सम्पादकीय : क्रिकेट का उभार अर्थात अन्य खेलों का उजड़ना
सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया जाना एक हास्यास्पद फैसला है। यह एक ओर क्रिकेट के बाजारवाद के जबर्दस्त दबाव का सूचक है तो दूसरी ओर संविधान की उस भावना का अपमान, जिसके अन्तर्गत संसद के इस उच्च सदन का गठन किया गया था। हमारे संविधान निर्माताओं का मानना था कि जिन भौगोलिक [...]
सम्पादकीय : कच्छा-बंडी बनाने वाले हमें कंगाल बना कर चलते बनें और हम ….
ऐसा लग रहा है कि तमाम रोने-धोने, नाराजी और मान मनौवल के बाद अन्ततः विजय बहुगुणा के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की नई सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन चीजें एकदम जिस तरह शुरू हुई हैं, उससे आगे के लिये उम्मीद जगने के बदले एक भय लगने लगा है। सबसे पहले एक [...]
हमारी स्मृति में मुजफ्फरनगर कांड !
18 सालों में धूल की इतनी परतें जम गई हैं कि यह नाम अब सामान्य उत्तराखंडवासी की स्मृति में धुँधलाने लगा है। 1994, जब मुजफ्फरनगर में वह वीभत्स कांड हुआ था, के आसपास पैदा हुई एक पूरी पीढ़ी है जो अब वयस्क होकर वोटर के रूप में राजनीति में भी हिस्सेदारी करने लगी है। उसने [...]
समाचार की होली के पच्चीस साल
नैनीताल समाचारके पटाङण की होली बैठक इस 6 मार्च को अपनी रजत जयंती से भी आगे निकल गई। यह समाचार की होली का पच्चीसवाँ नहीं, छब्बीसवाँ साल था…. पिछले साल गिरदा के देहान्त के बाद 18 मार्च को सम्पन्न हुई पहली होली में, उसकी अनुपस्थिति में हम इतने हक्के-बक्के और असहाय जैसे रहे कि होली [...]
सम्पादकीय : क्यों न सीधे जनरलों को ही खरीद डालें?
जो लोग 1962 और 65 में चीन या पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों के साक्षी रहे हैं, उन्हें इन दिनों सेना में हो रही घटनाओं से शर्म आ रही होगी। तब लोग मोर्चे पर जा रहे सैनिकों को गले मिल कर विदाई देते थे, जगह-जगह स्टेशनों पर उनका बारातियों की तरह स्वागत होता था। औरतें [...]
कोप भवन में सरकार
उत्तराखंड में तीसरी विधानसभा के चुनाव के बाद बनी सरकार ने गजब का ड्रामा किया है। अखबारी खबरों को च्युंगगम की तरह चुभलाने वाले लोग तो मजा ले रहे हैं, लेकिन कुल मिला कर यह इस नवोदित प्रदेश के लिये बहुत खतरनाक संकेत है। मुख्यमंत्री पद से बाहर कर दिये गये हरीश रावत को जैसे-तैसे [...]
सम्पादकीय : जोड़-तोड़ की फितरत और किस्मत
विजय बहुगुणा के उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के साथ हरीश रावत की बगावत का जो प्रकरण सामने आया है, उसके पीछे दरअसल हर स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास होना है। लोकतंत्र में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं पंचायती राज संस्थाओं का अपने-अपने स्तर पर स्वावलंबी और आत्मनिर्भर होना जरूरी है। लेकिन व्यवहार में अब [...]
खोदा पहाड़ निकले बहुगुणा
एक हफ्ते तक कांग्रेस ने कई तरह की कवायद की और आखिर में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठला दिया। बस बगावत शुरू हो गई। चुनाव सभाओं में और चुनाव नतीजे आने से पूर्व बार-बार अपनी एकजुटता का और नेता पद के लिये कोई मतभेद न होने का दावा करने वाले कांग्रेसी इधर [...]
सम्पादकीय : लट्ठमार ही सही पर बात तो सही है….
अरविन्द केजरीवाल के एक बयान पर जबर्दस्त विवाद उठ खड़ा हुआ है। अरविन्द ने कह दिया कि संसद में हत्यारे, बलात्कारी और अपराधी घुस आये हैं। यह हो सकता है कि उन्होंने अपनी बात थोड़ा लट्ठमार ढंग से कह दी हो, लेकिन इस बात में झूठ तो कहीं से कहीं तक नहीं है। मगर उनके [...]
तो मैंने भी एक चुनाव लड़ डाला…
चुनाव की रुत थी। मैंने भी एक चुनाव लड़ डाला। मुझे हारना ही चाहिये था और मैं हारा। ये चुनाव विश्वविद्यालय कोर्ट उर्फ सीनेट उर्फ विद्वत्सभा के थे। बड़ा भारी-भरकम नाम है….नहीं ? किस्सा लगभग साढ़े छः साल पहले शुरू होता है…. 2 अक्टूबर 2005 को जब हम हस्बमामूल महात्मा गांधी की प्रतिमा के आगे [...]
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