कभी कोई आता है तो लगता है, हाँ ! कोई आ रहा है।
जब वह प्रोफेसर डॉ. प्रकाश उपाध्याय के साथ आते दिखे तो लगा ’कोई आ रहा है’। गोरा, खूबसूरत चेहरा, तन्दुरुस्त, लहीम शहीम शरीर …….कुछ मोटापा लिये। कोई अजनबीपन नहीं। हमें इस तरह देखते वह आ रहे थे जैसे वर्षों से देख रहे हों। ठंड से सिकुड़ते, एक साल ओढ़े, बिना किसी सम्बोधन के होटल में खाना खाने बुलाये, उपस्थित मेहमानों को देख कर बोले-ये पहाड़ में चढ़ाई क्यों होती है ? मैंने कहा- बहुत बड़ा सवाल है…। वैसे पहाड़, पहाड़ इसीलिए हैं क्योंकि वहाँ चढ़ाई है और उतार भी। उन्होंने एक भाव से स्पर्श दिया। यह मान्यवर थे- अर्जुन रैना। नैनीताल समाचार के रिंक हाल के समारोह में आये थे। बातों-बातों में पता चला इस शख्स का अपना कला साम्राज्य है। कथकली के साधक, नाटकों के कलाकार रूप में वह सारे भारत, विदेश में सैकड़ों प्रदर्शन अपनी कला का कर चुके हैं। बातों ही बातों में तय हुआ, दूसरे दिन साढ़े दस बजे दिन में वह मुझे साक्षात्कार देंगे।
दूसरे दिन लिया यह साक्षात्कार अनौपचारिक और सहज रूप में कुछ इस प्रकार सामने आया –
अर्जुन रैना कश्मीरी हैं। दादा, लाहौर के निवासी थे। पूर्वज रणजीत सिंह के दीवान थे। विभाजन में अपनी 600 एकड़ जमीन छोड़ कर भारत आ गये। यहाँ भी ठसक से अपने को स्थापित किया। वर्तमान में गुड़गाँव में हैं। अर्जुन रैना काल सेंटर में साउंड टीचर रहे तो एन.एस.डी. में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। पिता, 69 से 76 तक अंडर ग्राउंड नक्सल भी रहे। फिर माओवाद में जो विचारात्मक परिवर्तन हुआ उससे यह मामला उन्हें रास नहीं आया, इसलिए वापस आ गये। अर्जुन कहते हैं- पन्द्रह साल तक तो नाटक भी नहीं देखा था। कोई माहौल न था। बचपन बिना नाटक के गुजारा। पन्द्रह साल में एक नाटक देखा तो लगा- अरे मैं तो ये हूँ। ये तो मेरी ही दुनिया है। नाटक शायद बर्नाड शा का ’सेंट जॉन’ था। फिर तो कला और अर्जुन गहरे दोस्त हो गये। बहुत कुछ इधर-उधर से देखने की कोशिश की। जिसे सीखना कहते हैं वह जिंदगी की किताब से ही सीखा। हर बालक के मन में कला उपस्थित तो होती है। माहौल मिलने से कला की समझ धीरे- धीरे अच्छी हो गयी। लंदन से आगे पढ़ने के लिए वजीफा भी मिला। 1987 से 1990 तक पढ़ा और 1990 से 1996 तक पढ़ाया। इस दौरान उन्होंने क्लासिकल और कॉण्टम्परेरी कलाकारों को ले कर पुरानी दिल्ली में एक्सपेरीमेंटल थियेटर का स्टेज जमाया। 96 के बाद आपने इस हुनर को आस्ट्रेलिया, यूके, जर्मनी, रसिया, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जापान में दर्शाया। 2002 में कथकली और शेक्सपियर पर आधारित ’द मैजिक आवर परफॉर्मेंस’ ने कला प्रेमियों को अपनी ओर खींचा। एक साल बाद भारत में इंटरनेशनल कॉल सेंटर पर ’अ टेरिबल ब्यूटी इज बॉर्न’ पर काम किया। 2009 में उनके नाटक ’द स्नेक्स शेड्स इटस स्किन’ ने भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। जर्मन, हिंदी और अंग्रेजी में मंचों पर उतरा ये नाटक ऑस्ट्रिया में बसे तीन भारतीय प्रवासियों की कहानी है। इस नाटक ने तिरुवनंतपुर में नेशनल थिएटर फेस्टिवल और दिल्ली में भारत महोत्सव में तारीफें बटोरीं।
पर एक्टिंग का मजा तो कथकली से ही आया। आर्ट भाव है और भाव प्रदर्शन पूरी तरह से कथकली में हैं। कभी इस कला का नाम भी नहीं सुना, पर ऐसा संयोग बना कि सोलह साल की साधना इसी में की। दस साल गुरु रहे सदानाम बालाकृष्णन और बाद में छः साल तक राजेन्द्र पिल्लै। वह कहते हैं- मानव सम्बधों का आधार ही भाव है। भाव का खेल ताकत बनाता है। यही कला है। आधुनिक जिंदगी में भाव खो जाता है। अपनी लाइफ फिलासाफी के बारे में कहते हैं- मेहनत करो। दिहाड़ी और पूंजी के बीच सिम्पल इक्वेशन है। जीना है तो दिहाड़ी से चलो। टैक्स उस चीज का दो जो तुम्हें सोसाइटी दे रही है।
