अथ पौड़ी कथा.12
आन्दोलनों की धरती-4 आजादी के आन्दोलन में कांग्रेस के योगदान के साथ ही पौड़ी के एक छोटे से कम्यून को भुलाना सम्भव नहीं है। इसने टिहरी की मुक्ति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी से पहले कांग्रेस के अलावा किसी दूसरी विचारधारा या कार्यक्रम का प्रसार करना कठिन था। पेशावर काण्ड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वालीका [...]
मतदान के बाद और भी डरे हैं पौड़ीवासी
पौड़ी में इस बार चुनावी माहौल उदासीन रहा। कौन जीतेगा, कौन हारेगा से इस बार लोगों को ज्यादा मतलब नहीं दिखा। इसका एक कारण तो पौड़ी विधान सभा सीट का आरक्षित सीट होना रहा। लम्बे समय से यहाँ राजनीति कर रहे नेता नये ठौर की तलाश में पलायन कर गये और आरक्षित वर्ग के प्रत्याशियों [...]
अथ पौड़ी कथा.11 , आन्दोलनों की धरती-3
1941 में पौड़ी मात्र 1,834 की आबादी का कस्बा था। इसमें ज्यादातर संख्या सरकारी कर्मचारियों व उनके परिजनों की थी। इनके अलावा दुकानदार व अधिवक्ता थे। सन् 1930 के ईबटसन काण्ड के बाद हुए दमन और आन्दोलनकारियों को लम्बी सजायें दिये जाने के कारण स्थानीय लोगों की आजादी के आन्दोलन में भागीदारी कम हो चली [...]
अथ पौड़ी कथा.10 आन्दोलनों की धरती-2
आजादी की लड़ाई के दौर में उत्तराखण्ड की धरती 1928 से 1932 के मध्य सबसे अधिक उद्वेलित रही। राष्ट्रीय स्तर पर पहले साईमन कमीशन का विरोध हुआ, जिसके बाद 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत नमक सत्याग्रह प्रमुख था। चूंकि उत्तराखण्ड में नमक बनाने की संभावना नहीं थीं, इसलिये कांग्रेसियों ने सांकेतिक तौर पर [...]
अथ पौड़ी गाथा-9 : आन्दोलनों की धरती है पौड़ी
पौड़ी राजनीतिक रूप से बेहद सचेत व सक्रिय, प्रभावशाली व सजग लोगों का भी नगर रहा है। एक समय पौड़ी ने समूचे गढ़वाल का नेतृत्व किया था। यहीं से पूरे गढ़वाल को संदेश जाता था। इस नगर से अनेकों ने राजनीति का ककहरा सीखा तो कई राजनीतिज्ञ राज्य व देश की राजनीति के शीर्ष तक [...]
अथ पौड़ी गाथा-8
नगर में किया गया रचनाकर्म (ग) वर्तमान शताब्दी के प्रथम दशक में नगर में मात्रात्मक दृष्टि से सबसे अधिक पुस्तकों का लेखन हुआ। तकनीक के सर्वसुलभ होने व लिखने वालों का आगे आना भी इसका एक कारण रहा। सन् 2000 से 2011 के बीच कई प्रकार की विधाओं में पुस्तकें प्रकाशित हुईं। कविता संग्रह, कहानी, [...]
पौड़ी में किया गया रचनाकर्म (ख)
अथ पौड़ी गाथा-7 पौड़ी नगर में 1981 से 1990 का दौर नये लेखकों का रहा। इससे पहले तक का लेखन पुरानी पीढ़ी के लोगों तक ही सीमित था। किन्तु उसके बाद पत्रकारिता व लेखन में नये रचनाकार सामने आने लगे। संक्रमण के इस दौर में सन्नाटे को सबसे पहले तोड़ने वाले रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ थे। [...]
अथ पौड़ी कथा- 6 : पौड़ी में रची पुस्तकें (क)
आजादी पूर्व के दौर में पौड़ी में रहते हुए जहाँ लेखकों ने इतिहास, संस्कृति पर लिखा वहीं आजादी के बाद लेखकों ने लेखन की दूसरी विधाओं यथा कविता, कहानी, गजल, दोहा, गीत संग्रह, काव्य संग्रह को आजमाया तो संस्कृति, इतिहास, भूगोल, पर्यावरण आदि पर विषयगत पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ। हालांकि कुछेक को छोड़ अधिकतर [...]
अथ पौड़ी कथा – 5: अब वो होली कहाँ
बदलाव का असर पौड़ी पर भी पड़ा है। संचार माध्यमों व आधुनिकता की बयार ने यहाँ की रवायतों, संस्कृति व सम्बन्ध तक को धो कर रख दिया है। अब यहाँ के समाज में वह आत्मीयता नहीं दिखती है और न वह परम्पराओं को आगे बढ़ाने को इच्छुक हैं जो वर्षों से चली आ रही थीं। [...]

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