतंत्र हमारे लायक नहीं रह गया है। गणतंत्र-लोकतंत्र की जो परिभाषा हमने पढ़ी है वह बेमानी लगने लगी है। नई परिभाषा बनाने की जरूरत है। तंत्र और लोक का रिश्ता भेड़िये और मेमने का है जो मेमने को धमका रहा है कि तूने नहीं तो तेरे दादा बाप-दादा ने गाली दी है और तुझे इसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा। 60 वर्षों के विकासवाद ने ऐसी कौन सी हवा चला दी है लोक से निकला बच्चा तंत्र का हिस्सा बनते ही लोक को हेय तथा तुच्छ समझ कर गुर्राने लगता है ?
हमने इस कथित विकास की जो कीमत चुकाई है और जो कीमत दे रहे हैं वह अंततः भस्मासुर ही साबित होने जा रही है और हम इस तथ्य को न जानते हों, ऐसा नहीं है। लेकिन हम अपने पैर पीछे हटाने को तैयार नहीं हैं ताकि हमारा थोड़ा सा त्याग आने वाली पीढ़ियों को थोड़ा सा सकून दे सके और पृथ्वी पर जीवन थोड़ा और लम्बा हो जाये।
जिस तेजी से हम प्रकृति के साधनों को खाते जा रहे उस की भरपाई के लिये आज वैश्वीकरण का नारा लग रहा है जो हमें अच्छा भी लगता है। लेकिन हमारे ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सोच के सामने यह बहुत उथला है। जब भारतीय संदर्भ में सारी पृथ्वी को एक परिवार माना है तो उसका सोच है कि ‘जिओ और जीने दो’। आज का ग्लोबलाइजेशन मानता है कि हमारे पास जो फालतू है उसे दूसरे को दे दो और उसका अच्छा रख डालो। इसके लिये सारे साम, दाम, दंड भेद जायज़ हैं। लोक कल्याणकारी सरकार की अवधारणा अब एक मिथ बन गई है। अब हमें थोड़ी बेहतर ढंग की कम्पनी के राज में रहने के तरीके सीखने होंगे। ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ अब सरकार हो गई है। इससे मुक्ति पाने के लिये एक और ‘आजादी बचाओ’ का संघर्ष करना होगा। हमारा पानी, जंगल, मिट्टी, फसल, भूख, भोजन हमारे हाथ से निकलता जा रहा है और हम खड़े खड़े गुबार देखते रहे हैं। भारत एक देश, एक राष्ट्र के बजाय एक बाजार बन गया है और बाज़ार के नियम कानून, देश/राष्ट्र के नियम कानूनों से अलग होते हैं। भारत में एक महाशक्ति का भविष्य आंका जा रहा है। लेकिन एक बाज़ार के स्तर पर ही विकास का मापक क्या सिर्फ अरबपतियों, खरबपतियों की संख्या है ? यदि विकास सचमुच हो रहा है तो गरीबी रेखा के नीचे लोग क्यों बढ़ रहे हैं। जो बेरोजगार हैं वे कर्जदार बेरोजगार क्यों हो रहे हैं। एक तरफ बेरोजगारों का प्रतिशत बढ़ रहा है दूसरी ओर नौकरियों के लायक प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं। यह विरोधाभास कैसे खत्म होगा ?
इन विसंगतियों ने ग्लोबल होते आदमी को जितना अकेला, स्वार्थी, असहिष्णु, असुरक्षित बना दिया है उसकी तार्किक परिणति एक बेहतर समाज के निर्माण में संभव नहीं हैं। वह तंत्र पर अधिक आश्रित हो रहा है। उसकी लड़ाई सुविधायें जुटाने/मांगने तक सीमित होती जा रही हैं। अपनी संस्कृति, परम्परा की दुहाई देने वाले किस तरह से असांस्कृतिक काम कर रहे हैं और उनका विरोध कितना सूक्ष्म है यह हम देख ही रहे हैं।
विनाश में बदलती इस विकासवादी सोच को बदलने के सभी कारक हमारे इतिहास, परम्परा व संस्कृति में समाहित हैं उनको आज के संदर्भ में व्याख्यायित करने व उपचार के लिये धरातल पर उतारना नितांत आवश्यक है। गांधी इस प्रयोग को सफलता पूर्वक कर चुके हैं और आज विश्व की निगाहें उन पर ही है।
हमारा आज का संकल्प और छोटे-छोटे प्रयास शायद गणतंत्र को एक नई परिभाषा दे सकें और मेमनों की संघ शक्ति से भेड़िया मारा जाये।