उन्होंने सोलो प्ले भी किये हैं। वह कहते हैं कथकली में महाभारत की गाथायें ही नहीं, पाश्चात्य और मुस्लिम गाथायें भी अभिनीत की जाती हैं। यह पूरी तरह सेक्यूलर है। शेक्सपियर के ’एथोलो मिड समर्स नाइट ड्रीम्स’ पर भी काम किया। शेक्सपियर की स्टाइल और केरल की लोककथाओं का कॉकटेल उन्होंने मनभावन बनाया। इन दो विधाओं का अर्जुन रैना ने अदभुत कौशल से समन्वय किया। एक अलग स्टाइल दी। उन्होंने फिल्में भी की हैं। अरुंधती राय की कहानी पर भी फिल्म बनायी है। ’ऐनी गिब्स इट दोज वंस’ में उन्होंने मुख्य किरदार ऐनी की भूमिका की है। ’सांझ’ फिल्म पर भी काम किया है। यह फिल्म आस्कर के लिए बैस्ट स्टूडेंट फिल्म के रूप में मनोनीत हुई थी। ’टेरेबल ब्यूटी इन फार्म’ ’एक सुनहरी दुपहर’ फिल्मों में भी काम किया।
उन्होंने गाँव-गाँव जा कर लायब्रेरी भी स्थापित की। वह कहते हैं- पर अब पढ़ने पाँच मिनट कोई बैठता नहीं। टीवी पर घंटों बैठा लो। टीवी भले ही इडियट बाक्स हो पर उसने भी सामाजिक
सरोकारों को लिया है। कला कहीं से हो, वह आनी चाहिए। उसने कला की अन्य विधाओं को खत्म नहीं किया, रिप्लेस किया हैं। चीजें हमेशा बदलती हैं। हिंदुस्तान की हकीकत भी बदल रही है। एक मार्क्स से ही दुनिया नहीं बदली जा सकती। यद्यपि वह एक सबसे बड़े फैक्टर को सामने लाया। अपने विवाह के सम्बध में कहते हैं- विवाह जैसा तो कुछ नहीं किया है, पर पन्द्रह साल से मैं और मोहनी एक साथ रहते हैं। मोहनी भी कथकली की ही कलाकार है। उनका एक लड़का भी है।
उन्होंने अपनी कला के सैकड़ों प्रदर्शन किये हैं। वह कहते हैं- रिश्ते तो नाटक से बनते हैं। वह नाटक लिखते हैं। सामान्य घटनाओं और रिश्तों पर वह नाटक लिखते हैं। नाटक उनके छपे नहीं, पर प्रदर्शित हुए हैं। वह सहज हैं। जो भी है, उनके चेहरे और भाव से प्रगट होता है। उन्हें देख कर एहसास होता है, नाच उनके अंदर है।
नैनीताल में जब वह रिंक हाल में अपना प्रदर्शन करने के लिए दर्शकों के बीच से प्रकट हुए तो उन्होंने अपनी आवाज और भाव से दर्शकों को सम्मोहित कर लिया। दर्शकों को लगा कि यह अपने से ही निकला नाच है। दर्शकों से उन्होंने पूछा भी- कुछ भाव बतायें, वह उसे नृत्य से प्रगट करेंगे। लोगों ने भाव बतलाये तो उन्होंने तुरंत उन्हें अपने नृत्य भाव से प्रगट भी किया। उनके भाव प्रदर्शन से दर्शकों ने (जो बहुत लम्बे बौद्धिक चर्चाओं से ऊबे हुए थे) मुग्ध हो कर कहा- अरे ये बड़ा जोरदार रहा। सबने देखा कि अर्जुन रैना की भाव क्षमता में जादू है। वह जादू करते हैं, दर्शकों से सहज में जुड़ते हुए उन्हें भाव के चरम में ले जाकर वापस उनके संसार में ले आते हैं। उनकी हर मुद्रा चाहे वह पताका मुद्रा हो या फिर कोई अन्य, वह उनके आँख, नाक, कान और सारे शरीर से बोलती है और रस से भरी रहती है। भीम द्वारा दुःशासन का खून पीने का दृश्य जब समाप्त हुआ तो दर्शकों को लगा, काश यह यों ही और चलता रहता। वह भावों से सबको नचाते से लगे। उनका नाच आभास दिलाता है एक अन्तर्दृष्टि का। नाच तो भाव का, रस का भरपूर प्रदर्शन है। अंदर जिसके नाच है, वही नाच सकता है हर रस में, हर अंदाज में। रस की खोज ही जीवन है। जरूरत सम को पकड़ने की है।
अर्जुन रैना के पास बहुत लम्बा समय है अपने भावों को रखने, जीने का। जब वो नाचेंगे, सब नाचेंगे और यह सृष्टि नाचेगी।