Browse: Home / गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा'
लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 12 || 01 फरवरी से 14 फरवरी 2011:: वर्ष :: 34 :February 10, 2011 पर प्रकाशित
बात बुनियादी उठी बात ये फिलवक्त की है साथियो ! इस देश में, ये उदासी ऊपरी है साथियो इस देश में। आप अब तक शक्ल हिन्दोस्तां की जो समझा किये, सिर्फ वैसा ही नहीं है साथियो ! इस देश में। गांधी-गौतम के फरेबी फलसफे को चीर कर, हुआ पैदा नक्सली है साथियो ! इस देश [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 11 || 15 जनवरी से 31 जनवरी 2011:: वर्ष :: 34 :January 29, 2011 पर प्रकाशित
आधुनिकता में भटकी ‘उतरैणी’ {15 जनवरी 1978 के अंक में ‘गीराबल्लभ’ नाम से छपा यह लेख गिरदा द्वारा लिखा नैनीताल समाचार में प्रकाशित पहला गद्य है। इसमें उस साल के उतरैणी मेले में वन आन्दोलनकारियों के पहुँचने का भी जिक्र है। -सम्पादक} काले कव्वा काले, खजूरै माल खाले, ले कव्वा बड़े, मैं कै दिये सुनूं [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 11 || 15 जनवरी से 31 जनवरी 2011:: वर्ष :: 34 :January 27, 2011 पर प्रकाशित
सरजु-गुमती संगम में गंगजली उठूँलो, उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो उतरैणी कौतीक हिटौ वैं फैसाल करूँलो, उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो धन मयेड़ी छाति उनरी धन त्यारा ऊँ लाल बलिदानैकी जोत जगै ढोलि गै जो उज्याल खटीमा, मँसुरि, मुजफ्फर कैं हम के भुली जूँलो उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो भुलू उत्तराखण्ड ल्ह्यूँलो बैणी फाँसि नि खाली जाँ रौ [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 04 || 01 अक्टूबर से 14 अक्टूबर 2010:: वर्ष :: 34 :November 29, 2010 पर प्रकाशित
फिर आयी वर्षा ऋतु लाई नव जीवन जल धार। कृषि प्रधान भारत में उजड़े फिर कितने घर बार? कितने जनगण गाड़ बग गये? कितने गौं-घर घाट लग गये? कितने भगीरथों के सर से गुजरी गंगा धार? तुम क्या जानो तुम तो ठहरे भारत की सरकार कि हमरे बच्चे सोये चार। उन्तीस जून सन् चौरासी की [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 21, 2010 पर प्रकाशित
(गिरदा रचित नाटक ‘नगाड़े खामोश हैं’ के संबंध में चर्चा यह थी कि श्याम बेनेगल इस नाटक पर फिल्म बनाना चाहते हैं। प्रस्तुत नाट्यांश में जन संघर्ष को उकेरने वाले हिस्से को लिया गया है। सत्ता के षड्यंत्रकारी हिस्सों और दमन की राजनीति पार्श्व में है। गिरदा की समाज बदलने के आह्वान की कोशिश का [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 21, 2010 पर प्रकाशित
गद्य में गिरदा – नैनीताल समाचार 1 सितम्बर 1992 सन् 1978 की बीसवीं-21वीं नवम्बर। रामजे इण्टर कॉलेज अल्मोड़ा के प्रांगण का खुला मंच। ‘थेंक्यू मिस्टर ग्लाड’ उपन्यास के सारिकाई संस्करण की मंचीय प्रस्तुति का पूर्वाभ्यास। दृश्य-15 अगस्त 1947 को यूनियन जैक’ के अवरोहण के साथ तिरंगे का आरोहण, उच्चरित शब्द-‘‘और ‘ग्लाड’ ने ‘यूनियन जैक’ की [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 21, 2010 पर प्रकाशित
गद्य में गिरदा – नैनीताल समाचार मार्च 2009 होली 2008 में उत्तराखंड निकाय चुनावों की मारामार से गुजर रहा था। तब हमने होलियाना अभिव्यक्ति दी – मेरि बारी, मेरि बारी, मेरी बारी, अलिबेर होलिनैकि रङतै न्यारी काटी में मूताणा का लै काम नि ए जो, भोट माङण हुँणी भै ठाड़ी।। अलिबेर….. फिर 1 सितम्बर, ऐन [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 21, 2010 पर प्रकाशित
गद्य में गिरदा – नैनीताल समाचार 15 नवम्बर 2006 तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं…… साहिर की यह नज्म सुनना पसन्द करने वालों में कई लोग हैं। उन्हीं में एक निर्मल भी था….. और बहुत तल्लीनता से सुनने वालों में था। उन्हीं में एक नवीन जोशी भी हैं- ‘यही फिजाँ थी, यही रुत, यही जमाना था……’ [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 21, 2010 पर प्रकाशित
गद्य में गिरदा – नैनीताल समाचार 1 जुलाय 2007 इतवार 17 जून 07। समय शाम 7.20। बुआ सिंह के उत्तराखंड आगमन की सूचना ई.टी.वी. हैदराबाद से फोन पर मिली, प्रतिक्रिया हेतु। तब तक हमें कुछ मालूम नहीं था। सो जल्दी में दो-चार पंक्तियाँ काव्य की सुना दीं। खटीमा, मसूरी, मुजफ्फर कैं/ हम के भुली जूंलों। [...]
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लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2010:: वर्ष :: 34 :October 20, 2010 पर प्रकाशित
गद्य में गिरदा – नैनीताल समाचार 15 नवम्बर 2006 ‘नौछामी नरैंण’ गीत को नरेन्द्र की सीडी से सेंसर किये जाने की खबर सुन कर बड़ी हँसी आ रही है वर्तमान व्यवस्था के दिमागी दिवालियेपन पर। सेंसर की कैंची किसी गीत को लोगों में जाने से रोक सकती है क्या ? वह कोई बाजारू फिल्म का [...]
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