आत्मा के भीतरी कमरे के चार कोने
कपिलेश भोज का हिंदी साहित्य में हस्तक्षेप पुराना है। उनका नाम बीस बरस पहले मैं वर्तमान साहित्य के सम्पादक मंडल में देखता था। उनकी कुछ कहानियाँ मैंने पढ़ीं। फिर ये जाना कि वे एक बेहद सक्रिय और समर्पित राजनैतिक कार्यकर्ता रहे हैं। इसे मेरी लिखत-पढ़त की सीमा ही माना जाए कि उनकी कविताओं से मेरा [...]
अक्षरों के पुल के नीचे बहती-थमती कवितायें
दिवा भट्ट के कविता संकलन ‘अक्षरों के पुल’ की कवितायें महज एक स्त्री के गुनगुने भाव लोक भर की कवितायें नहीं हैं, जैसा कि आम तौर पर स्त्री लेखन में देखा जाता है। ये कवितायें दरअसल उस विचार के विरोध की कवितायें हैं, जो लेखकों को स्त्री और पुरुष के खेमों में बाँटकर देखता आया [...]
त्रिलोचन के बिना
बीते 9 दिसम्बर को प्रगतिशील हिन्दी कविता का चौथा कोना भी सूना हो गया। शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल के बाद अब त्रिलोचन शास्त्री भी नहीं रहे। 91 वर्ष की वयोवृद्धता के अलावा वे काफी समय से बीमार भी थे। उत्तराखंड से त्रिलोचन का निकट संपर्क रहा और उनकी छोटी पुत्रवधू सुश्री उषा सिंह [...]
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