सम्पादकीय: अब ऐसी ही है राजनीति
अभी-अभी हमने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को लालू यादव और मुलायम सिंह को गाली देते और फिर माफी माँगते देखा। उससे पहले शशि थरूर को देखा हवाई जहाज के इकानॉमी क्लास को ‘कैटल क्लास’ कहते और फिर अपनी महिला मित्र के चक्कर में मंत्रिपद गँवाते देखा, फिर देखा जयराम रमेश को ऊटपटाँग वक्तव्य देते हुए। [...]
सम्पादकीय: आई.पी.एल. यानि पैसे का खेल
आई.पी.एल. का तीसरा संस्करण अन्ततः समाप्त हो गया। इस बार का टूर्नामेंट खेल के लिये नहीं, खेल के मैदान के बाहर की गतिविधियों के लिये ज्यादा जाना जायेगा। लगभग पिकनिक के अंदाज में मस्ती से, एक दिन की छुट्टी मिला कर, लगातार छः दिन तक खेले जाने वाले टैस्ट मैच से बाजार, माफिया और राजनीति [...]
सम्पादकीय : क्या ऐसे बचेंगे जंगल!!
अभी गर्मी अपने पूरे शबाब पर भी नहीं आयी है, मगर जंगलों के जलने की घटनायें शुरू हो गई हैं। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि इस साल जाड़ों में वर्षा बिल्कुल नहीं हो पाई। यह लगातार दूसरा साल है, जब शीतकालीन वर्षा ने धोखा दिया है। इससे नदियों में पानी कम हुआ है और धारे-नौले [...]
अल्मोड़ा…लाजवाब !
लाजवाब शहर है अल्मोड़ा! इसमें कोई दो राय नहीं। आप कितनी ही गहराई से इसे जानते हों, लेकिन हर बार इसे देख कर चमत्कृत हो सकते हैं। अरे, तो यह भी इसका एक चेहरा है ? राजनीतिक या सामाजिक रूप से यहाँ कुछ विशेष न भी घट रहा हो, लेकिन यहाँ की अद्भुत प्रतिभायें कुछ [...]
सम्पादकीय : आर्थिक पैकेज, सब मौसेरे भाई
उत्तराखंड को केन्द्र सरकार से मिलने वाले औद्योगिक पैकेज, जो 31 मार्च 2010 को समाप्त हो रहा है, को बढ़ाने के लिये उत्तराखंड के भाजपाइयों और कांग्रेसियों की एकजुटता एक स्तर पर चमत्कृत करती है। इस मुद्दे पर जहाँ मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अपने मंत्रीमंडलीय सहयोगियों के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भेंट की [...]
सम्पादकीय : विधानसभा में अराजकता
उत्तराखंड में एक बार फिर अराजकता की स्थिति है। विधानसभा का सत्र ही नहीं चल पा रहा है। हमारे विधायक समझ रहे होंगे कि जब संसद के उच्च सदन, राज्य सभा में ‘महिला आक्षरण विधेयक’ को लेकर तमाम पार्टियों के प्रतिनिधि शर्मनाक हरकतें कर रहे थे तो उन्हें भला क्यों पीछे रहना चाहिये। विधायिका में [...]
संपादकीय: कैसे बने समाज ज्यादा सहनशील?
एक बार फिर होलियाँ सामने हैं। सामाजिक सद्भाव का यह एक विलक्षण पर्व है, जिसमें हास्य होता है, लेकिन कटुता नहीं होती। व्यंग्य होता है, मगर उससे कोई रंजिश नहीं जनमती। अश्लीलता होती है, लेकिन वह सहज भाव से स्वीकार कर ली जाती है। काश, होली से इतर भी हमारे समाज में ऐसी सहिष्णुता, इतनी [...]
महात्मा, माओवाद और मोदी
पोरबंदर…. पहली बार गुजरात आने का सुयोग मिला तो तय किया कि अपनी यात्रा वहीं से शुरू करूँगा, जहाँ से 140 वर्ष पहले महात्मा गाँधी ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी। उस वक्त तो जेहन में यह भी नहीं था कि वह तो 30 जनवरी का मौका होगा और हो सकता है कि गुजरात [...]
वर्ष 2009 ? ……मगर उम्मीद पर तो दुनिया जीती है !
हर साल आखिरी दिनों में होने वाली कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के कारण याद रह जाता है। 2008 का साल मुम्बई के आतंकी हमलों के कारण अविस्मरणीय हो गया था तो 2007 का वर्ष बेनजीर भुट्टो की हत्या के कारण। वर्ष 1992 बाबरी मस्जिद के ध्वंस के कारण इस तरह दिमाग में खुद गया है कि [...]

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