लेखक : निरंजन सुयाल ::अंक: 19 || 15 मई से 31 मई 2010:: वर्ष :: 33:
जोशी जी चाहें तो हाजिर हो भी जाएँ। पर किसलिए, जब कोई बुलाना ही नहीं चाहता ? यह किसी नाटक की पटकथा का अंश नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की व्यथा है ? उत्तराखंड से पलायन का रोना आम से खास तक सब रोते आ रहे हैं। उत्तराखण्ड की जनसंख्या के बराबर ही देश और विदेश में [...]
लेखक : निरंजन सुयाल ::अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2008:: वर्ष :: 32:
आज भी दूरस्थ गाँवों में चाव से सुने जा रहे रेडियो से ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम में कभी-कभी बजने वाले एक कुमाऊँनी गीत की दो पंक्तियाँ पेश-ए-नजर हैं, ‘‘नौ रुप्य किलो नून, सौ रुप्य किलो चहापति,……भैजी चरौंनी भैंसी, भौजि बणिगो सभापति।’’ पहली पंक्ति तो अद्यतन घटित हो रही सच्चाई है। दूसरी पंक्ति रचते हुए गीतकार के इरादे [...]
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