घनश्याम विद्रोही
उत्तराखंड की भाजपा सरकार को लग रहा है कि अटल आदर्श गाँवों में चौपालें लगाकर मिशन 2012 की तैयारी पूरी हो जाएगी। मगर ऐसे गाँवों का क्या होगा जहाँ पेयजल, शिक्षा, यातायात, सिंचाई के पानी तथा बिजली जैसी समस्याओं का अंबार लगा है। मगर यह भी स्पष्ट कि जिलों में बैठे अधिकारी बिना चौपालों के ग्रामीणों की समस्याएँ सुनने वाले नहीं हैं। लेकिन इन शिविरों में उठी समस्याओं का समाधान कैसे होगा, इस पर सवाल उठने लगे हैं। विधायक तथा मंत्री समस्याओं का निदान नहीं कर पा रहे हैं, दर्जाधारी मंत्री कैसे निकालेंगे ?
बागेश्वर जिले में बहुउद्देशीय शिविरों के बाद अब चौपालों का आयोजन शुरू हुआ है। बागेश्वर ब्लाक मे ये पूरी भी कर ली गई हैं। दर्जाधारी मंत्रियों ने 16 न्याय पंचायतों में जनता की समस्याएँ सुनीं, उनके निदान के निर्देश अधिकारियों को दिए। ऐसा ही बहुउद्देशीय शिविरों में विधायक तथा मंत्री भी कर चुके हैं। विधायकों तथा मंत्रियों ने तो विधवा, विकलांग, वृद्धा तथा कन्याधन जैसे लाभार्थियों को करोड़ों रुपये के चैक भी बाँटे, लेकिन अब धन की कमी होने से दर्जाधारी मंत्री चौपालों में लाखों रुपये के चैक बाँट रहे हैं। देखने वाली बात यह है कि चौपालों में भाजपा तथा कांग्रेस समर्थित लोग एक-दूसरे को तिरछी नजर से देखते रहे। कांग्रेसियों ने तो चौपालों में हंगामा करने की रणनीति भी तय की, लेकिन छुटपुट वाद-विवाद से मामले निपटा लिए गए। जनता ने भी दर्जाधारियों को विधायक तथा मंत्रियों से अधिक तरजीह दी। उन्हें लगा कि दर्जाधारी मंत्री तो दिल्ली तथा दून से आए हैं। विधायक तथा मंत्री तो रोज गली-मोहल्ले में चक्कर काटते ही रहते हैं। हालाँकि बहुउद्देशीय शिविर तथा चौपालों के जरिए ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं की जानकारी भी मिली। जिन ग्रामीणों ने कभी बीडीओ नहीं देखा था, उन्हें डीएम के दर्शन हुए। जिन पुलिस वालों से गाँव के लोग भयभीत रहते थे, उनकी पूरी टीम नेताओं की चाटुकारी करते हुए नजर आई। जो विभागाध्यक्ष किसी ग्रामीण को मुँह नहीं लगाते थे, उनसे सीधे संवाद हुआ। ग्रामीणों ने भी अधिकारियों पर अपना गुस्सा जमकर उतारा। यहाँ सवाल उठना लाजिमी है कि यदि जिलों में भारी भरकम विभाग, विभागाध्यक्ष, डीएम तथा अनेक अधिकारियों की तैनाती के बावजूद भी जन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार को इन शिविरों और चौपालों का सहारा लेना पड़ा तो ये शिविर और चौपाल भी कितने कामयाब हो पायेंगे। अलबत्ता इससे यह जरूर साबित हुआ कि नौकरशाही को समय-समय पर एड़ लगानी जरूरी है।
चौपालों में यह भी देखने को मिला कि जल्दबाजी में दिख रहे दर्जाधारियों ने एक दिन में तीन-तीन न्याय पंचायतें निपटा दीं। कार्यालयों में गोल-गोल घूमने वाली कुर्सी में चिपके रहने वाले अधिकारी पसीना पोंछते हुए दर्जाधारियों के पीछे लगे रहे। अधिकारियों को ग्रामीणों के प्रश्नों के उत्तर यदि नहीं मिले तो दर्जाधारियों ने उनकी मदद भी की। उन्हें सब कुछ ठीक हो जाने का आश्वासन भी दिया। हालाँकि जिस अटल गाँव में चौपाल लगनी थी, वहाँ रात्रि विश्राम भी किया जाना था, लेकिन अधिकारी सब जगह खिसकने के मूड में दिखे। दर्जाधारी भी गेस्ट हाउसों की और दौड़ते दिखे। नोडल अधिकारियों को चौपालों में भोजन आदि की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी, लेकिन इसके लिए बजट कहाँ से आएगा, यह भी स्पष्ट नहीं था। इन चौपालों से पत्रकारों को भी दूर रखा गया था। जिला सूचना विभाग के हवाले से आ रही खबरों को ही अखबारों ने प्रकाशित किया। कुल मिला कर दजाधारियों के लिए पिकनिक तथा अधिकारियों के लिए मुँह छिपाने का सबब बनीं ये चौपालें।