सौल कठौल : हमार भगतदाक् स्मृति जी रौ लाख सौ बरीस
(विगत दिसम्बर में हमारा साथ छोड़ गये नन्दकिशोर भगत इस होली के लिये पहले ही अपने हिस्से का सौल कठौल लिख कर छोड़ गये।) डेमोक्रेसी के नाम पर मिले, सन् सैतालीस के बाद वाले मौलिक अधिकारों ने, उदिया की साफ सुथरी देह को समय से पहले ही बुढ़ा दिया है। जब वह एक बार बीमार [...]
एक अड्डे का पलायन
‘गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम। धुल के निकलेगी अभी चश्म ए महताब से रात . . .’ नैनीताल क्लब चौराहा, पाँगर के विशाल पेड़ों के ठीक नीचे बहते गधेरे से सटे व्यावसायिक भवन के अंदरुनी हिस्से का एक छोटा सा कमरा, जिसकी विशालकाय खिड़की से बहते नाले का स्वर रात के सुनसान [...]
सौल कठौल : हुक्काराम और बजट
इधर पिछली बार की तरह हुक्काराम जी बजट की सम्भावित घोषणाओं की चर्चा में आते ही सक्रिय हो गये हैं। कुछ लाल बत्ती जनित चिन्तायें उनके गले में फाँस की तरह अटक जाती हैं-पूछने पर वह इस अटकन को कुछ यों बया करते हैं…इधर बड़ी सरकार एक दम पराई है। लोकल सरकार तो अपनी ठैरी। [...]
सौल कठौल: सतरंगी छलड़ी कैका घर
बीसवीं सदी का आखिरी दशक लोकल कमान से लेकर हाई कमान तक हुक्काराम के संघर्ष की कहानी अब हमारे लिये कम रोचक नहीं रही। एक बार अनजाने में हमने उन्हें अनसुना कर दिया तो उन्होंने हमें विरोधी गुट वालों की सूची में शामिल कर हमारी छलड़ी कर दी। तब से हमारी मेजबानी का तरीका ही [...]
होलियारविहीन वोट का स्वांग
किसी जमाने में जब भी होली आने को होती, हम हुक्काराम जी की चौपाल में होते। वहाँ खड़ी होली, बैठ होली, लकड़ी की सींक सहित आलू के गुटके की बातें होती। तभी होलियार स्वाँग के कलाकारों की एक टीम बनती। चुने हुए लोगों की उनकी इन्तजामी व्यवस्था, चाहे वह शादी ब्याह की हो या किसी [...]
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