बेनाप भूमि के मसले को सिर्फ सरकार पर न छोड़ा जाये
खण्डूरी सरकार द्वारा वर्ष 1893 की अधिसूचना के निरस्तीकरण से कृषि भूमि का विस्तार हो सकेगा और सरकारी योजनाओं के लिये काश्तकरों की नाप जमीन का उपयोग बन्द हो जायेगा। मगर अड़चनें बहुत सारी हैं। इस मुद्दे को समझने के लिये संक्षेप में पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। औपनिवेशिक अग्रेज सरकार ने उत्तराखंड में निजी [...]
आदिवासी कानून से ग्रामीणों की किस्मत बदल सकती है
राधा राजि जनजाति की एक महिला है। पीढ़ियों से वनों के भीतर रहने के बावजूद असुरक्षा में जीवनयापन करना उसकी मजबूरी है। वन विभाग के कर्मचारी कभी भी आकर उसे धमका सकते हैं। वनों से चोरी का अभियोग लगा सकते हैं। यहाँ तक कि हटा भी सकते हैं। राधा की जैसी दशा देश के उन [...]
जल, जंगल, जमीन के अधिकार सुनिश्चित हों
14 वर्ष बीत जाने के पश्चात भी स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने हेतु पंचायती राज संस्थाओं को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार नहीं मिल पाये और पंचायती राज महज केन्द्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं को ढोने का तंत्र बनकर रह गया है। सत्ता व समुदाय में संघर्ष हमेशा संसाधनों [...]
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