कानून तो हैं, पालन नहीं होता
महिला अध्यादेश पर भले ही राष्ट्रपति की मुहर लग गई हो पर इस की गारंटी नहीं है कि इससे महिलाओं पर होने वाले अपराधों पर अंकुश लग पाएगा। पूरे देश में अपराधों पर नियंत्रण लगाने के लिए 60 के आस-पास अपराध अधिनियम व नियम बने तो हैं लेकिन इनका कड़ाई से पालन नहीं हो रहा [...]
ग्रीन बोनस की अनदेखी
उत्तरांखड को उम्मीद थी कि इस बार के केन्द्रीय बजट में उसे पर्यावरण संरक्षण के एवज में अच्छी-खासी मोटी धनराशि ग्रीन बोनस के रूप में मिलेगी लेकिन झोली इस बार भी खाली रही। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है, इससे पूर्व भी वर्ष 2005 राज्य के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया था। [...]
कन्या भ्रूण हत्या में सीमान्त जिला पिथौरागढ़ भी पीछे नहीं है
अजन्मी कन्याओं को कोख में मार देने की प्रवृत्ति में जनपद पिथौरागढ़ भी पीछे नहीं है। वर्ष 2001 में जहाँ जनपद में 1000 पुरुषों पर 1031 महिलाएं थी वहीं 2011 की जनगणना में यह घटकर 1021 हो गई यानि 1000 पुरुषों पर 10 महिलाएं कम हो गई। वहीं 0-06 वर्ष के बच्चों का अनुपात जहाँ [...]
पाठशाला या पाकशाला ?
सरस्वती के मंदिर (स्कूल) शहरों में अंग्रेजी भाषा की बदौलत भले ही चल रहे हों, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के प्राथमिक विद्यालयों की हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है। शिक्षा व्यवस्था दोपहर भोजन येाजना लागू होने के बाद और बदतर हुई है। अब गुरु जी की प्राथमिकता पढ़ाने के बजाय दोपहर में बच्चों को [...]
राजस्व पुलिस के खस्ताहाल
जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ स्थित पटवारी चौकी का आवासीय भवन साढ़े छह लाख रुपए की लागत से बना बताया जाता है। मगर गर्मी हो या सर्दी, यहाँ रहना मुश्किल होता है। क्षेत्र भ्रमण के बाद जब पटवारी आते हैं व थोड़ा सुस्ता कर अपनी लिखा-पढ़ी निपटाना चाहते हैं, तो गर्मी में तपती छत व ठंड में [...]
खामिया विलुप्त हो रहा है
मुनस्यारी क्षेत्र में बाँज की तरह ही खमिया प्रजाति का एक जंगल है। इसका वानस्पतिक नाम एसर लेविगेटम है। खमिया की दो प्रजातियाँ मिलती हैं। काले रंग की पत्तियों वाली प्रजाति मवेशियों के चारे के रूप में काम में आती है। दूसरी प्रजाति के पत्ते सफेद होते हैं। खमिया का पेड़ खजूर जैसा हरा, लंबा-चौड़ा [...]
कुनल्ता स्कूल: पहाड़ की शिक्षा का आईना
उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमराने से सरकारी स्कूल उजड़ रहे हैं। गाँवों के समर्थ अभिभावक बच्चों को पढ़ाने के लिये नगरों को पलायन कर गये हैं, मगर गरीब बच्चे और कोई विकल्प न होने की मजबूरी में दाल-भात खाने अवश्य स्कूलों में हाजिरी लगा रहे हैं। बदहाल स्कूलों में बच्चों के बैठने के [...]
निर्मल पंडित को क्यों भूले ?
16 मई 1998 को उत्तराखंड के एक होनहार युवक ने ‘नशामुक्त उत्तराखंड’ के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये। उम्मीदों व संभावनाओं से भरा यह युवा नेतृत्वकारी था निर्मल कुमार जोशी उर्फ निर्मल पंडित। जनता के सवालों को लेकर हमेशा आगे रहने की आदत के चलते वह हर वर्ग में लोकप्रिय था। अपने सवालों के [...]
आखिर क्यों नहीं बुझती प्यास ?
नदियों, ग्लेशियरों और अन्य स्रोतों से पानी के लिये संपन्न माना जाने वाला उत्तराखंड आज प्यासा है। पानी की कमी ने गंभीर रूप ले लिया है। प्रदेश के पर्वतीय इलाकों के 70 प्रतिशत हिस्से के निवासियों को रोज पानी की समस्या से जूझना पड़ता है। 63 प्रमुख नगरों में से 15 को भी पर्याप्त मात्रा [...]
योजना आयोग की उस दफ्न फाइल को निकालो
वर्ष 1992 में हिमालय क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को लेकर एक समिति गठित की गई थी, जिसके अध्यक्ष योजना आयोग के सदस्य जेड. कासिम थे। अन्य सदस्य थे, जे.एन. पाटिल, जे. एस. बजाज, प्रो. हर्ष गुप्ता, डॉ. ए.एन. पुरोहित और डॉ. खड्गसिंह वल्दिया को भी इसमें शामिल किया गया था। इस समिति द्वारा सौंपी [...]
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