भगत दा ! मेरे हमदम मेरे दोस्त
‘अपने भीतर और बाहर की नमी और हरियाली खो देने के बावजूद मनुष्य के लिये सर्वाधिक निरापद है धरती जो हमें पाना है कदाचित उसी के दर्पण में हमारा बिम्ब है’ ‘अरण्य’ पत्रिका का सपना और ‘वनरखा’ को साकार कर सुधी पाठकों में वन, पर्यावरण, ग्राम्या का वैचारिक उजास फैलाने वाले अपने ‘भगत दा’ नन्द [...]
मास्साब
(वर्ष 2001 में आकाशवाणी अल्मोड़ा में पढ़ी गई गिर्दा को समर्पित यह कविता उन्हें सुनाई भी गयी थी। इसे उन्होंने पसंद किया। -सम्पादक) मास्साब ! नहीं ठहरा आपके बस का न आप जी ही पाये ढंग से ना ही मरने दिया आपको अपने खूबसूरत सपनों ने आप तो जुगाली कर सकते थे करते भी रहे [...]
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