गङ् नाण
हिट हो आब गङ् नै ऊनूँ ! यो उतरैणि ऐ गे छ माघ में, पुण्य भै वीकें कमै ल्यूँ।। आब काँ रै गे गङ अहो ! आब पाणि न्हैति इन गंगन में। सब गाड़न में रूढ़ बरसि गै, ढुङ डाव रेत भरी सबन में।। जौलजीवि, बागसर, जागिसर, सबे अलीत-पलीत बणै। गङ बै सिरि सब उज्याडि़ [...]
परम्परागत फसलों को बचायें
पहाड़ों के पारम्परिक अनाज- भट (काले और सफेद), रैंस, गुरूंस, सिमि, गुरसुंटि, सुंट, ग्यूँ, धान, जौ, उजौ, कौंण, मादिर, मडु, चुव, ध्वाग या मक्का, राजमा आदि के सही विकास और सुधार के लिये विशेष शोध, परीक्षण तथा उन्नति पर ध्यान देने की आवश्यकता है। भट एक खास महत्व रखता है, क्योंकि यह शीत ऋतु का [...]
यो वसन्त हो कैका घर जाये ?
मेरे गाँव में वसन्त हर्षोल्लास और त्यौहार समारोह लेकर आता था। सरसों का फूलना, पादपों में नये कोंपल आना, फूलों का खिलना, पक्षियों का कूजन कुमाऊँ में ऊँचाई और निचाई के अनुसार आगे-पीछे होता रहता है, किन्तु प्रकृति के सँवरने-सजने में देर सबेर भले ही हो जाये, हमारे गाँव के दो कदीमी ऋतु रैंण गाने [...]
स्वतंत्रता सेनानी भवानी दत्त जोशी: जिन्हें हम भूल गये
बनारस विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. करने के बाद मैं 1955 में एक दिन यों ही अल्मोड़ा की माल रोड में घूम रहा था तो एम्बेसडर होटल के नीचे जिला सूचना केन्द्र से एक सौम्य सुदर्शन व्यक्ति भीतर से निकले। वास्कट तथा सफेद टोपी पहने वे बड़े ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी लगे थे। परंतु उस [...]
अभी भी आँखों के सामने रेंगता है मून लैंडिंग का नजारा
सन 1969 में मैं लगभग साल भर के लिये ट्रेनिंग के लिये युनाइटेड किंगडम गया हुआ था। नेशनल कोल बोर्ड (अब ब्रिटिश कोल) के सौजन्य से विश्वविद्यालयों, कोयला खानों से संबंधित गवेषणा संस्थानों, खनन के यन्त्रोपकरणों के निर्माताओं, प्लानिंग और यंत्रीकरण के कामों में संलग्न आयोजकों तथा खनन सामग्री के विकास व परीक्षण की शालाओं [...]
गुमनाम ही रहे स्वाधीनता संग्रामी मनोरथ पांडे ‘शास्त्री’
मैं तब बेरीनाग मिडिल स्कूल की पाँचवीं कक्षा का विद्यार्थी था। हमारी कक्षा के शिक्षक ‘पंडित जी’ का नाम शायद शिवदत्त जी था। पर ठीक से याद नहीं आता। वे कुछ ही महीनों में रिटायर होने वाले थे। लम्बी सी दाढ़ी थी। मृदु स्वभाव और मधुरभाषी। हमारी हिन्दी की पुस्तक साहित्य वाटिका, भाग-1 में एक [...]
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