मानवता के विकास के लिये वैज्ञानिक मानसिकता जरूरी है
महादेवी वर्मा सृजन पीठ, रामगढ़ (नैनीताल) में वैज्ञानिक मानसिकता और हिंदी लेखन’ पर गंभीर विचार-विमर्श के लिए 26 व 27 मार्च 2012 को एक दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी का आयोजन विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) की स्वायत्त संस्था विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं आद्योगिक अनुसंधान परिषद् के राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना [...]
गिरदा, तुम्हारे समय को सलाम
इतवार, 22 अगस्त। बारह बजे के आसपास मोबाइल फोन कुनमुनाया। देखा, लखनऊ से नवीन का संक्षिप्त एस एम एस था- ‘‘हमारे गिरदा चल दिए इस दुनिया से। अभी थोड़ी देर पहले आखिरी साँस ली।’’…..पढ़ कर दिल धक्क से रह गया और मन सोच में डूब गया। अभी सोच में डूबा ही था कि सामने खम्म [...]
पहाड़ को समझने की एक कारगर कोशिश
स्वप्न किस तरह साकार होते हैं और इसके लिए किस तरह कारगर कोशिश की जा सकती है, यह ‘पहाड़’ की गतिविधियों को देख कर बखूबी महसूस किया जा सकता है। और, अगर ‘पहाड़’ की कार्यप्रणाली को समझने के लिए कोई समान उदाहरण देखना हो तो बिना थके लगातार जुनून के साथ काम में जुटी चींटियों [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग. समापन किस्त
जंगल, खड़ोद और सौल का शिकार उस बार हाईस्कूल की परीक्षा के बाद ही ददा को टीचर क्वार्टर छोड़ कर खालगड़ा जाकर रहने का आदेश मिल गया। खालगड़ा यानी कालेज से दो-तीन किलोमीटर ऊपर जंगल के सुनसान इलाके में बना फार्म। वहाँ जंगल के बीच से रास्ता जाता था। पहले तक वहाँ चौरस जगह में [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 29
रामलीला, दुकान और वे दुकानदार दिन भर पढ़ाई, शाम को खेलकूद और साँझबाती के बाद फिर पढ़ाई। यही नियमित दिनचर्या थी। नाटक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होते थे। बस, हाईस्कूल या इंटर के विद्यार्थियों की विदाई के दिन कुछ बच्चे गगलसा कर (भरे गले से) अपने वरिष्ठ सहपाठियों के बारे में अपनी भावनाएँ व्यक्त करते [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 28
बाढ़ और बरसात गर्मियों में तो अपने गाँव के पहाड़ से उछलते-कूदते, उतर कर नीचे आ जाता और गौला पार करके पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लगता। लेकिन, चैमास में द्यो-पानी का डर रहता। न जाने कब बादल घिर आएँ और कब झमाझम बरसने लगे। इसलिए चैमास के महीनों में छुट्टी में घर आता तो लौटते [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 27
छुट्टियाँ हो गई थीं। मैं गाँव के लिए चल पड़ा। खुशी के मारे जैसे हवा में पैर पड़ रहे थे। कूदता-फाँदता, उतराई उतरता, चीड़ानि धार को पार करता नीचे गौला नदी के किनारे खनस्यूँ पहुंच गया। शिवालय के पास से गौला पार की। आगे जाने पर पता लगा, रामलीला का मंच बना हुआ है। रंगीन [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 26
फिर पहाड़ दिल्ली से हम आगरा और मथुरा गए। आगरा में हमने अपनी किताबों में छपा हुआ ताजमहल देखा। बहुत सुंदर लगा। कितना साफ-सुकीला था! वहाँ हमने अकबर का मकबरा सिकंदरा भी देखा। आगरा के किले में गए। ऊपर एक छत पर बिलकुल काले रंग के संगमरमर की बेंच देखी। वहाँ दीवान-ए-खास, एक बुर्ज और [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 25
चीड़ वनों के बीच बाज्यू आते, दो-चार दिन रहते और फिर चले जाते। उन्हें घर की याद आती रहती। रुके हुए काम याद आते। इसलिए ज्यादा दिन नहीं रुक पाते थे। जाते-जाते मेरे सिर पर हाथ फेरते, मुँह मुसारते (सहलाते) और भरे गले से कहते, ‘‘खूब पढ़ना च्यला। तुझे क्या कमी ? तेरे ददा-भौजी हैं [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 24
बनोलिया से गाँव लौटे तो बाज्यू गाँव में रुक गए। अकेले। और मैं पढ़ने के लिए वापस ओखलकांडा आ गया। लेकिन, शनिवार, इतवार और दूसरी छुट्टियों में गाँव चला आता। बाज्यू के पास रहता। हम दोनों के होते हुए भी घर भाँय-भाँय करता रहता। बाज्यू घर भीतर या गाड़्-भिड़ों के काम में लगे रहते। बीच [...]
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